श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
५०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहा है, कि "अभयं वै प्राप्तोऽसि" - अब तू अभय हो गया (बृ. ४. २. ४); यही बात गीता-धर्मके ज्ञानके लिये अनेक अर्थोंमें अक्षरशः कही जा सकती है। गीता-धर्म कैसा है? वह सर्वतोपरि निर्भर और व्यापक है। वह सम है, अर्थात् वर्ण, जाति, देश या किसी अन्य भेदोंके झगड़ेंमें नहीं पड़ता; किंतु सब लोगोंको एकही मापतौलसे सद्गति देता है। वह अन्य सब धर्मोंके विषयमें यथोचित सहि- ष्णुता दिखलाता है। वह ज्ञान, भक्ति और कर्मयुक्त है; और अधिक क्या कहें? वह सनातन वैदिक धर्म-वृक्षका अत्यंत मधुर तथा अमृत फल है। वैदिक धर्ममें पहले द्रव्यमय या पशुमय यज्ञोंका अर्थात् केवल कर्मकांडकाही अधिक महात्म्य था, परंतु फिर उपनिषदोंके ज्ञानसे यह केवल कर्मकांड-प्रधान श्रौत-धर्म गौण माना जाने लगा; और उसी समय सांख्यशास्त्रकाभी प्रादुर्भाव हुआ। परंतु यह ज्ञान सामान्य जनोंको अगम्य था; और इसका झुकावभी कर्म-संन्यासकी ओरही विशेष रहा करता था, इसलिये केवल औपनिषदिक धर्मसे अथवा दोनोंकी स्मार्त एकवाक्यतासेभी सर्वसाधारण लोगोंका पूरा समाधान होना संभव नहीं था। अतएव उपनिषदोंके केवल बुद्धिगम्य ब्रह्मज्ञानके साथ प्रेमगम्य व्यक्त उपासनाके राजगुह्यका संयोग करके कर्मकांडकी प्राचीन परंपराके अनुसारही, अर्जुनको निमित्त करके गीता-धर्म सब लोंगोंको मुक्तकंठसे यही कहता है, कि "तुम अपनी अपनी योग्यताके अनुसार अपने अपने सांसारिक कर्तव्योंका पालन लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे, आत्मौ- पम्य-दृष्टिसे तथा उत्साहसे यावज्जीवन करते रहो, और उसके द्वारा ऐसे नित्य परमात्म-देवताका सदा यजन करो, जो पिंड-ब्रह्मांडमें तथा समस्त प्राणियोंमें एकत्वसे व्याप्त है; उसीमें तुम्हारा सांसारिक तथा पारलौकिक कल्याण है।" उससे कर्म, बुद्धि, (ज्ञान) और प्रेम (भक्ति) इन तीनोंके बीचका विरोध नष्ट हो जाता है; और सब आयु या जीवनही को ज्ञानमय करनेके लिये उपदेश देनेवाले अकेले गीता-धर्ममें सकल वैदिक धर्मका सारांश आ जाता है। इस नित्य-धर्मको पहचानकर, केवल कर्तव्य समझ करके, सर्वभूतहितके लिये प्रयत्न करनेवाले सैंकड़ों महात्मा और कर्ता या वीर पुरुष जब इस पवित्र भारतभूमिको अलंकृत किया करते थे, तब यह देश परमेश्वरकी कृपाका पात्र बनकर न केवल ज्ञानके वरन् ऐश्वर्यकेभी शिखरपर पहुँच गया था; और कहना नहीं होगा, कि जबसे दोनों लोकोंका साधन यह श्रेयस्कर धर्म छूट गया है, तभीसे इस देशकी निकृष्टावस्थाका आरंभ हुआ है। इसलिये ईश्वरसे आशापूर्वक अंतिम प्रार्थना यही है, कि भक्तिका, ब्रह्मज्ञानका और कर्तृत्व-शक्तिका यथोचित मेल कर देनेवाले इस तेजस्वी तथा सम गीता-धर्मके अनुसार परमेश्वरका यजन-पूजन करनेवाले सत्पुरुष इस देशमें फिरभी उत्पन्न हों। और, अंतमें उदार पाठकोंसे निम्न मंत्रद्वारा (ऋ. १०. १९१. ४) यह विनंती करके गीताका रहस्य-विवेचन यहाँ समाप्त किया जाता है, कि इस ग्रंथमें कहीं भ्रमसे कुछ न्यूनाधिकता हुई हो, तो उसे सम दृष्टिसे सुधार लीजिये :-
उपसंहार ५०९ समानो व आकूतिः समाना हृदयानि वः । समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ यथा वः सुसहासति ॥*
