भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 956 में से

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पृष्ठ 550

उपसंहार ५०५ भविष्यत्की पीढ़ियोंका समावेश कर देनेसे अमृतत्वविषयक मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्तिको संतुष्ट हो जाना चाहिये; और अब तो प्रायः वे सभी सच्चे हृदयसे यही उपदेश करने लग गये हैं, कि इस (मानव-जातिरूपी) बड़े देवताकी प्रेमपूर्वक अनन्यभावसे उपासना करना, उसकी सेवामें अपनी समस्त आयुको बिता देना तथा उसके लिये अपने सब स्वार्थोंको तिलांजलि दे देनाही प्रत्येक मनुष्यका इस संसारमें परम कर्तव्य है। फ्रेन्च पंडित कोंट द्वारा प्रतिपादित धर्मका सार यही है; और इसी धर्मको उसने अपने ग्रंथमें 'सकल मानव-जातिधर्म' या संक्षेपमें 'मानव-धर्म' कहा है।* आधुनिक जर्मन पंडित निट्शेकाभी यही हाल है। उसने तो स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया है, कि उन्नीसवीं सदीमें "परमेश्वर मर गया है" और अध्यात्मशास्त्र थोथा झगड़ा है। इतना होनेपरभी उसने अपने सभी ग्रंथोंमें आधिभौतिक-दृष्टिसेही कर्मविपाक तथा पुनर्जन्मको मंजूर करके प्रतिपादन किया है, कि काम ऐसा करना चाहिये, जो जन्मजन्मान्तरोमेभी किया जा सके। और समाजकी इस प्रकार व्यवस्था होनी चाहिये, कि जिसमे भविष्यतमें ऐसे मनुष्य-प्राणी पैदा हों, जिनकी सब मनोवृत्तियां अत्यंत विकसित होकर पूर्णावस्थामें पहुंच जावें - बस; इस संसारमें मनुष्यमात्रका परम कर्तव्य और परम साध्य यही है। इससे स्पष्ट है, कि जो लोग अध्यात्मशास्त्रको नहीं मानते, उन्हेंभी कर्म-अकर्मका विवेचन करनेके लिये कुछ-न- कुछ परम साध्य अवश्य मानना पड़ता है और यह साध्य एक प्रकारसे 'अव्यक्त' ही होता है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि आधिभौतिक नीतिशास्त्रज्ञोंके ये दो ध्येय हैं - (१) सब मानव-जातिरूप महादेवकी उपासना करके सब मनुष्योंका हित करना चाहिये; और (२) ऐसे कर्म करना चाहिये, कि जिससे भविष्यतमें अत्यंत पूर्णावस्थामें पहुंचा हुआ मनुष्य-प्राणी उत्पन्न हो सके; तथापि जिन लोगोंको इन दोनोंका उपदेश किया जाता है, उनकी दृष्टिसे वे अगोचर या अव्यक्तही बने रहते हैं। कोंट अथवा निट्शेका यह उपदेश ईसाई धर्म सरीखे तत्त्वज्ञानरहित केवल आधिदैवत भक्ति-मार्गका विरोधी भलेही हो; परंतु जिस धर्म-अधर्मशास्त्रका अथवा नीतिशास्त्रका परमधेय अध्यात्म-दृष्टिसे सर्वभूतात्मैक्य-ज्ञानरूप साध्यकी या कर्मयोगी स्थितप्रज्ञकी पूर्णावस्थाकी नींवपर स्थापित हुआ है, उसके पेटमें सब आधिभौतिक साध्योंका विरोधरहित समावेश सहजहीमें हो जाता है; और इससे कभी इस भयकी आशंका नहीं हो सकती, कि अध्यात्मज्ञानसे पवित्र किया गया वैदिक धर्म उक्त उपदेशसे क्षीण हो जावेगा। अब प्रश्न ये हैं, कि यदि अव्यक्तकोही परम * कोंटने अपने धर्मका Religion of Humanity नाम रखा है। उसका विस्तृत विवेचन कोंटके A System of Positive Polity (Eng. trans. in four vols.) नामक ग्रंथमें किया गया है। इस ग्रंथमे इस बातकी उत्तम चर्चा की गई है कि केवल आधिभौतिक दृष्टिसेभी समाज-धारणा किस तरह की जा सकती है।

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