श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कुछ लोग कहते हैं, कि यह परिवर्तन श्रीमदाद्यशंकराचार्यके द्वारा हुआ । परंतु इतिहासको देखनेसे इस उपपत्तिमें सत्यता नहीं दीख पड़ती । पहले प्रकरणमें हम कह चुके हैं, कि श्रीशंकराचार्यके संप्रदायके दो विभाग हैं - ( १ ) मायावादात्मक अद्वैत ज्ञान, और ( २ ) कर्म-संन्यास-धर्म । अब यद्यपि अद्वैत ब्रह्मज्ञानके साथ साथ संन्यास-धर्मकाभी प्रतिपादन उपनिषदोंमें किया गया है, तोभी इन दोनोंका कोई नित्य संबंध नहीं है, इसलिये यह नहीं कहाँ जा सकता, कि अद्वैत-वेदान्त-मतको स्वीकार करनेपर संन्यास-मार्गकोभी अवश्य स्वीकार करनाही चाहिये । उदा- हरणार्थ, याज्ञवल्क्य प्रभृतिसे अद्वैत-वेदान्तकी पूरी शिक्षा पाये हुए जनक आदिक स्वयं कर्मयोगी थे । यही क्यों; बल्कि उपनिषदोंका अद्वैत-ब्रह्मज्ञानही गीताका प्रति- पाद्य विषय होनेपरभी, गीता इसी ज्ञानके आधारसे संन्यासके बदले कर्मयोगकाही समर्थन किया गया है । इसलिये पहले इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि शांकर-संप्रदायपर संन्यास-धर्मको उत्तेजन देनेका जो आक्षेप किया जाता है, वह इस संप्रदायके अद्वैत ज्ञानको उपयुक्त न होकर उसके अंतर्गत केवल संन्यास-धर्म- कोही उपयोगी हो सकता है । यद्यपि श्रीशंकराचार्यने इस संन्यास-मार्गको नये सिरेसे नहीं चलाया है; तथापि कलियुगमें निषिद्ध या वर्जित माने जानेके कारण उसमें जो गौणता आ गई थी, उसे, उन्होंने अवश्य दूर किया है । परंतु यदि इसके भी पहले अन्य कारणोंसे लोगोंमें संन्यास मार्गकी चाह हुई न होती, तो इसमें संदेह है, कि आचार्यका संन्यास-प्रधान मत इतना अधिक फैलाने पाता या नहीं । ईसानेकहा है सही, कि "यदि कोई एक गालमें थप्पड़ मार दे, तो दूसरे गालकोभी उसके सामने कर दो" (ल्यूक. ६. २९) । परंतु यदि विचार किया जाय, कि इस मतके अनुयायी यूरोपके ईसाई राष्ट्रोंमें कितने हैं; तो यही दीख पड़ेगा, कि किसी बातके प्रचलित होनेके लिये केवल इतनाही बस नहीं है, कि कोई धर्मोपदेशक उसे अच्छी कह दे; बल्कि ऐसा होनेके लिये - अर्थात् लोगोंके मनका झुकाव उधर होनेके लिये - उस उपदेशके पहलेही कुछ सबल कारण उत्पन्न हो जाया करते हैं; और तब फिर लोकाचारमें धीरे धीरे परिवर्तन होकर उसीके अनुसार धर्म-नियमोंमेंभी परिवर्तन होने लगता है । "आचार-धर्मका मूल है" - इस स्मृति-वचनका तात्पर्यभी यही है । गत शताब्दीमें शोपेनहरने जर्मनीमें संन्यास-मार्गका समर्थन किया था, परंतु उसका बोया हुआ बीज वहाँ अबतक अच्छी तरहसे जमने नहीं पाया, और इस समय तो निट्शेकेही मतोंकी वहाँ धूम मची हुई है । हमारे यहाँ देखनेसेभी यही मालूम होगा, कि संन्यास-मार्ग श्रीशंकराचार्यके पहले अर्थात् वैदिक-कालमेंही यद्यपि जारी हो गया था, तोभी वह उस समय कर्मयोगसे आगे अपना कदम नहीं बढ़ा सका था । स्मृति-ग्रंथोंमें अंतमें संन्यास लेनेको कहा गया है सही; परंतु उसमेंभी पूर्वाश्रमोंके कर्तव्यपालनका उपदेश दियाही गया है । श्रीशंकराचार्यके ग्रंथोंका प्रतिपाद्य विषय कर्म-संन्यास-पक्ष भलेही हो, परंतु स्वयं उनके जीवन-चरितसेही यह बात सिद्ध