- यह मंत्र ऋग्वेद संहिताके अंतमे आया है। यज्ञमंडपमें एकत्रित लोगोंको लक्ष्य करके यह कहा गया है। अर्थ - "तुम्हारा अभिप्राय एक समान हो, तुम्हारे अतःकरण एक समान हों; और तुम्हारा मन एक समान हो, जिससे तुम्हारा सुसाह्य होगा; अर्थात् संघ-शक्तिकी दृढ़ता होगी।" असति = अस्ति, यह वैदिक रूप है। "यथा वः सुसहासति" इसकी द्विरुक्ति ग्रंथकी समाप्ति दिखलानेके लिये की गई है। ॥ ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
परिशिष्ट-प्रकरण गीताकी बहिरंगपरीक्षा अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च । योऽध्यापयेज्जपेद्वाऽपि पापीयाञ्जायते तु सः ॥* – स्मृति पिछले प्रकरणोंमें इस बातका विस्तृत वर्णन किया गया है, कि जब भारतीय युद्धमे होनेवाले भीषण कुलक्षय और जातिक्षयका प्रत्यक्ष दृश्य पहले पहल आँखोंके सामने उपस्थित हुआ, तब अर्जुन अपने क्षात्रधर्मका त्याग करके संन्यासका स्वीकार करनेके लिये तैयार हो गया था; और उस समय उसको ठीक मार्गपर लानेके लिये श्रीकृष्णने वेदान्तशास्त्रके आधारपर यह प्रतिपादन किया, कि कर्म- योगही अधिक श्रेयस्कर है, कर्मयोगमें बुद्धिकी प्रधानता है, इसलिये ब्रह्मात्मैक्यज्ञान में अथवा परमेश्वर-भक्तिमें अपनी बुद्धिको साम्यावस्थामे रखकर उस बुद्धिके द्वारा स्वधर्मानुसार सब कर्म करते रहनेसेही मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है, मोक्ष पानेके लिये इसके सिवा अन्य किसी बातकी आवश्यकता नहीं है; और इस प्रकार उपदेश करके, भगवानने अर्जुनको युद्ध करनेमें प्रवृत्त कर दिया । गीताका यही यथार्थ तात्पर्य है। अब "गीताको भारतमें सम्मिलित करनेका कोई प्रयोजन नहीं" इत्यादि जो शंकाएँ इस भ्रमसे उत्पन्न हुई है – कि गीताग्रंथ केवल वेदान्तविषयक और निवृत्ति-प्रधान है – उनकाभी निवारण आप-ही-आप हो जाता है। क्योकि कर्णपर्वमे सत्यानृतका विवेचन करके जिस प्रकार श्रीकृष्णने अर्जुनको युधिष्ठिरके वधमे परावृत्त किया है. उसी प्रकार उसे युद्धमे प्रवृत्त करनेके लिये गीताका उपदेशभी आवश्यक था; और यदि काव्यकी दृष्टिसे देखा जाय, तोभी यह सिद्ध होता है, कि महाभारतमें अनेक स्थानोंपर ऐसेही जो अन्योन्य प्रसंग दीख पड़ते हैं, उन सबका मूल तत्त्व कहीं-न-कहीं
- " किसी मंत्रके ऋषि, छंद, देवता और विनियोगको न जानते हुए जो ( उक्त मंत्रकी ) शिक्षा देता है अथवा जप करता है, वह पापी होता है।" यह किसी-न-किसी स्मृति-ग्रंथका वचन है, परंतु मालूम नहीं, कि किस ग्रंथका है। हाँ, उसका मूल आर्षेयब्राह्मण ( आर्षेय. १ ) श्रुति-ग्रंथमें पाया जाता है; वह यह है - “यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मंत्रेण याजयति वाऽध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गर्त वा प्रतिपद्यते ॥" अर्थात् ऋषि, छंद आदि किसीभी मंत्रके जो बहिरंग हैं, उनके बिना मंत्र नहीं कहना चाहिये। यही न्याय गीता सरीखे ग्रंथके लियेभी लगाया जा सकता है।
[उपसंहार] ५११
