श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४९९ इस मार्गका रहस्य है। महाभारतके वनपर्वमें ब्राह्मण-व्याध-कथामें (मभा वन. २०८) और शांतिपर्वमें तुलाधार-जाजली-संवादमें (मभा. शां. २६१) इसी धर्मका निरूपण किया गया है; और मनुस्मृतिमेंभी (मनु. ६. ९६, ९७) यति-धर्मका निरूपण करनेके अनंतर इसी मार्गको वेद-संन्यासियोंका कर्मयोग कह कर विहित तथा मोक्षदायक बतलाया है। 'वेदसंन्यासिक' पदसे और वेदकी संहिताओं तथा ब्राह्मण-ग्रंथोंमें जो वर्णन हैं, उनसे यही सिद्ध होता है, कि यह मार्ग हमारे देशमें अनादि कालसे चला आ रहा है। यदि ऐसा न होता, तो यह देश इतना वैभवशाली कभी हुआ नहीं होता; क्योंकि यह बात प्रकट ही है, कि किसीभी देशके वैभवपूर्ण होनेके लिये वहाँके कर्ता या वीर पुरुष कर्म-मार्गकेही अगुआ हुआ करते हैं। हमारे कर्मयोगका मुख्य तत्त्व यही है, कि कोई कर्ता या वीर पुरुष भलेही हो; परन्तु उन्हेंभी ब्रह्मज्ञानको न छोड़ उसके साथही साथ कर्तव्यको स्थिर रखना चाहिये, और यह पहलेही बतलाया जा चुका है, कि इसी बीजरूप तत्त्वका व्यवस्थित विवेचन करके श्रीभगवानने इस मार्गका अधिक दृढ़ीकरण और प्रसार किया था, इसलिये इस प्राचीन मार्गकाही आगे चल कर 'भागवत धर्म' नाम पड़ा होगा। विपरीत पक्षमें उपनिषदोंसे तो यही व्यक्त होता है, कि कभी-न-कभी कुछ ज्ञानी सत्पुरुषोंके मनका झुकाव पहलेहीसे स्वभावतः संन्यास-मार्गकी ओर रहा करता था; अथवा कम-से-कम इतना अवश्य होता था, कि पहले गृहस्थाश्रममें रहकर अंत समयमें संन्यास लेनेकी बुद्धि मनमें जागृत हुआ करती थी - फिर चाहे वे लोग सचमुच संन्यास लें या न लें। इसलिये यहभी नहीं कहा जा सकता, कि संन्यास-मार्ग नया है; परंतु स्वभाव-वैचित्र्यादि कारणोंसे ये दोनों मार्ग यद्यपि हमारे यहाँ प्राचीन कालसेही प्रचलित हैं, तथापि इस बातकी सत्यतामें कोई शंका नहीं, कि वैदिक कालमें मीमांसकोंके कर्म-मार्गकीही लोगोंमें विशेष प्रबलता थी; और कौरव-पांडवोंके समयमें तो कर्मयोगने संन्यास-मार्गको पीछे हटा दिया था। कारण यह है, कि हमारे धर्मशास्त्रकारोंने साफ़ कह दिया है, कि कौरव-पांडवोंके कालके अनंतर अर्थात् कलियुगमें संन्यास-धर्म निषिद्ध है; और जब कि धर्मशास्त्र "आचारप्रभवो धर्मः" (मभा. अनु. १४९, १३७; मनु. १. १०८) इस वचनके अनुसार प्रायः आचारहीका अनुवादक हुआ करता है; तब सहज-ही सिद्ध होता है कि धर्मशास्त्रकारोंके उक्त निषेध करनेके पहलेही लोकाचारमें संन्यास-मार्ग गौण हो गया होगा।* परंतु इस प्रकार यदि कर्मयोगकी पहले प्रबलता थी और आखिर कलियुगमें संन्यास-धर्मको निषिद्ध माननेतककी नौबत आ चुकी थी; तो अब यहाँ यही स्वाभाविक शंका होती है, कि तेजीसे बढ़ते हुए इस ज्ञानयुक्त कर्मयोगके ह्रासका तथा वर्तमान समयके भक्ति-मार्गमेंभी संन्यास-पक्षकोही श्रेष्ठ माने जानेका कारण क्या है?
- पृष्ठ ३४८-३४९ की टिप्पणीमें दिये गये वचनोंको देखो।