श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 539, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें४९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
दिया है कि, "तू अपने घरद्वारको बेच दे या किसी गरीबको डाल दे; और मेरा भक्त बन" (मेथ्यू. १९. १६-३०; मार्क १९. २१-३१); और वे तुरंत अपने शिष्योंकी ओर देख उनसे कहने लगे, कि सुईके छेदसे ऊँट भलेही निकल जाय, परंतु ईश्वरके राज्यमें किसी धनवानका प्रवेश होना कठिन है।" यह कहनेमें कोई अतिशयोक्ति नहीं दीख पड़ती, कि यह उपदेश याज्ञवल्क्यके इस उपदेशकी नकल है, कि जो उन्होंने मैत्रेयीको किया था। वह उपदेश यह है - "अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन" (बृ. २. ४. २) - द्रव्यसे अमृतत्व मिलनेकी आशा नहीं है। गीतामें कहा गया है, कि अमृतत्व प्राप्त करनेके लिये सांसारिक कर्मोंको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें निष्काम बुद्धिसे करतेही रहना चाहिये; परंतु ऐसा उपदेश ईसाने कहींभी नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने यही कहा है, कि सांसारिक संपत्ति और परमेश्वरके बीच चिरस्थायी विरोध है (मेथ्यू. ६. २४), इसलिये "माँ-बाप, घर-द्वार, स्त्री-बच्चे और भाई-बहिन एवं स्वयं अपने जीवनसेभी द्वेष करके जो मनुष्य मेरा अनुयायी नहीं बनता, वह मेरा भक्त कभी हो नहीं सकता" (ल्यूक. १४. २६-३३)। ईसाके शिष्य पालकाभी स्पष्ट उपदेश है, कि "स्त्रियोंको स्पर्शतकभी न करना सर्वोत्तम पक्ष है" (१. कारि. ७. १), इसी प्रकार, हम पहलेही कह चुके हैं, कि ईसाके मुंहसे निकले हुए - "हमारी जन्मदात्री* माता, हमारी कौन होती है? हमारे आसपासके ईश्वरभक्तही हमारे माँ-बाप और बंधु हैं" (मेथ्यू. १२. ४६-५०) - इस वाक्यमें, और "किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोकः" बृहदारण्यकोपनिषदके संन्यासविषयक इस वचनमें (बृ. ४. ४. २२) बहुत कुछ समानता है। स्वयं बाइबलकेही इन वाक्योंसे यह सिद्ध होता है, कि जैन और बौद्ध धर्मोंके सदृशही ईसाई धर्मभी आरंभमें संन्यास-प्रधान अर्थात् संसारको त्याग देनेका उपदेश देनेवाला है, और ईसाई धर्मके इतिहासको देखनेसेभी यही मालूम होता है† कि ईसाके इस उपदेशानुसारही पहले ईसाई धर्मोपदेशक वैराग्यसे रहा करते
- यह तो संन्यास-मार्गियोंका हमेशाहीका उपदेश है। शंकराचार्यका "का ते कान्ता कस्ते पुत्रः" यह श्लोक प्रसिद्धही है; और, अश्वघोषके 'बुद्धचरित' (६.४५) में यह वर्णन पाया है, कि बुद्धके मुखसे "क्वाहं मातुः क्व सा मम" ऐसा उद्गार निकला था। † See Paulen's System of Ethics (Eng. trans.) Book I. Chap. 2 and 3; esp. pp. 89-97. "The new (Christian) converts seemed to renounce their family and country ..... their gloomy and austere aspect, their abhorrence of the common business and pleasures of life, and their frequent predictions of impending calamities inspired the pagans with the apprehension of some danger which would arise from the new sect." Historian's History of the World, Vol. VI, p. 318. जर्मन कवि गटेने अपने Faust (फॉस्ट)