बतलाना आवश्यक था, इसलिये उसे भगवद्गीतामें बतलाकर व्यावहारिक धर्म- अधर्मके अथवा कार्य-अकार्य व्यवस्थितिके निरूपण की पूर्ति गीताहीमें की है। वनपर्वके ब्राह्मण-व्याध-संवादमें व्याधने वेदान्तके आधार पर इस बातका विवेचन किया है, कि "मै मांस बेचनेका रोजगार क्यों करता हूँ।" और, शांतिपर्वके तुलाधार-जाजलि- संवादमेंभी, उसी तरह, तुलाधारने अपने वाणिज्य व्यवसायका समर्थन किया है (वन. २०६-२१५; शां. २६०-२६३) । परंतु यह उपपत्ति उन विशिष्ट व्यव- सायोंहीकी है। इसी प्रकार अहिंसा, सत्य आदि विषयोंका विवेचन यद्यपि महाभारतमें कई स्थानोंपर मिलता है, तथापि वहभी एकदेशीय अर्थात् उन विशिष्ट विषयोंके लियेही है, इसलिये वह महाभारतका प्रधान भाग नही माना जा सकता; अथवा इस प्रकारके एकदेशीय विवेचनसे यहभी निर्णय नहीं किया जा सकता, कि जिन भगवान् श्रीकृष्ण और पांडवोंके उज्ज्वल कार्योंका वर्णन करनेके लिये व्यासजीने महाभारतकी रचना की है, उन महानुभावोंके चरित्रोंको आदर्श मानकर मनुष्य उस प्रकार आचरण करे या नहीं। यदि यही मान लिया जाय, कि संसार निःसार है और कभी-न-कभी संन्यास लेनाही हितकारक है, तो स्वभावतः ये प्रश्न उपस्थित होते हैं, कि श्रीकृष्ण तथा पांडवोंको इतनी झंझटमें पड़नेका कारणही क्या था? और, यदि उनके प्रयत्नोंका कुछ हेतु मान लिया जाय, तो लोकसंग्रहार्थ उनका गौरव करके व्यासजीको तीन वर्षपर्यत लगातार परिश्रम करके (मभा. आ. ६२. ५२) एक लाख श्लोकोंके इस बृहत्-ग्रंथको लिखनेका प्रयोजनही क्या था? केवल इतनाही कह देनेसे ये प्रश्न यथेष्ट हल नहीं हो सकते, कि वर्णाश्रम-कर्म चित्त-शुद्धिके लिये किये जाते हैं; क्योंकि चाहे जो कहा जाय; स्वधर्माचरण अथवा जगतके अन्य सब व्यवहार तो संन्यास-दृष्टिसे गौणही माने जाते हैं। इसलिये, महाभारतमें जिन महान् पुरुषोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है, उन महात्माओंके आचरणपर 'मूले कुठारः' न्यायसे होनेवाले आक्षेपको हटाकर, उक्त ग्रंथमें कहीं-न-कही विस्तार- पूर्वक यह बतलाना आवश्यक था, कि संसारके सब काम करने चाहिये या नहीं और यदि कहा जाय, कि करने चाहिये; तो प्रत्येक मनुष्यको अपना अपना कर्म संसारमें किस प्रकार करना चाहिये, जिससे वह कर्म उसकी मोक्ष-प्राप्तिके मार्गमें बाधा न डाल सके। नलोपाख्यान, रामोपाख्यान आदि महाभारतके उपाख्यानोंमें उक्त बातोंका विवेचन करना उपयुक्त न हुआ होता, क्योंकि ऐसा करनेसे उन उपांगोंके सदृश्य यह विवेचनभी गौणही माना गया होता। इसी प्रकार वनपर्व अथवा शांतिपर्वके अनेक विषयोंकी खिचड़ीमें यदि गीताकोभी सम्मिलित कर दिया जाता, तो उसका महत्त्व अवश्यही घट गया होता। अतएव उद्योगपर्व समाप्त होनेपर महाभारतका प्रधान कार्य-भारतीय युद्ध-आरंभ होनेके ठीक मौकेपरही, उसपर ऐसे आक्षेप किये गये हैं, जो नीति-धर्मकी दृष्टिसे अपरिहार्य दीख पड़ते हैं; और वहीं यह कर्म-अकर्म विवेचनका स्वतंत्र शास्त्र उपपत्तिसहित बतलाया गया है। सारांश,
५१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पढ़नेवाले कुछ देरके लिये यदि यह परंपरागत कथा भूल जायें, कि श्रीकृष्णजीने युद्धके आरंभमेंही अर्जुनको गीता सुनाई है; और यदि वे इसी बुद्धिसे विचार करें, कि महाभारतमें धर्म-अधर्मका निरूपण करनेके लिये रचा गया यह एक आर्ष-महाकाव्य है; तोभी यही दीख पड़ेगा, कि गीताके लिये महाभारतमें जो स्थान नियुक्त किया गया है, वही गीताका महत्त्व प्रकट करनेके लिये काव्य-दृष्टिसेभी अत्यंत उचित है । जब इन बातोंकी ठीक ठीक उपपत्ति मालूम हो गई, कि गीताका प्रतिपाद्य विषय क्या है और महाभारतमें किस स्थानपर गीता बतलाई गई है; तब ऐसे प्रश्नोंका कुछभी महत्त्व दीख नहीं पड़ता, कि "रणभूमिपर गीताका ज्ञान बतलानेकी क्या आवश्यकता थी ? कदाचित् किसीने