श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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उपपत्ति उचित रीतिसे बतलानेके लिये कुछभी अड़चन नहीं हो सकती। दृश्य-सृष्टिके हज़ारों व्यवहार किस पद्धतिसे चलाये जावें — उदाहरणार्थ, व्यापार कैसे करना चाहिये, लड़ाई कैसे जीतनी चाहिये, रोगीको कौन-सी औषधि किस समय दी जावे, सूर्य चंद्रादिकोंकी दूरीको कैसे जानना चाहिये — इसे भली भाँति समझनेके लिये हमेशा नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिके ज्ञानकीही आवश्यकता हुआ करेगी और इसमें कुछभी संदेह नहीं, कि इन सब लौकिक व्यवहारोंको अधिकाधिक कुशलतासे करनेके लिये नामरूपात्मक आधिभौतिक शास्त्रोंका अधिकाधिक अध्ययन अवश्य करना चाहिये। परंतु यह गीताका विषय नहीं है। गीताका मुख्य विषय तो यही है, कि अध्यात्म-दृष्टिसे मनुष्यकी परम श्रेष्ठ अवस्थाको बतला कर उसके आधारसे यह निर्णय कर दिया जावे, कि कर्म-अकर्मरूप नीति-धर्मका मूल तत्त्व क्या है। इनमेंसे पहले याने आध्यात्मिक परम साध्य — मोक्षके बारेमें आधिभौतिक पंथ उदासीन भलेही रहे; परंतु दूसरे विषयका, अर्थात् केवल नीति-धर्मके मूल तत्त्वोंका, निर्णय करनेके लियेभी आधिभौतिक पक्ष असमर्थ है, और पिछले प्रकरणोंमें हम बतला चुके हैं, कि प्रवृत्तिकी स्वतंत्रता, नीति-धर्मकी नित्यता तथा अमृतत्व प्राप्त कर लेनेकी मनुष्यके मनकी स्वाभाविक इच्छा, इत्यादि गहन विषयोंका निर्णय आधिभौतिक पंथसे नहीं हो सकता — उसके लिये आखिर हमें आत्मानात्म-विचारमें प्रवेश करनाही पड़ता है। परंतु अध्यात्मशास्त्रका काम कुछ इतनेहीमें पूरा नहीं हो जाता। जगत्के आधारभूत अमृतत्वकी नित्य उपासना करनेसे, और अपरोक्षानुभवसे मनुष्यके आत्माको एक प्रकारकी विशिष्ट शांति मिलनेपर उसके शील-स्वभावमें जो परि- वर्त्तन हो जाता है, वही सदाचरणका मूल है; इसलिये इस बातपर ध्यान रखनाभी उचित है, कि मानव-जातिकी पूर्णावस्थाके विषयमेंभी अध्यात्मशास्त्रकी सहायतासे जैसा उत्तम निर्णय हो जाता है, वैसा केवल आधिभौतिक सुखवादसे नहीं होता। क्योंकि यह बात पहलेभी विस्तारपूर्वक बतलाई जा चुकी है, कि केवल विषयसुख तो पशुओंका उद्देश्य या साध्य है, उससे ज्ञानवान् मनुष्यकी बुद्धिका कभी पूरा समाधान हो नहीं सकता, सुखदुःख अनित्य हैं तथा धर्मही नित्य है। इस दृष्टिसे विचार करने- पर सहजही ज्ञान हो जावेगा, कि गीताके पारलौकिक धर्म तथा नीति-धर्म दोनोंका प्रतिपादन जगत्के आधारभूत नित्य तथा अमृतत्वके आधारसेही किया गया है, इस- लिये यह परमावधिका गीता-धर्म, उस आधिभौतिकशास्त्रसे कभी हार नहीं खा सकता, जो मनुष्यके सब कर्मोंका विचार सिर्फ इस दृष्टिसे किया करता है, कि मनुष्य केवल एक उच्च श्रेणीका जानवर है। यही कारण है, कि हमारा गीता-धर्म नित्य तथा अभय हो गया है; और भगवान्नेही उसमें ऐसा सुप्रबंध कर रखा है, कि हिंदु- ओंको इस विषयमें किसीभी दूसरे धर्म, ग्रंथ, या मतकी ओर मुँह ताकनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। जब सब ब्रह्मज्ञानका निरूपण हो गया, तब याज्ञवल्क्यने राजा जनकसे