श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४९५ थे - “ईसाके भक्तोंको द्रव्य-संचय न करके रहना चाहिये” (मेथ्यू. १० ९-१५)। ईसाई धर्मोपदेशकोंमें तथा ईसाके भक्तोंमें गृहस्थ-धर्मसे संसारमें रहनेकी जो रीति पाई जाती है, वह बहुत दिनोंके बादके सुधारोंका फल है - वह मूल ईसाई धर्मका स्वरूप नहीं है। वर्तमान समयमेंभी शोपेनहर सरीखे विद्वान् यही प्रतिपादित करते हैं, कि संसार दुःखमय होनेके कारण त्याज्य है; और पहले यह बतलाया जा चुका है, कि ग्रीस देशमें प्राचीन कालमें यह प्रश्न उपस्थित हुआ था, कि तत्त्व-विचारमेंही अपने जीवनको व्यतीत कर देना श्रेष्ठ है, या लोकहितके लिये राजकीय मामलोंमें प्रयत्न करते रहना श्रेष्ठ है। सारांश यह है, कि पश्चिमी लोगोंका यह कर्मत्याग-पक्ष और हम लोगोंका संन्यास-मार्ग कई अंशोंमें एकही है; और इन मार्गोंका समर्थन करनेकी पूर्वी और पश्चिमी पद्धतिभी एकही-सी है। परंतु आधुनिक पश्चिमी पंडित कर्मत्यागकी अपेक्षा कर्म-मार्गकी श्रेष्ठताके जो कारण बतलाते हैं, वे गीतामें दिये गये प्रवृत्ति-मार्गके प्रतिपादनसे भिन्न हैं, इसलिये अब इन दोनोंके भेदकोभी यहाँ- पर अवश्य बतलाना चाहिये। पश्चिमी आधिभौतिक कर्म-मार्गियोंका कहना है, कि संसारके सब मनुष्योंका अथवा अधिकांश लोगोंका अधिक सुख - अर्थात् ऐहिक सुख-ही इस जगत्में परम साध्य है, अतएव सब लोगोंके सुखके लिये प्रयत्न करते हुए उसी सुखमें स्वयंभी मग्न हो जाना प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है, और इसकी पुष्टिके लिये उनमेंसे अधिकांश पंडित यह प्रतिपादनभी करते हैं, कि संसारमें दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक है। इस दृष्टिसे देखनेपर यही कहना पड़ता है, कि पश्चिमी कर्म-मार्गीय लोग “सुख-प्राप्तिकी आशासे सांसारिक कर्म करनेवाले” होते हैं; और पश्चिमी कर्मत्यागमार्गीय लोग “संसारसे उबे हुए” होते हैं; तथा कदाचित् इसी कारणसे उनको क्रमानुसार 'आशावादी' और 'निराशावादी' कहते हैं।* परंतु भगवद्गीतामें जिन दो निष्ठाओंका वर्णन है, वे इनसे भिन्न हैं। चाहे स्वयं अपने लिये हो या परोपकारके लिये हो, कुछभी हो; परंतु जो मनुष्य ऐहिक विषयसुख नामक काव्यमें यह लिखा है - “Thou shalt renounce ! That is the eternal song which ring in everyone's ears; which, our whole life-long every hour is hoarsely singing to us. ” ( Faust, Part I, II. 1195- 1198)। मूल इसाई धर्मके संन्यास-प्रधान होनेके विषयमें कितनेही अन्य आधार और प्रमाण दिये जा सकते हैं।
- जेम्स सलीने (James Sulli) अपने Pessimism नामक ग्रंथमें Optimist और Pessimist नामक दो पंथोंका वर्णन किया है। इनमेंसे Optimist का अर्थ 'उत्साही, आनंदित' और Pessimist का अर्थ 'संसारसे त्रस्त' होता है; और हमने पहले एक टिप्पणीमें बतला दिया है, कि ये शब्द गीताके 'योग' और 'सांख्य'के पूर्णरूपसे समानार्थक नहीं हैं (पृष्ठ ३०६)। 'दुःखनिवारणेच्छुक' नामक जो एक तीसरा पंथ है और जिसका वर्णन आगे किया गया है, उसका सलीने Meliorism नाम रखा है।