इस ग्रंथको महाभारतमें पीछे घुसेड़ दिया होगा ! अथवा, भगवद्गीतामें दसही श्लोक मुख्य हैं या सौ ?" क्योंकि अन्य प्रकरणों मेंभी यही दीख पड़ता है, कि जब एक बार यह निश्चय हो गया, कि धर्म-निरूपणार्थ 'भारत'का 'महाभारत' करनेके लिये अमुक विषय महाभारतमें अमुक कारणसे अमुक स्थानपर रखा जाना चाहिये; तब महाभारतकार इस बातकी चिंता नहीं करते, कि उस विषयके पूर्ण निरूपणमें कितना स्थान लग जायगा । तथापि गीताकी बहिरंग-परीक्षाके संबंधमें जो अन्यान्य युक्तियाँ पेश की जाती हैं, उनपरभी अब प्रसंगानुसार विचार करके उनके सत्यांशकी जाँच करना आवश्यक है । इसलिये उनमेंसे ( १ ) गीता और महाभारत, ( २ ) गीता और उपनिषद्, ( ३ ) गीता और ब्रह्मसूत्र, ( ४ ) भागवत धर्मका उदय और गीता, ( ५ ) वर्तमान गीताका काल, ( ६ ) गीता और बौद्ध ग्रंथ, ( ७ ) गीता और ईसाइयोंकी बाइबल, इन सात विषयोंका विवेचन इस प्रकरणके सात भागोंमें क्रमानुसार किया गया है । स्मरण रहे, कि उक्त बातोंका विचार करते समय, केवल काव्यकी दृष्टिसे अर्थात् व्यावहारिक और ऐतिहासिक दृष्टिसेही महाभारत, गीता, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् आदि ग्रंथोंका विवेचन बहिरंग-परीक्षा किया करते हैं, इसलिये, अब उक्त प्रश्नोंका विचार हमभी उसी दृष्टिसे करेंगे । भाग १ - गीता और महाभारत ऊपर यह अनुमान किया है, कि श्रीकृष्णजी सरीखे महात्माओंके चरित्रोंका नैतिक समर्थन करनेके लिये, महाभारतमें कर्मयोग-प्रधान गीता, उचित कारणोंसे, उचित स्थानमें रखी गई है; और गीता महाभारतकाही एक भाग होना चाहिये; वही अनुमान इन दोनों ग्रंथोंकी रचनाकी तुलना करनेसे अधिक दृढ़ हो जाता है । परंतु तुलना करनेके पहले इन दोनों ग्रंथोंके वर्तमान स्वरूपका कुछ विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है । अपने गीता-भाष्यके आरंभमें श्रीमच्छंकराचार्यजीने स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि गीता ग्रंथमें सात-सौ श्लोक हैं; और वर्तमान समयमें प्राप्त सब प्रतियोंमेंभी उतनेही श्लोक पाये जाते हैं । इन सात-सौ श्लोकोंमेंसे १ श्लोक
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१३ धृतराष्ट्रका है, ४० संजयके, ८४ अर्जुनके और ५७५ भगवानके हैं। परंतु बंबईमें गणपत कृष्णाजीके छापाखानेमें मुद्रित महाभारतकी प्रतिमें भीष्मपर्वमें वर्णित गीताके अठारह अध्यायोंके बाद जो अध्याय आरंभ होता है, उसके (अर्थात् भीष्मपर्वके तेंतालीसवें अध्यायके) आरंभमें साढ़ेपाँच श्लोकोंमें गीतारहस्यका वर्णन किया गया है और उसमें कहा है :- षट्शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः । अर्जुनः सप्तपंचाशत् सप्तषष्टिं तु संजयः । धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ॥ “गीतामें केशवके ६२०, अर्जुनके ५७, संजयके ६७ और धृतराष्ट्रका १, इस प्रकार कुल मिलाकर ७४५ श्लोक हैं।” मद्रास इलाकेमें जो पाठ प्रचलित है, उसके अनुसार कृष्णाचार्य-द्वारा प्रकाशित महाभारतकी प्रतिमें ये श्लोक पाये जाते हैं। परंतु कलकत्तेमें मुद्रित महाभारतमें ये नहीं मिलते; और भारत-टीकाकार नीलकंठने तो इनके विषयमें यह लिखा है, कि इन साढ़ेपाँच श्लोकोंको “गौडैः न पठ्यन्ते” अतएव प्रतीत होता है, कि ये प्रक्षिप्त हैं। परंतु यद्यपि इन्हें प्रक्षिप्त मान लें; तथापि