श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें४९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुलभ तथा व्यापक तत्त्वको छोड़कर, 'सर्वभूतहित' या “अधिकांश लोगोंका अधिक हित” जैसे आधिभौतिक और बाह्य तत्त्वपरही नीतिमत्ताको स्थापित करनेका जो प्रयत्न किया, वह इसीलिये किया है, कि पिंड-ब्रह्मांडसंबंधी उनके मत प्राचीन मतोंसे भिन्न हैं । परंतु जो लोग उक्त नूतन मतोंको नहीं मानते; और जो इन प्रश्नोंका स्पष्ट तथा गंभीर विचार कर लेना चाहते हैं, कि, “मैं कौन हूँ ? सृष्टि क्या है ? मुझे इस सृष्टिका ज्ञान कैसे होता है ? जो सृष्टि मुझसे बाहर है, वह स्वतंत्र है या नहीं ? यदि है, तो उसका मूल तत्त्व क्या है ? इस तत्त्वसे मेरा क्या संबंध है ? एक मनुष्य दूसरेके सुखके लिये अपनी जान क्यों देवे ?” “जो जन्म लेते हैं, वे मरतेभी हैं” इस नियमके अनुसार यदि यह बात निश्चित है, कि “जिस पृथ्वीपर हम रहते हैं, उसका और उसके साथ समस्त प्राणियोंका किसी दिन अवश्य नाश हो जायगा ; तो नाशवान् भविष्यकी पीढ़ियोंके लिये हम अपने सुखका नाश क्यों करें ?” - अथवा जिन लोगोंका केवल इस उत्तरसे पूरा समाधान नहीं होता हो, कि “परोपकार आदि मनोवृत्तियाँ इस समय कर्ममय, अनित्य और दृश्य-सृष्टिकी नैसर्गिक प्रवृत्तियाँही हैं,” और जो यह जानना चाहते हैं, कि इन नैसर्गिक प्रवृत्तियोंका मूल कारण क्या है - उनके लिये अध्यात्मशास्त्रके नित्य तत्त्वज्ञानका सहारा लेनेके सिवा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है; और, इसी कारणसे ग्रीनने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथका आरंभ इसी तत्त्वके प्रतिपादनसे किया है, कि जिस आत्माको जड़ सृष्टिका ज्ञान होता है, वह आत्मा जड़ सृष्टिसे अवश्यही भिन्न होगा; और कांटने पहले व्यवसायात्मिका बुद्धिका विवेचन करके फिर वासनात्मक बुद्धिकी तथा नीतिशास्त्रकी मीमांसा की है । “मनुष्य अपने सुखके लियेही या अधिकांश लोगोंको सुख देनेके लियेही पैदा हुआ है” - यह कथन ऊपरसे चाहे कितनाही मोहक तथा उत्तम दिखे, परंतु वस्तुतः यह सच नहीं है । यदि हम क्षणभर इस बातका विचार करें, कि जो महात्मा केवल सत्यके लिये प्राण-दान करनेको तैयार रहते हैं, उनके मनमें क्या यही हेतु रहता है, कि भविष्यकी पीढ़ीके लोगोंको अधिकाधिक विषय-सुख प्राप्त होवें, तो यही कहना पड़ता है, कि अपने तथा अन्य लोगोंके अनित्य आधिभौतिक सुखोंकी अपेक्षा इस संसारमें मनुष्यका औरभी कुछ दूसरा अधिक महत्त्वका परम साध्य या उद्देश्य अवश्य है । यह उद्देश्य क्या है ? जिन्होंने पिंड-ब्रह्मांडके नामरूपात्मक, अतएव नाशवान्, परंतु दृश्य स्वरूपसे आच्छादित आत्मस्वरूपी नित्य तत्त्वको अपनी आत्मप्रतीतिके द्वारा जान लिया है, वे लोग उक्त प्रश्नका यह उत्तर देते हैं कि अपने आत्माके अमर, श्रेष्ठ, शुद्ध, नित्य तथा सर्वव्यापी स्वरूपकी पहचान करके उसीमें रत रहनाही ज्ञानवान् मनुष्यका इस नाशवान् संसारमें पहला कर्तव्य है । जिसे सर्वभूतान्तर्गत आत्मैक्यकी इस तरहसे पहचान हो जाती है, तथा यह ज्ञान जिसकी देह तथा इंद्रियोंमें समा जाता है, वह पुरुष इस बातके सोचमें पड़ा नहीं रहता, कि यह संसार झूठ है या सच, किंतु वह सर्वभूतहितके लिये उद्योग करनेमें