भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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आप-ही-आप प्रवृत्त हो जाता है; और सत्य मार्गका अग्रेसर बन जाता है। क्योंकि उसे यह पूरी तौरसे मालूम रहता है, कि अविनाशी तथा त्रिकालाबाधित सत्य कौन-सा है। मनुष्यकी यह आध्यात्मिक पूर्णावस्थाही सब नीति-नियमोंका मूल उद्गमस्थान है, और इसेही वेदान्तमें 'मोक्ष' कहते हैं। किसीभी नीतिको लीजिये; वह इस अंतिम साध्यसे अलग नहीं हो सकती, इसलिये नीतिशास्त्रका या कर्मयोगशास्त्रका विवेचन करते समय आखिर इसी तत्त्वकी शरणमें जाना पड़ता है। सर्वात्मैक्यरूप अव्यक्त मूल तत्त्वकाही एक व्यक्त स्वरूप सर्वभूतहितेच्छा है; और सगुण परमेश्वर तथा दृश्य सृष्टि दोनों उस आत्माकेही व्यक्त स्वरूप हैं, जो सर्वभूतांतर्गत, सर्वव्यापी और अव्यक्त है; और इस व्यक्त स्वरूपके आगे परे जाकर अव्यक्त आत्माका ज्ञान प्राप्त किये बिना, ज्ञानकी पूर्ति तो होतीही नहीं, किंतु इस संसारमें हर एक मनुष्यका जो यह परम कर्तव्य है, कि शरीरस्थ आत्माको पूर्णावस्थामें पहुँचा दे; वहभी इस ज्ञानके बिना सिद्ध नहीं हो सकता। चाहे नीतिको लीजिये, व्यवहारको लीजिये, धर्मको लीजिये अथवा किसीभी दूसरे शास्त्रको लीजिये; अध्यात्मज्ञानही सबकी अंतिम गति है—"सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।" हमारा भक्ति-मार्गभी इसी तत्त्वज्ञानका अनुसरण करता है, इसलिये उसमेंभी यही सिद्धान्त स्थिर रहता है, कि ज्ञान-दृष्टिसे निष्पन्न होनेवाला साम्य-बुद्धिरूपी तत्त्वही मोक्षका तथा सदाचरणका मूल स्थान है। वेदान्तशास्त्रसे सिद्ध होनेवाले उक्त तत्त्वपर एकही महत्त्वपूर्ण आक्षेप किया जा सकता है, कि कुछ वेदान्ती ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर सब कर्मोंका संन्यास कर देना उचित मानते हैं, इसीलिये यह दिखला कर—कि ज्ञान और कर्ममें विरोध नहीं है, गीतामें कर्मयोगके इस सिद्धान्तका विस्तारसहित वर्णन किया गया है, कि वासनाका क्षय होनेपरभी ज्ञानी पुरुष अपने सब कर्मोंको परमेश्वरार्पणपूर्वक-बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये केवल कर्तव्य समझ करही करता चला जावे। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये यह उपदेश अवश्य दिया गया है, कि तू परमेश्वरको सब कर्म समर्पण करके युद्ध कर; परंतु यह उपदेश केवल तत्कालीन प्रसंगको देखकरही किया है (गीता ८.७)। उक्त उपदेशका भावार्थ यही मालूम होता है, कि अर्जुनके समानही किसान, सुनार, लोहार, बढ़ई, बनिया, ब्राह्मण, व्यापारी, लेखक उद्यमी इत्यादि सभी लोग अपने अपने अधिकारानुरूप अपने व्यवहारोंको परमेश्व- रार्पण-बुद्धिसे करते हुए संसारका धारण-पोषण करते रहें; जिसे जो रोजगार निसर्गतः प्राप्त हुआ है, उसे यदि वह निष्काम बुद्धिसे करता रहे, तो कर्ताको कुछभी पाप नहीं लगेगा, सब कर्म एकहीसे हैं; दोष केवल कर्ताकी बुद्धिमें है, न कि उसके कर्मोंमें, अतएव बुद्धिको सम करके यदि सब कर्म किये जायँ, तो परमेश्वरकी उपासना हो जाती है, पाप नहीं लगता; और अंतमें सिद्धिभी मिल जाती है। परंतु जिन (विशेषतः अर्वाचीन कालके) लोगोंका यह दृढ़-संकल्प-सा हो गया है, कि चाहे कुछभी हो जाय, इस नाशवान् दृश्य-सृष्टिके आगे बढ़कर आत्म-अनात्म-विचारके