यह नहीं बतलाया जा सकता, कि गीतामें ७४५ श्लोक ( अर्थात् वर्तमान प्रतियोंमें जो ७०० श्लोक हैं उनसे ४५ श्लोक अधिक) किसे और कब मिले। महाभारत बड़ा भारी ग्रंथ है, इसलिये संभव है, कि इसमें समय समयपर अन्य श्लोक जोड़ दिये गये हों तथा कुछ निकाल डाले गये हों। परंतु यह बात गीताके विषयमें नहीं कही जा सकती। गीता-ग्रंथ सदैव पठनीय होनेके कारण वेदोंके सदृश पूरी गीताकोभी कंठाग्र करनेवाले लोग पहले बहुत थे, और अबतकभी कुछ हैं। यही कारण है, कि वर्तमान गीतामें बहुत-से पाठांतर नहीं हैं; और जो कुछ भिन्न पाठ हैं, वे सब टीकाकारोंको मालूम हैं। इसके सिवा यहभी कहा जा सकता है, कि इसी हेतुसे गीता-ग्रंथमें बराबर ७०० श्लोक रखे गये हैं, कि इसमें कोई फेरफार न कर सके। अब प्रश्न यह है, कि बंबई तथा मद्रासमें मुद्रित महाभारतकी प्रतियोंमेंही ४५ श्लोक, और वेभी सब भगवानहीके ज्यादा कहाँसे आ गये ? संजय और अर्जुनके श्लोकोंका जोड़ वर्तमान प्रतियोंमें, और इस गणनामें समान अर्थात् १२४ हैं; और ग्यारहवें अध्यायके “पश्यामि देवान्” (गीता ११. १५--३१) आदि १७ श्लोकोंके साथ मतभेदके कारण संभव है, कि अन्य दस श्लोकभी संजयके माने जावें, इसलिये कहा जा सकता है, कि यद्यपि संजय और अर्जुनके श्लोकोंका जोड़ समानही है, तथापि प्रत्येक श्लोकको पृथक् पृथक् गिननेमें कुछ फ़र्क हो गया होगा। परंतु इस बातका कुछ पता नहीं लगता, कि वर्तमान प्रतियोंमें भगवानके जो ५७५ श्लोक हैं, उनके बदले ६२० (अर्थात् ४५ अधिक) कहाँसे आ गये। यदि यह कहते हैं, कि गीताका ‘स्तोत्र’ या ‘ध्यान’ या इसी प्रकारके किसी अन्य प्रकरणका इसमें समावेश किया गया होगा; तो देखते हैं, कि बंबईमें मुद्रित महाभारतकी पोथीमें वह प्रकरण गी. र. ३३
५१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं है। इतना ही नहीं; किंतु इस पोथीवाली गीतामेंभी सात सौ-ही श्लोक हैं। अतएव, वर्तमान सात सौ श्लोकोंकी गीताहीको प्रमाण माननेके सिवा अन्य मार्ग नहीं है। यह हुई गीताकी बात; परंतु जब महाभारतकी ओर देखते हैं, तो कहना पड़ता है, कि यह विरोध कुछभी नहीं है। स्वयं भारतहीमें यह कहा है, कि महा- भारत-संहिताकी संख्या एक लाख है। परंतु रा. ब. चिंतामणराव वैद्यने महाभारतके अपने टीका-ग्रंथमें स्पष्ट करके बतलाया है, कि वर्तमान प्रकाशित पोथियोंमें उतने श्लोक नहीं मिलते; और भिन्न भिन्न पर्वोके अध्यायोंकी संख्याभी भारतके आरंभमें दी गई अनुक्रमणिकाके अनुसार नहीं है। ऐसी अवस्थामें, गीता और महाभारतकी तुलना करनेके लिये इन ग्रंथोंकी किसी-न-किसी विशेष पोथीका आधार लिये बिना काम नहीं चल सकता; अतएव श्रीमच्छंकराचार्यने जिस सात सौ श्लोकोंवाली गीताको प्रमाण माना है, उसी गीताको और कलकत्तेके बाबू प्रतापचंद्र राय-द्वारा प्रकाशित महाभारतकी पोथीको प्रमाण मानकर हमने इन दोनों ग्रंथोंकी तुलना की है; और हमारे इस ग्रंथमें उद्धृत महाभारतके श्लोकोंका स्थान-निर्देशभी, कलकत्तेमें मुद्रित उक्त महाभारतके अनुसारही किया गया है। इन श्लोकोंको बंबईकी पोथीमें अथवा मद्रासके पाठक्रमके अनुसार प्रकाशित कृष्णाचार्यकी प्रतिमें देखना हो; और यदि वे हमारे निर्दिष्ट किये हुए स्थानोंपर न मिलें, तो कुछ आगे पीछे ढूँढ़नेसे वे मिल जायेंगे। सात सौ श्लोकोंकी गीता और कलकत्तेके बाबू प्रतापचंद्र राय-द्वारा प्रकाशित