श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रतिपादित कर्मयोगमें कह दिया गया है। परंतु हमारे दुर्भाग्यसे कर्मयोगका यह पुनरुज्जीवन बहुत दिनों तक नहीं टिक सका। हिंदुस्तानके धार्मिक इतिहासका विवेचन करनेका यह स्थान नही है। ऊपरके संक्षिप्त विवेचनसे पाठकोंको मालूम हो गया होगा, कि गीता-धर्ममें जो एक प्रकारकी सजीवता, तेज या सामर्थ्य है, वह संन्यास-धर्मके उस दबदबेसेभी बिल्कुल नष्ट नहीं होने पायी, कि जो मध्यकालमें दैववशात् हो गया था। तीसरे प्रकरणमें यह बतला चुके हैं, कि धर्म शब्दका धात्वर्थ 'धारणाद्धर्मः' है; और सामान्यतः उसके ये दो भेद होते हैं - एक 'पारलौकिक' और दूसरा 'व्यावहारिक' अथवा 'मोक्ष- धर्म' और 'नीति-धर्म'। चाहे वैदिक धर्मको लीजिये; बौद्ध धर्मको लीजिये, अथवा ईसाई धर्मको लीजिये, सबका मुख्य हेतु यही है, कि जगत्का धारण-पोषण हो; और मनुष्यको अंतमें सद्गति मिले, इसीलिये प्रत्येक धर्ममें मोक्ष-धर्मके साथही साथ व्यावहारिक धर्म-अधर्मकाभी विवेचन थोड़ा-बहुत किया गया है। यही नहीं; बल्कि यहाँ तक कहा जा सकता है, कि प्राचीन कालमें यह भेदही नहीं किया जाता था, कि "मोक्षधर्म और व्यावहारिक धर्म भिन्न भिन्न हैं।" क्योंकि उस समय सब लोगोकी यही धारणा थी, कि परलोकमें सद्गति मिलनेके लिये इस लोकमेंभी हमारा आचरण शुद्धही होना चाहिये। वे लोग गीताके कथनानुसार यही मानते थे, कि पारलौकिक तथा सांसारिक कल्याणकी जड़भी एकही है। परंतु आधिभौतिक ज्ञानका प्रसार होनेपर आजकल पश्चिमी देशोंमें यह धारणा स्थिर न रह सकी; और इस बातका विचार होने लगा, कि मोक्ष-धर्मरहित नीतिकी, अर्थात् जिन नियमोंसे जगत्का धारणा-पोषण हुआ करता है उन नियमोंकी, उपपत्ति बतलाई जा सकती है या नहीं; और फलतः केवल आधिभौतिक अर्थात् दृश्य या व्यक्त आधारपरही समाजधारणा- शास्त्रकी रचना होने लगी है। इसपर प्रश्न होता है, कि केवल व्यक्तसेही मनुष्यका निर्वाह कैसे हो सकेगा ? पेड़, मनुष्य इत्यादि जातिवाचक शब्दोंसेभी तो अव्यक्त अर्थही प्रकट होता है न। आमका पेड़ या गुलाबका पेड़ एक विशिष्ट दृश्य वस्तु है सही, परंतु 'पेड़' सामान्य शब्द किसीभी दृश्य अथवा व्यक्त वस्तुको नहीं दिखला सकता। इसी तरह हमारा सब व्यवहार हो रहा है। इससे यही सिद्ध होता है, कि मनमें अव्यक्तसंबंधी कल्पनाकी जागृतिके लिये पहले कुछ-न-कुछ व्यक्त वस्तु आँखोंके सामने अवश्य होनी चाहिये। परंतु इसेभी निश्चयही जानना चाहिये, कि व्यक्तही कुछ अंतिम अवस्था नहीं है; और बिना अव्यक्तका आश्रय लिये न तो हम एक कदम आगे बढ़ा सकते हैं; और न एक वाक्यभी पूरा कर सकते हैं। ऐसी अवस्थामें अध्यात्म-दृष्टिसे सर्वभूतात्मैक्यरूप परब्रह्मकी अव्यक्त कल्पनाको नीति-शास्त्रका आधार यदि न माने, तोभी उसके स्थानमें 'सर्व मानव-जाति'को -- अर्थात् आँखोंसे न दिखनेवाली अतएव अव्यक्त वस्तुको ही - अंतमें देवताके समान पूजनीय मानना पड़ता है। आधिभौतिक पंडितोंका कथन है, कि 'सर्व मानव-जातिमें' पूर्वकी तथा