भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

गया था, उसके कुछ वर्ष पूर्वही श्रीज्ञानेश्वर महाराजने हमारे सौभाग्यसे भगवद्- गीताको मराठी भाषामें अलंकृत कर गीताकी ब्रह्मविद्याको महाराष्ट्र प्रांतमें अति सुगम कर दिया था; और हिंदुस्थानके अन्य प्रांतोंमेंभी इसी समय अनेक साधु-संतोंने गीताके भक्ति-मार्गका उपदेश जारी कर रखा था। यवन-ब्राह्मण-चांडाल इत्यादिकों को एक समान और ज्ञानमूलक गीता-धर्मका जाज्वल्य उपदेश – चाहे वह वैराग्य- युक्त भक्तिके रूपमेंही क्यों न हो – एकही समय चारों ओर लगातार जारी था; इसलिये हिंदु धर्मका पूरा ह्रास होनेका कोई भय नहीं रहा। इतनाही नहीं, बल्कि उसकी कुछ कुछ छाप मुसलमानी धर्मपरभी जमने लगी; कबीर जैसे भक्त इस देशकी संत-मंडलीमें मान्य हो गये; और औरंगजेबके बड़े भाई शहजादा दाराने इसी समय अपनी देखरेखमें उपनिषदोंका फारसीमें भाषांतर कराया। यदि वैदिक भक्ति-धर्म अध्यात्मज्ञानको छोड़ केवल तांत्रिक श्रद्धाकेही आधारपर स्थापित हुआ होता, तो इस बातका संदेह है, कि उसमे यह विलक्षण सामर्थ्य रह सकती थी या नहीं। परंतु भागवत धर्मका यह आधुनिक पुनरुज्जीवन मुसलमानोंकेही जमानेमें हुआ है, अतएव यहभी अनेकांशोंमें केवल भक्तिप्रपंचक अर्थात् एकदेशीय हो गया है; और मूल भागवत-धर्मके कर्मयोगका स्वतंत्र महत्त्व जो एक बार घट गया था, वह उसे फिर प्राप्त नहीं हुआ। फलतः उस समयके भागवत-धर्मीय संतजन, पंडित और आचार्य लोगभी कर्मयोग संन्यास-मार्गका अंग या साधन है, यह कहनेके बदले कहने लगे, कि कर्मयोग भक्ति-मार्गका अंग या साधन है। उस समयमें प्रचलित इस सर्वसाधारण मत या समझके विरुद्ध केवल श्रीमत्समर्थ रामदासस्वामीने अपने ‘दासबोध’ ग्रंथमें विवेचन किया है। कर्मयोगके सच्चे और वास्तविक महत्त्वका वर्णन, विशेषतः उसके उत्तरार्धको शुद्ध तथा प्रासादिक मराठी भाषामें जिसे देखना हो, उसे समर्थकृत उक्त ग्रंथको, अवश्य पढ़ लेना चाहिये।* शिवाजी महाराजको श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकाही उपदेश मिला था; और मरहठोंके जमानेमें जब कर्मयोगके तत्त्वोंको समझने तथा उनके प्रचार करनेकी आवश्यकता मालूम होने लगी, तब शांडिल्य-सूत्रों तथा ब्रह्मसूत्र-भाष्यके बदले महाभारतका गद्यात्मक भाषांतर होने लगा, एवं ‘बखर’ नामक ऐतिहासिक लेखोंके रूपमें उसका अध्ययन शुरू हो गया। ये भाषांतर तंजौरके पुस्तकालयमें आज तक रखे हुए हैं। यदि यही कार्यक्रम बहुत समयतक अबाधित रीतिसे चलता, तो गीताकी सब एकपक्षीय और संकुचित टीकाओंका महत्त्व घट जाता; और कालमानके अनुसार एक वार फिर यह बात सब लोगोंके ध्यानमें आ जाती, कि महाभारतकी सारी नीतिका सार गीता-

  • हिंदी प्रेमियोंको यह जानकर हर्ष होगा, कि वे अब समर्थ रामदासस्वामीकृत इस ‘दासबोध’ नामक मराठी ग्रंथके उपदेशामृतसे वंचित नहीं रह सकते, क्योंकि इसका शुद्ध, सरल तथा हृदयग्राही अनुवाद हिंदीमेंभी हो चुका है। यह हिंदी ग्रंथ चित्रशाला प्रेस, पूनासे मिल सकता है।