महाभारतकी तुलना करनेसे प्रथम यही दीख पड़ता है, कि भगवद्गीता महाभारत- हीका एक भाग है; और इस बातका उल्लेख स्वयं महाभारतमेंही कई स्थानोंमें पाया जाता है। पहला उल्लेख आदिपर्वके आरंभमें दूसरे अध्यायमें दी गई अनु- क्रमणिकामें किया गया है। पर्व-वर्णनमें पहले यह कहा है - "पूर्वोक्तं भगवद्गीता- पर्व भीष्मवधस्ततः " (मभा. आ. २. ६९); और फिर अठारह पर्वोंके अध्यायों और श्लोकोंकी संख्या बतलाते समय भीष्मपर्वके वर्णनमें पुनश्च भगवद्गीताका स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया गया है :- कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः । मोहजं नाशयामास हेतुभिर्मोक्षदर्शिभिः ॥ "जिसमें मोक्षगर्भ कारण बतलाकर वासुदेवने अर्जुनके मनका मोहज कश्मल दूर कर दिया (मभा. आ. २. २४७)। इसी प्रकार आदिपर्वके (आ. १. १७९) पहले अध्यायमें प्रत्येक श्लोकके आरंभमें 'यदाश्रौषं' कहकर, जब धृतराष्ट्रने बतलाया है, कि दुर्योधन प्रभृतिकी जय-प्राप्तिके विषयमें किस किस प्रकार मेरी निराशा होती गई; तब यह वर्णन है, कि "ज्योंही सुना, कि अर्जुनके मनमें मोह उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णने उसे विश्वरूप दिखलाया, त्योंही जयके विषयमें मेरी पूरी निराशा हो गई।" आदिपर्वके इन तीनों उल्लेखोंके बाद शांतिपर्वके अंतमें नारायणीय धर्मका
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१५ वर्णन करते हुए गीताका फिरभी उल्लेख करना पड़ा है। नारायणीय, सात्वत, ऐकांतिक और भागवत - ये चारों नाम समानार्थक हैं। नारायणीयोपाख्यानमें (शां. ३३४-३५१) उस भक्तिप्रधान प्रवृत्ति-मार्गके उपदेशका वर्णन किया गया है, कि जिसका उपदेश नारायण ऋषि अथवा भगवानने श्वेतद्वीपमे नारदजीको किया था। पिछले प्रकरणोंमें भागवत धर्मके इस तत्त्वका वर्णन किया जा चुका है, कि वासुदेवकी एकांतभावसे भक्ति करके इस जगत्के सब व्यवहार स्वधर्मानुसार करते रहनेसेही मोक्षकी प्राप्ती हो जाती है, और यहभी बतला दिया गया है, कि इसी प्रकार भगवद्गीतामेंभी संन्यास-मार्गकी अपेक्षा कर्मयोगही श्रेष्ठतर माना गया है। इस नारायणीय धर्मकी परंपराका वर्णन करते समय वैशंपायन जनमेजयसे कहते हैं, कि यह धर्म साक्षात् नारायणसे नारदको प्राप्त हुआ है; और यही धर्म “कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पतः” (महा. शां. ३४६. १०) - हरिगीता अथवा भगवद्गीतामें बतलाया गया है। इसी प्रकार आगे चलकर ३४८ वें अध्यायके ८ वें श्लोकमें यह बतलाया गया है, कि :- समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपांडवयोधुंधे । अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ॥ कौरव और पांडवोंके युद्धके समय विमनस्क अर्जुनको भगवानने ऐकांतिक अथवा नारायण-धर्मकी इन विधियोंका उपदेश किया था; और सब युगोंमें स्थित नारा- यण-धर्मकी परंपरा बतलाकर पुनश्च कहा है, कि इस धर्मका और यतियोंके धर्म अर्थात् संन्यास-धर्मका वर्णन 'हरिगीता'में किया गया है (महा. शां. ३४८. ५३)। आदिपर्व और शांतिपर्वमें किये गये इन छः उल्लेखोंके अतिरिक्त अश्वमेधपर्वके अनु- गीतापर्वमेंभी और एक बार भगवद्गीताका उल्लेख किया गया है। जब भारतीय युद्ध पूरा हो गया, युधिष्ठिरका राज्याभिषेकभी हो गया; और एक दिन श्रीकृष्ण तथा अर्जुन एकत्र बैठे हुए थे; तब श्रीकृष्णने