श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] उपसंहार ४९७
व्यवस्थाके अनुसार समाजके धारण-पोषणके जो काम अपने हिस्सेमें आ पड़े, उन्हें लोकसंग्रहके लिये धैर्य और उत्साहसे तथा निष्काम बुद्धिसे कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिये, क्योंकि मनुष्यका जन्म उसी कामके लिये हुआ है; न कि केवल सुखोपभोगके लिये। कुछ लोग गीताके नीतिधर्मको केवल चातुर्वर्ण्य-मूलक समझते हैं; लेकिन उनकी यह समझ ठीक नहीं है। चाहे समाज हिंदुओंका हो या म्लेच्छोंका, चाहे वह प्राचीन हो या अर्वाचीन, चाहे वह पूर्वी हो या पश्चिमी, यदि उस समाजमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रचलित हो, तो उस व्यवस्थाके अनुसार, या दूसरी समाज- व्यवस्था जारी हो, तो उस व्यवस्थाके अनुसार, जो काम अपने हिस्सेमें आ पड़े अथवा जिसे हम अपनी रुचिके अनुसार कर्तव्य समझकर एक बार स्वीकृत कर लें, वही अपना स्वधर्म हो जाता है; और गीता कहती है, कि किसीभी कारणसे इस धर्मको ऐन मौकेपर छोड़ देना और दूसरों कामोंमें लग जाना, धर्मकी तथा सर्वभूतहितकी दृष्टिसे निंदनीय है। यही तात्पर्य "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" (गीता ३. ३५) - अर्थात् स्वधर्मपालनमें यदि मृत्यु हो जाय, तो वहभी श्रेयस्कर है; परंतु दूसरोंका धर्म भयावह होता है, इस गीता-वचनका है। इसी न्यायके अनुसार माधवराव पेशवाको जिन्होंने ब्राह्मण होकरभी तत्कालीन देशकालानुरूप क्षात्र-धर्मका स्वीकार किया था, रामशास्त्रीने यह उपदेश किया था, कि "स्नान-संध्या और पूजापाठमें सारा समय व्यतीत न कर क्षात्र-धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेमें अपना सब समय लगा देनेसेही तुम्हारा उभय लोकमें कल्याण होगा" यह बात महाराष्ट्र इतिहासमें प्रसिद्ध है। गीताका मुख्य उपदेश यह बतलानेका नहीं है, कि समाज-धारणाके लिये कैसी व्यवस्था होनी चाहिये। गीता-शास्त्रका तात्पर्य यही है, कि समाज-व्यवस्था चाहे कैसीभी हो; उसमें जो यथाधिकार कर्म तुम्हारे हिस्सेमें पड़ जाएँ, उन्हें उत्साह- पूर्वक करके सर्वभूतहितरूपी आत्मश्रेयकी सिद्धि करो। इस तरहसे कर्तव्य मानकर गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ पुरुष जो कर्म किया करते हैं, वे स्वभावसेही लोककल्याण- कारक हुआ करते हैं। गीता-प्रतिपादित इस कर्मयोगमें और पाश्चात्त्य आधिभौतिक कर्ममार्गमें यह एक बड़ा भारी भेद है, कि गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञोंके मनमें यह अभिमान-बुद्धि रहतीही नहीं, कि मैं अपने कर्मोंके द्वारा लोककल्याण करता हूँ; बल्कि उनके देहस्वभावहीमे साम्य-बुद्धि आ जाती है; और इसीसे वे लोग अपने समयकी समाज-व्यवस्थाके अनुसार केवल कर्तव्य समझ कर जो जो कर्म किया करते हैं. वे सब स्वभावतः लोककल्याणकारक हुआ करते हैं; और आधुनिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रकार संसारको सुखमय मानकर कहाँ करते हैं, कि इस संसारमें सब लोगोंको सुखकी प्राप्ति करा देनेके लिये लोककल्याणका कार्य करना चाहिये। तथापि सभी पाश्चात्त्य आधुनिक कर्मयोगी संसारको सुखमय नही मानते। शोपेनहरके समान संसारको दुःख-प्रधान माननेवाले पंडितभी वहाँ हैं, जो यह प्रति पादन करते हैं, कि यथाशक्ति लोगोंके दुःखका निवारण करना ज्ञानी पुरुषोंका गी. र. ३२