भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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४३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानेकी लालसासे संसारके कर्मोंमें प्रवृत्त होता है, उसकी साम्य-बुद्धिरूप सात्त्विक वृत्तिमें कुछ-न-कुछ बट्टा अवश्य लग जाता है, इसलिये गीताका यह उपदेश, है, कि संसार दुःखमय हो या सुखमय, सांसारिक कर्म जब छूटतेही नहीं, तब उनके सुखदुःखका विचार करते रहनेमें कुछ लाभ नहीं होगा। चाहे सुख हो या दुःख। परंतु मनुष्यका यही कर्तव्य है, कि वह इस बातमें अपना महद्भाग्य समझे, कि उसे नरदेह प्राप्त हुई है; और कर्म-सृष्टिके इस अपरिहार्य व्यवहारमें जो कुछ प्रसंगानुसार प्राप्त हो, उसे अपने अंतःकरणको निगण न करके इस न्याय् अर्थात् साम्य-बुद्धिमे सहता रहे, कि “दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः” (गीता २. ५६) ; एवं अपने अधिकारानुसार जो कुछ कर्म शास्त्रतः अपने हिस्सेमें आ पड़े, उसे जीवन- पर्यत, और किसीके लिये नहीं; किंतु संसारके धारण-पोषणके लिये, निष्काम बुद्धिसे करना रहे। गीताकालमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था जारी थी, इसीलिये बतलाया गया है, कि ये सामाजिक कर्म चातुर्वर्ण्यके विभागके अनुसार हरएकके हिस्सेमें आ पड़ते हैं और अठारहवें अध्यायमें यहभी बतलाया गया है, कि ये भेद गुणकर्म-विभागसे कैसे निष्पन्न होते हैं ‘( गीता १८. ४१-४४) । परंतु इससे किसीको यह न समझ लेना चाहिये, कि गीताके नीति-तत्त्व चातुर्वर्ण्यरूपी समाजव्यवस्थापरही अवलंबित हैं। यह बात महाभारतकारकेभी ध्यानमें पूर्णतया आ चुकी थी, कि अहिंसादि नीति-धर्मोंकी व्याप्ति केवल चातुर्वर्ण्यके लियेही नहीं है, बल्कि ये धर्म मनुष्यमात्रके लिये एक समान हैं। इसीलिये महाभारतमें स्पष्ट रीतिसे कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्यके बाहर जिन अनार्य लोगोंमें ये धर्म प्रचलित हैं, उन लोगोंकीभी रक्षा राजाको इन सामान्य कर्मोंके अनुसारही करनी चाहिये (शां. ६५. १२-२२)। अर्थात् गीतामेंही कही गई नीतिकी उपपत्ति चातुर्वर्ण्यसरीखी किसी एक विशिष्ट समाजव्यवस्थापर अव- लंबित नहीं है; किंतु सर्वसामान्य आध्यात्मिक ज्ञानके आधारपरही उसका प्रति- पादन किया गया है। गीताके नीति-धर्मका मुख्य तात्पर्य यही है, कि जो कर्तव्य-कर्म शास्त्रतः प्राप्त हो, उसे निष्काम और आत्मौपम्य-बुद्धिसे करना चाहिये; और सब देशोंके लोगोंके लिये यह एकही समान उपयोगी है। परंतु, यद्यपि आत्मौपम्य-दृष्टिका और निष्काम कर्माचरणका यह सामान्य नीति-तत्त्व सिद्ध हो गया, तथापि इस बातकाभी स्पष्ट विचार कर लेना आवश्यक है, कि यह नीति-तत्त्व जिन कर्मोंको उपयोगी होता है, वे कर्म इस समाजमें प्रत्येक व्यक्तिको कैसे प्राप्त होते हैं। इसे बतलानेके लियेही, उस समयमें उपयुक्त होनेवाले महज उदाहरणके नातेसे गीतामें चातुर्वर्ण्यका उल्लेख किया गया है, और, साथ साथ गुणकर्म-विभागके अनुसार उस समाजव्यवस्थाकी संक्षेपमें उपपत्तिभी बतलाई है। परंतु इस बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि वह चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाही कुछ गीताका मुख्य भाग नहीं है। सारे गीताशास्त्रका व्यापक सिद्धान्त यही है, कि यदि कहीं चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रचलित न हो अथवा वह किसी गिरी दशामें हो; तो वहांभी तत्कालीन प्रचलित समाज-