कहा- “यहाँ अब मेरे रहनेकी कोई आवश्य कता नहीं है; द्वारका जानेकी इच्छा है।” इसपर अर्जुनने श्रीकृष्णसे प्रार्थना की, कि युद्धके आरंभमें पहले आपने मुझे जो उपदेश किया था, वह मैं भूल गया; इसलिये वह मुझे फिरसे बतलाइये (अश्व. १६)। तब इस विनतीके अनुसार, द्वारकाको जानेके पहले, श्रीकृष्णने अर्जुनको अनुगीता सुनाई है। इस अनुगीताके आरंभहीमें भगवानने कहा है- “दुर्भाग्य-वश तू उस उपदेशको भूल गया; जिसे मैंने तुझे युद्धके आरंभमें बतलाया था। उस उपदेशको फिरसे वैसेही बतलाना अब मेरे लियेभी असंभव है, इसलिये उसके बदले तुझे कुछ अन्य बातें बतलाता हूँ” (महा. अश्व. अनुगीता १६. ९-१३)। यह बात ध्यान देने योग्य है, कि अनुगीतामें वर्णित कुछ प्रकरण गीताके प्रकरणोंके समानही है। अनुगीताके उक्त निर्देशको मिलाकर महाभारतमें भगवद्गीताका सात बार स्पष्ट उल्लेख हो गया है। अर्थात् अंतर्गत
५१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रमाणोंसे स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि भगवद्गीता वर्तमान महाभारतकाही एक भाग है। परंतु संदेहकी गति निरंकुश रहती है; इसलिये उपर्युक्त सात निर्देशोंमेंभी कई लोगोंका समाधान नहीं होता। वे कहते हैं, कि यह कैसे सिद्ध हो सकता है, कि ये उल्लेखभी भारतमें पीछेसे नहीं जोड़ दिये गये होंगे ? इस प्रकार उनके मनमें यह शंका ज्यो-की-त्यों रह जाती है, कि गीता महाभारतका भाग है अथवा नहीं। पहले तो यह शंका केवल इसी समझसे उपस्थित हुई है, कि गीता-ग्रंथ ब्रह्मज्ञान-प्रधान है; परंतु हमने पहलेही विस्तारपूर्वक बतला दिया है, कि यह समझ ठीक नहीं, अतएव यथार्थमें देखा जाय, तो अब इस शंकाके लिये कोई स्थानही नहीं रह जाता। तथापि इन प्रमाणोंपरही अवलंबित न रहते हुए अब हम बतलाना चाहते हैं, कि अन्य प्रमाणोंसेभी उक्त शंकाकी अयथार्थता सिद्ध हो सकती है। जब दो ग्रंथोंके विषयमें यह शंका की जाती है, कि वे दोनों एकही ग्रंथकारके हैं या नहीं; तब काव्यमीमांसक- गण पहले इन दोनों बातों - शब्दसादृश्य और अर्थसादृश्य - का विचार किया करते हैं। शब्दसादृश्यमें केवल शब्दोंहीका समावेश नहीं होता किंतु उसमें भाषा- रचनाकाभी समावेश किया जाता है। इस दृष्टिसे विचार करते समय देखना चाहिये कि गीताकी भाषा और महाभारतकी भाषामें कितनी समता है। परंतु महाभारत ग्रंथ बहुत बड़ा और विस्तीर्ण है; इसलिये उसमें प्रसंगके अनुसार स्थान-स्थानपर भाषाकी रचनाभी भिन्न भिन्न रीतिसे की गई है। उदाहरणार्थ, कर्णपर्वके कर्ण और अर्जुनके युद्धका वर्णन पढ़नेसे दीख पड़ता है, कि उसकी भाषारचना अन्य प्रकरणोंकी भाषासे भिन्न है। अतएव यह निश्चित करना अत्यंत कठिन है, कि गीता और महाभारतकी भाषामें समता है या नहीं। तथापि सामान्यतः विचार करनेपर हमें परलोकवासी काशीनाथपंत तेलंगके * मतसे सहमत होकर कहना पड़ता है, कि गीताकी भाषा तथा छंदरचना आर्ष अथवा प्राचीन है। उदाहरणार्थ, काशीनाथपंतने यह बतलाया है, कि अंत (गीता २. १६), भाषा (गीता २. ५४), ब्रह्म (= प्रकृति, गीता १४. ३), योग (कर्मयोग), पादपूरक अव्यय 'ह' (गीता २. ९) आदि शब्दोंका प्रयोग गीतामें जिस अर्थमें किया गया है, उस अर्थमे वे शब्द कालिदास प्रभृतिके काव्योंमे नहीं पाये जाते; और पाठभेदहीसे क्यों न हो; परंतु गीताके ११. ३५ श्लोकमें 'नमस्कृत्या' यह अपाणिनीय शब्द रखा गया है, तथा गीता
