श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्तव्य है; इसलिये संसारको न छोड़ते हुए उनको ऐसा प्रयत्न करते रहना चाहिये, जिससे लोगोंका दुःख कम होता जावे। अब तो पश्चिमी देशोंमे दुःखनिवारणेच्छुक कर्मयोगियोंका एक अलग पंथही हो गया है। इस पंथका गीताके कर्मयोग-मार्गसे बहुतकुछ साम्य है। जिस स्थानपर महाभारतमें कहा गया है, कि “सुखाद्बहुतरं जीविते नात्र संशयः” - संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है, वहींपर मनुने दुःखं बृहस्पतिंश्च तथा नारदने शुकसे कहा है :- न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ “जो दुःख सार्वजनिक है, उसके लिये शोक करते रहना उचित नहीं; उसका रोना न रोकर उसके प्रतिकारार्थ (ज्ञानी पुरुषोंको) कुछ उपाय करना चाहिये” (मभा. शा. २०५. ५; ३३०. ९५)। इससे प्रकट होता है, कि यह तत्त्व महाभारत- कारोंकोभी मान्य है, कि संसारके दुःखमय होनेपरभी, उसमें सब लोगोंको होनेवाले दुःखोंको कम करनेका उद्योग चतुर पुरुष करते हैं। परन्तु यह कुछ हमारा सिद्धान्त पक्ष नहीं है। सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा आत्मबुद्धि-प्रसादसे होनेवाले सुखको अधिक महत्त्व देकर, इस आत्मबुद्धि-प्रसादरूपी सुखका पूरा अनुभव करते हुए, केवल कर्तव्य समझकरही, अर्थात् ऐसी राजस अभिमान-बुद्धि मनमें न रखकर, कि मैं लोगोंका दुःख कम करूंगा, सब व्यावहारिक कर्मोंको करनेका उपदेश देनेवाले गीताके कर्म- योगकी बराबरी करनेके लिये, दुःखनिवारणेच्छुक पश्चिमी कर्मयोगमेंभी अभी बहुत- कुछ सुधार होना चाहिये। प्रायः सभी पाश्चिमात्य पंडितोंके मनमें यह बात समाई रहती है, कि स्वयं अपना या सब लोगोंका सांसारिक सुखही मनुष्यका इस संसारमें परम साध्य है - चाहे वह सुखके साधनोंको अधिक करनेसे मिले या दुःखोंको कम करनेसे; इसी कारणसे उनके शास्त्रोंमे गीताके निष्काम कर्मयोगका यह उपदेश कहींभी नहीं पाया जाता, कि यद्यपि संसार दुःखमय है, तथापि उसे अपरिहार्य समझकर केवल लोकसंग्रहके लियेही संसारके कर्म करते रहना चाहिये। सभी कर्म-मार्गी हैं तो सही; परन्तु शुद्ध नीतिकी दृष्टिसे देखनेपर उनमें यही भेद मालूम होता है, कि पाश्चात्त्य कर्मयोगी सुखेच्छुक या दुःखनिवारणेच्छुक होते हैं - कुछभी कहा जाय परन्तु वे 'इच्छुक' अर्थात् 'सकाम' अवश्य ही हैं, और गीताके कर्मयोगी हमेशाही फलाशाका त्याग करनेवाले अर्थात् निष्काम होते हैं। इसी बातको यदि दूसरे शब्दोंमें व्यक्त करें, तो यह कहा जा सकता है, कि गीताका कर्मयोग सात्त्विक है; और पाश्चात्त्य कर्मयोग राजस है (गीता १८. २३, २४)। केवल कर्तव्य समझकर, परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सब कर्मोंको करते रहनेका और उनके द्वारा परमेश्वरके यजन या उपासनाको मृत्युपर्यंत जारी रखनेका जो यह गीता-प्रतिपादित ज्ञानयुक्त प्रवृत्ति-मार्ग या कर्मयोग है, इसेही ‘भागवत धर्म’ कहते हैं। “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः” (गीता १८. ४५) – यही