भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 553

५०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहा है, कि "अभयं वै प्राप्तोऽसि" - अब तू अभय हो गया (बृ. ४. २. ४); यही बात गीता-धर्मके ज्ञानके लिये अनेक अर्थोंमें अक्षरशः कही जा सकती है। गीता-धर्म कैसा है? वह सर्वतोपरि निर्भर और व्यापक है। वह सम है, अर्थात् वर्ण, जाति, देश या किसी अन्य भेदोंके झगड़ेंमें नहीं पड़ता; किंतु सब लोगोंको एकही मापतौलसे सद्गति देता है। वह अन्य सब धर्मोंके विषयमें यथोचित सहि- ष्णुता दिखलाता है। वह ज्ञान, भक्ति और कर्मयुक्त है; और अधिक क्या कहें? वह सनातन वैदिक धर्म-वृक्षका अत्यंत मधुर तथा अमृत फल है। वैदिक धर्ममें पहले द्रव्यमय या पशुमय यज्ञोंका अर्थात् केवल कर्मकांडकाही अधिक महात्म्य था, परंतु फिर उपनिषदोंके ज्ञानसे यह केवल कर्मकांड-प्रधान श्रौत-धर्म गौण माना जाने लगा; और उसी समय सांख्यशास्त्रकाभी प्रादुर्भाव हुआ। परंतु यह ज्ञान सामान्य जनोंको अगम्य था; और इसका झुकावभी कर्म-संन्यासकी ओरही विशेष रहा करता था, इसलिये केवल औपनिषदिक धर्मसे अथवा दोनोंकी स्मार्त एकवाक्यतासेभी सर्वसाधारण लोगोंका पूरा समाधान होना संभव नहीं था। अतएव उपनिषदोंके केवल बुद्धिगम्य ब्रह्मज्ञानके साथ प्रेमगम्य व्यक्त उपासनाके राजगुह्यका संयोग करके कर्मकांडकी प्राचीन परंपराके अनुसारही, अर्जुनको निमित्त करके गीता-धर्म सब लोंगोंको मुक्तकंठसे यही कहता है, कि "तुम अपनी अपनी योग्यताके अनुसार अपने अपने सांसारिक कर्तव्योंका पालन लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे, आत्मौ- पम्य-दृष्टिसे तथा उत्साहसे यावज्जीवन करते रहो, और उसके द्वारा ऐसे नित्य परमात्म-देवताका सदा यजन करो, जो पिंड-ब्रह्मांडमें तथा समस्त प्राणियोंमें एकत्वसे व्याप्त है; उसीमें तुम्हारा सांसारिक तथा पारलौकिक कल्याण है।" उससे कर्म, बुद्धि, (ज्ञान) और प्रेम (भक्ति) इन तीनोंके बीचका विरोध नष्ट हो जाता है; और सब आयु या जीवनही को ज्ञानमय करनेके लिये उपदेश देनेवाले अकेले गीता-धर्ममें सकल वैदिक धर्मका सारांश आ जाता है। इस नित्य-धर्मको पहचानकर, केवल कर्तव्य समझ करके, सर्वभूतहितके लिये प्रयत्न करनेवाले सैंकड़ों महात्मा और कर्ता या वीर पुरुष जब इस पवित्र भारतभूमिको अलंकृत किया करते थे, तब यह देश परमेश्वरकी कृपाका पात्र बनकर न केवल ज्ञानके वरन् ऐश्वर्यकेभी शिखरपर पहुँच गया था; और कहना नहीं होगा, कि जबसे दोनों लोकोंका साधन यह श्रेयस्कर धर्म छूट गया है, तभीसे इस देशकी निकृष्टावस्थाका आरंभ हुआ है। इसलिये ईश्वरसे आशापूर्वक अंतिम प्रार्थना यही है, कि भक्तिका, ब्रह्मज्ञानका और कर्तृत्व-शक्तिका यथोचित मेल कर देनेवाले इस तेजस्वी तथा सम गीता-धर्मके अनुसार परमेश्वरका यजन-पूजन करनेवाले सत्पुरुष इस देशमें फिरभी उत्पन्न हों। और, अंतमें उदार पाठकोंसे निम्न मंत्रद्वारा (ऋ. १०. १९१. ४) यह विनंती करके गीताका रहस्य-विवेचन यहाँ समाप्त किया जाता है, कि इस ग्रंथमें कहीं भ्रमसे कुछ न्यूनाधिकता हुई हो, तो उसे सम दृष्टिसे सुधार लीजिये :-