श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४९३ अध्यात्मज्ञानकी वृद्धि प्राचीन कालमें हिंदुस्थानमें जैसी हो चुकी है, वैसी और कहींभी नहीं हुई, इसलिये किसी अन्य देशमें, कर्मयोगके ऐसे आध्यात्मिक उपपादनका पहले पाया जाना बिलकुल संभव नहीं था - और, यह विदितही है, कि ऐसा उपपादन कहीं पायाभी नहीं जाता। यह स्वीकार होनेपर भी - कि इस संसारके अशाश्वत होनेके कारण इसमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है (गीता ९. ३३) - गीतामें जो यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है, कि "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" - सांसारिक कर्मोंका कभी न कभी संन्यास करनेकी अपेक्षा उन्हीं कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे लोककल्याणके लिये करते रहना अधिक श्रेयस्कर है (गीता ३. ८; ५. २), उसके साधक तथा बाधक कारणोंका विचार ग्यारहवें प्रकरणमें किया जा चुका है। परंतु गीता इस कर्मयोगकी पश्चिमी कर्म-मार्गसे अथवा हमारे यहाँके संन्यास-मार्गकी पश्चिमी कर्मत्याग-पक्षसे, तुलना करते समय उक्त सिद्धान्तका कुछ अधिक स्पष्टीकरण करना आवश्यक मालूम होता है। यह मत वैदिक धर्ममें पहले पहल उपनिषत्कारों तथा सांख्यवादियों- द्वारा प्रचलित किया गया है, कि दुःखमय तथा निस्सार संसारसे बिना निवृत्त हुए मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसके पूर्वका वैदिक धर्म प्रवृत्ति-प्रधान अर्थात् कर्म- काण्डात्मकही था, परंतु यदि वैदिक धर्मको छोड़ अन्य धर्मोंका विचार किया जाय, तो यह मालूम होगा, कि उनमेंसे बहुतोंने आरंभसेही संन्यास-मार्गको स्वीकार कर लिया था। उदाहरणार्थ, जैन और बौद्ध धर्म पहलेहीसे निवृत्ति-प्रधान हैं; और ईसामसीहकाभी वैसाही उपदेश है। बुद्धने अपने शिष्योंको यदि अंतिम उपदेश दिया है, कि "संसारका त्याग करके यति-धर्ममें रहना चाहिये, स्त्रियोंकी ओर देखना नहीं चाहिये; और उनसे बातचीतभी नहीं करना चाहिये" (महापरि- निव्वाण सुत्त ५. २३); ठीक इसी तरह मूल ईसाई धर्मकाभी कथन है। ईसाने कहा है, कि "तू अपने पड़ोसीको अपनेही समान प्यार कर" (मेथ्यू १९. १९); और, पालकाभी कथन है, कि "तू जो कुछ खाता, पीता या करता है, वह सब ईश्वरके लिये कर" (१ कारि. १०. ३१); और ये दोनों उपदेश ठीक उसी तरहके हैं, जैसे कि गीतामें आत्मौपम्य-बुद्धिसे ईश्वरार्पणपूर्वक कर्म करनेको कहा गया है (गीता ६. २९; ९. २७)। परंतु केवल इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं होता, कि ईसाई धर्म गीता-धर्मके समान प्रवृत्ति-प्रधान है। क्योंकि ईसाई धर्ममेंभी अंतिम साध्य यही है, कि मनुष्यको अमृतत्व मिले तथा वह मुक्त हो जावे; और उसमें यहभी प्रतिपादन किया गया है, कि यह स्थिति घरद्वार त्यागे बिना प्राप्त नहीं हो सकती, अतएव ईसा मसीहके मूल धर्मको संन्यास-प्रधानही कहना चाहिये। स्वयं ईसा मसीह अंततक अविवाहित रहे। जब एक समय एक आदमीने उनसे प्रश्न किया, कि "माँ-बाप तथा पड़ोसियोंको प्यार करनेके धर्मका मैं अबतक पालन करता चला आया हूँ, अब मुझे यह बतलाओ, कि अमृतत्व मिलनेमें क्या कसर है?" तब ईसाने साफ़ उत्तर