भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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५०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

साध्य मानना पड़ता है, तो वह सिर्फ मानव-जातिके लियेही क्यों माना जाय ? अर्थात् वह मर्यादित या संकुचित क्यों कर दिया जाय ? पूर्णावस्थाकोही जब परम साध्य मानना है; तो उसमें ऐसे आधिभौतिक साध्यकी अपेक्षा, जो जानवर और मनुष्य दोनोंके लिये समान हो, अधिकताही क्या है ? इन प्रश्नोंका उत्तर देते समय अध्यात्म- दृष्टिसे निष्पन्न होनेवाले समस्त चराचर सृष्टिके एक अनिर्वाच्य परम तत्त्वकीही शरणमें आखिर जाना पड़ता है। अर्वाचीन-कालमें आधिभौतिक शास्त्रोंकी अश्रुतपूर्व उन्नति हुई है; जिससे मनुष्यका दृश्य सृष्टिविषयक ज्ञान पूर्व-कालकी अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक बढ़ गया है; और यह बातभी निर्विवाद सिद्ध है, कि 'जैसेको तैसा' इस नियमके अनुसार जो प्राचीन राष्ट्र इस आधिभौतिक ज्ञानकी प्राप्ति नहीं कर लेगा, उसका सुधरे हुए नये पाश्चात्त्य राष्ट्रोंके सामने टिकना असंभव है। परंतु आधिभौतिक शास्त्रोंकी चाहे जितनी वृद्धि क्यों न हो जावे; यह अवश्यही कहना होगा, कि जगत्के मूल तत्त्वको समझ लेनेकी मनुष्यमात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति केवल आधिभौतिक वादसे कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो सकती। केवल व्यक्त सृष्टिके ज्ञानसे सब बातोंका निर्वाह नहीं हो सकता, इसलिये स्पेन्सर सरीखे उत्क्रांति- वादीभी स्पष्टतया स्वीकार करते हैं, कि नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिकी जड़में कुछ अव्यक्त तत्त्व अवश्यही होगा। परंतु उनका यह कहना है, कि इस नित्य-तत्त्वके स्वरूपको समझ लेना संभव नहीं है, इसलिये इसके आधारसे किसीभी शास्त्रकी उपपत्ति नहीं बतलाई जा सकती - जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटभी अव्यक्त सृष्टि-तत्त्वकी अज्ञेयताको स्वीकार करता है। तथापि उसका यह मत है, कि नीतिशास्त्रकी उपपत्ति इसी अगम्य तत्त्वके आधारपर बतलाई जानी चाहिये। शोपेनहर इससेभी आगे बढ़कर प्रतिपादन करता है, कि यह अगम्य तत्त्व वासनास्वरूपी है; और नीतिशास्त्र- संबंधी अंग्रेज ग्रंथकार ग्रीनका मत है, कि यही सृष्टि-तत्त्व आत्माके रूपमें अंशतः मनुष्यके शरीरमें प्रादुर्भूत हुआ है। गीता तो स्पष्ट रीतिसे कहती है, कि "ममै- वांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।" हमारे उपनिषत्कारोंका यही सिद्धान्त है, कि जगत्का आधारभूत यह अव्यक्त तत्त्व नित्य है, एक है, अमृत है, स्वतंत्र है, आत्मरूपी है - बस; इससे अधिक इसके विषयमें और कुछ नहीं कहा जा सकता; और इस बातमें संदेह है, कि उक्त सिद्धान्तसेभी आगे मानवी ज्ञानकी गति कभी- बढ़ेगी या नहीं; क्योंकि जगत्का आधारभूत अव्यक्त तत्त्व इन्द्रियोंसे अगोचर अर्थात् निर्गुण है, इसलिये उसका वर्णन, गुण, वस्तु, या क्रिया दिखानेवाले किसीभी शब्दसे नहीं हो सकता; और इसीलिये उसे 'अज्ञेय' कहते हैं। परंतु अव्यक्त सृष्टि-तत्त्वका जो ज्ञान हमें हुआ करता है, वह यद्यपि शब्दोंसे अधिक न भी बतलाया जा सके; और इसलिये देखनेमें यद्यपि वह अल्पसा दीख पड़े, तथापि वही मानवी ज्ञानका सर्वस्व है; और इसीलिये लौकिक नीतिमत्ताकी उपपत्तिभी उसीके आधारसे बतलाई जानी चाहिये; एवं गीतामें किये विवेचनसे साफ़ मालूम हो जाता है, कि ऐसी