भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 537

४९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गहरे पानीमें पैठना ठीक नहीं है; वे अपने नीतिशास्त्रका विवेचन, ब्रह्मात्मैक्यरूप परम साध्यकी उच्च श्रेणीको छोड़ कर, मानव-जातिका कल्याण या सर्वभूतहित जैसे निम्न कोटिके आधिभौतिक दृश्य परंतु अनित्य, तत्त्वसेही शुरू किया करते हैं। स्मरण रहे, कि किसी पेड़की चोटीको तोड़ देनेसेही वह नया पेड़ नहीं कहलाता; उसी तरह आधिभौतिक पंडितोंका निर्माण किया हुआ नीतिशास्त्र भोंडा या अपूर्ण भले ही हो; परंतु वह नया नहीं हो सकता। ब्रह्मात्मैक्यको न मानकर प्रत्येक पुरुषको स्वतंत्र माननेवाले हमारे यहाँके सांख्य-शास्त्रज्ञ पंडितोंनेभी, यही देख कर, कि दृश्य-जगतका धारण-पोषण और विनाश किन गुणोंके द्वारा होता है; सत्त्व-रज- तम तीनों गुणोंके लक्षण निश्चित किये हैं; और फिर प्रतिपादन किया हैं, कि इनमेंसे सात्त्विक सद्गुणोंका परम उत्कर्ष करनाही मनुष्यका कर्तव्य है, तथा मनुष्यको इसीसे अंतमें त्रिगुणातीत अवस्था मिलकर मोक्षकी प्राप्ति होती है। भगवद्गीताके सत्रहवें तथा अठारहवें अध्यायोंमें थोड़े भेदके साथ इसीका वर्णन है। * सच देखा जाय, तो क्या सात्त्विक सद्गुणोंका परम उत्कर्ष, और आधिभौतिकवादके अनुसार क्या परोपकार-बुद्धिकी अथवा मनुष्यत्वकी वृद्धि, दोनोंका अर्थ एक-ही है। महाभारत और गीतामें इन सब अधिभौतिक तत्त्वोंका स्पष्ट उल्लेख तो है ही; बल्कि महा- भारतमें यहभी साफ़ साफ़ कहा गया है, कि धर्म-अधर्मके नियमोंके लौकिक या बाह्य उपयोगका विचार करनेपर यही जान पड़ता है, कि ये नीति-धर्म सर्वभूतहितार्थ अर्थात् लोककल्याणार्थ ही हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक पंडितोंका किसीभी अव्यक्त तत्त्वपर विश्वास नहीं है, इसलिये यद्यपि वे जानते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे कार्य- अकार्यका निर्णय करनेके लिये आधिभौतिक तत्त्व पूरा काम नहीं देते; तोभी वे निरर्थक शब्दोंका आडंबर बढ़ाकर व्यक्त तत्त्वसेही अपना निर्वाह किसी तरह कर लिया करते हैं। गीतामें ऐसा नहीं किया गया है, किंतु इन तत्त्वोंकी परंपराको पिंड- ब्रह्मांडके मूल अव्यक्त तथा नित्य-तत्त्वतक ले जाकर मोक्ष, नीतिधर्म और व्यवहार इन तीनोंकीभी पूरी एकवाक्यता तत्त्वज्ञानके आधारसे गीतामें भगवानने सिद्ध कर दिखाई है; और इसलिये अनुगीताके आरंभमें स्पष्ट कहा गया है, कि कार्य-अकार्य निर्णयार्थ जो धर्म बतलाया गया है, वही मोक्ष-प्राप्ति करा देनेके लियेभी समर्थ है (मभा. अश्व. १६. १२)। जिनका यह मत होगा कि, मोक्षधर्म और नीति- शास्त्रको अथवा अध्यात्मशास्त्र और नीतिको एकमें मिला देनेकी आवश्यकता नहीं है, उन्हें उक्त उपपादनका महत्त्वही मालूम नहीं हो सकता। परंतु जो लोग इसके संबंधमें उदासीन नहीं हैं, उन्हे निस्संदेह यह मालूम हो जायगा, कि गीतामें किया गया कर्मयोगका प्रतिपादन आधिभौतिक विवेचनकी अपेक्षा श्रेष्ठ तथा ग्राह्य है।

  • बाबू किशोरीलाल सरकार, एम्. ए., बी. एल्. ने The Hindu System of Moral Science नामक जो एक छोटासा-ग्रंथ लिखा है, वह इसी ढंगका है; अर्थात् उसमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुणोंके आधारपर विवेचन किया गया है।