भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 547

५०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तथा खोटे हैं । एवं हमारा संन्यास-धर्म वेदके आधारसे प्रवृत्त किया गया है, इसलिये यही सच्चा है” (छां. शां. भा. २. २३. १) । जो हो; यह निर्विवाद सिद्ध है, कि कलियुगमें पहले जैन और बौद्ध लोगोंनेही यति-धर्मका प्रचार किया था । परंतु बौद्ध यतियोंनेभी धर्मप्रसार तथा लोकसंग्रहके लिये आगे चलकर उपर्युक्त क्रम करना शुरू कर दिया था; और इतिहासमे मालूम होता है, कि इनको हरानेके लिये श्रीशंकराचार्यने जो वैदिक यति-संघ तैयार किये थे, उन्होंनेभी कर्मको बिलकुल न त्याग कर अपने उद्योगसेही वैदिक धर्मकी फिरसे स्थापना की । अनंतर शीघ्रही इस देशपर मुसलमानोंकी चढ़ाइयाँ होने लगीं; और जब इस परचक्रमे पराक्रमपूर्वक रक्षा करनेवाले तथा देशका धारण-पोषण करनेवाले क्षत्रिय राजाओंकी तथा देशकी कर्तृत्व- शक्तिका मुसलमानोंके जमानेमें ह्रास होने लगा; तब संन्यास और कर्मयोगमेसे संन्यास-मार्ग, क्योंकि ‘राम राम’ जपते हुए चुप बैठे रहनेकाही सांसारिक लोगोंको अधिकाधिक ग्राह्य होने लगा होगा, क्योकि तत्कालीन बाह्य परिस्थितिके लिये यही मूल एकदेशीय मा विशेष सुभीतेका हो गया था। इसके पहले यह स्थिति नही थी, क्योंकि, 'शूद्रकमलाकर'में कहे गये विष्णु-पुराणके निम्न श्लोकमेभी यही मालूम होता है :- अपहाय निजं कर्म कृष्ण कृष्णेति वादिनः । ते हरेर्द्वेषिणः पापाः धर्मार्थं जन्म यद्धरे ॥ * “ अपने ( स्वधर्मोक्त ) कर्मोंको छोड़ ( केवल ) ‘ कृष्ण कृष्ण’ कहते रहनेवाले लोग हरिके द्वेषी और पापी हैं; क्योंकि स्वयं हरिका जन्मभी तो धर्मकी रक्षा करनेके लियेही होता है।” सच पूछो, तो ये लोग न तो संन्यासनिष्ठ हैं और न कर्मयोगीभी; क्योंकि ये लोग संन्यासियोंके समान ज्ञानमे और तीव्र वैराग्यसे सब सांसारिक कर्मोंको नहीं छोड़ते हैं; और समाजमें रह करभी कर्मयोगके समान अपने हिस्सेके शास्त्रोक्त कर्तव्यका पालन निष्काम बुद्धिसे नहीं करते; इसलिये इन वाचिक संन्यासियोंकी गणना एक निरालीही तृतीय निष्ठामें होनी चाहिये, जिसका वर्णन गीतामें नहीं किया गया है। चाहे किसीभी कारणसे हो; जब लोग इस तरहमे तृतीय प्रकृतिके बन जाते हैं तब आखिर धर्मकाभी नाश हुए बिना नहीं रह सकता । ईरान देशमे पारसी धर्मके हटाये जानेके लियेभी ऐसीही स्थिति कारण हुई थी और इसीसे हिंदुस्थानमें वैदिक धर्मकेभी “ समूलं च विनश्यति ” होनेका समय आ गया था । परंतु बौद्ध धर्मके ह्रासके बाद वेदान्तके साथही गीताके भागवत धर्मका जो पुनरुज्जीवन होने लगा था, उसके कारण हमारे यहाँ यह दुष्परिणाम नहीं हो सका । जब कि दौलताबादका हिंदू राज्य मुसलमानोंने नष्ट-भ्रष्ट नहीं किया *बम्बईके छपे हुए विष्णुपुराणमे यह श्लोक हमें नहीं मिला। परंतु उसका उपयोग कमलाकर भट्ट सरीखे प्रामाणिक ग्रंथकारने किया है; इससे यह निराधारभी नहीं कहा जा सकता ।