- स्वर्गीय काशीनाथ त्र्यंबक तेलंग-द्वारा रचित भगवद्गीताका अंग्रेजी अनुवाद मैक्समूलर साहब-द्वारा संपादित प्राच्यधर्म-पुस्तकमालामें (Sacred Books of the East Series, Vol. VIII) प्रकाशित हुआ है। इस ग्रंथमें गीतापर एक टीकात्मक लेख प्रस्तावनाके तौरपर जोड़ दिया गया है। स्वर्गीय तेलंगके मतानुसार इस प्रकरणमें जो उल्लेख हैं, वे (एक स्थानको छोड़) इस प्रस्तावनाको लक्ष्य करकेही किये गये हैं।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१७ ११. ४८ में ‘शक्य अहं’ इस प्रकार अपाणिनीय संधिभी की गई है। इसी तरह “सेनानीनामहं स्कन्दः” (गीता १०. २४) में जो ‘सेनानीनां’ षष्ठीकारक है वहभी पाणिनीके अनुसार शुद्ध नहीं है। आर्ष वृत्तरचनाके उदाहरणोंको स्वर्गीय तेलंगने स्पष्ट करके नहीं बतलाया है; परंतु हमें यह प्रतीत होता है, कि ग्यारहवें अध्यायवाले विश्वरूप-वर्णनके (गीता ११. १५-५०) छत्तीस श्लोकोंको लक्ष्य करकेही उन्होंने गीताकी छंदरचनाको आर्ष कहा है। इन श्लोकोंके प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं; परंतु गणोंका कोई नियम नहीं है; एक इंद्रवज्रा चरण है तो दूसरा उपेंद्र- वज्रा, तीसरा है शालिनी, तो चौथा किसी अन्य प्रकारका; इस तरह उक्त छत्तीस श्लोकोंमें - अर्थात् १४४ चरणोंमें - भिन्न भिन्न जातिके कुल ग्यारह चरण दीख पड़ते हैं। तथापि उनमें यह नियमभी दीख पड़ता है, कि प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं; और उनमेंसे पहला, चौथा, आठवाँ और अंतिम दो अक्षर गुरु हैं; तथा छठा अक्षर प्रायः लघुही है। इससे यह अनुमान किया जाता है, कि ऋग्वेद तथा उप- निषदोंके त्रिष्टुप् छंदके ढंगपरही ये श्लोक रचे गये हैं। ऐसे ग्यारह अक्षरोंके विषम- वृत्त कालिदासके काव्योंमें नहीं मिलते। हाँ, शांकुतल नाटकका “अमी वेदिं परितः क्लृप्तधिष्ण्याः” यह श्लोक इसी छंदमें है; परंतु कालिदासहीने उसे ‘ऋक्छंद’ अर्थात् ऋग्वेदका छंद कहा है। इससे यह बात प्रकट हो जाती है, कि आर्ष वृत्तोंके प्रचारके समयहीमें गीता-ग्रंथकी रचना हुई है। महाभारतके अन्य स्थलोंमें उक्त प्रकारके आर्ष शब्द और वैदिक वृत्त दीख पड़ते हैं। परंतु इसके अतिरिक्त इन दोनों ग्रंथोंके भाषासादृश्यका दूसरा दृढ़ प्रमाण यह है, कि महाभारत और गीतामें एकहीसे अनेक श्लोक पाये जाते हैं। महाभारतके सब श्लोकोंकी छानबीन कर यह निश्चित करना कठिन है, कि उनमेंसे गीतामें कितने श्लोक उपलब्ध हैं। परंतु महाभारत पढ़ते समय उसमें जो श्लोक अक्षरशः या न्यूनाधिक पाठभेदसे गीताके श्लोकोंके सदृश हमें जान पड़े, उनकी संख्याभी कुछ कम नहीं है; और उनके आधारपर भाषा- सादृश्यके प्रश्नका निर्णयभी सहजही हो सकता है। नीचे दिये गये श्लोक और श्लोकार्ध, गीता और महाभारत (कलकत्ता की प्रति) में शब्दशः अथवा एक-आध शब्दकी भिन्नता होकर ज्यों-के-त्यों मिलते हैं :- गीता महाभारत १. ९ नानाशास्त्रप्रहरणा.० श्लोकार्ध । भीष्मपर्व (५१. ४) ; गीताके सदृशही दुर्योधन द्रोणाचार्यसे अपनी सेनाका वर्णन कर रहा है । १. १० अपर्याप्तं० पूरा श्लोक । भीष्म. (५१. ६)
५१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र १. १२–१९ तक आठ श्लोक । भीष्म (५१. २२–२९); कुछ शब्द- भेद रहते हुए शेष गीताके श्लोकोंके समानही हैं। १. ४५ अहो बत महत्पापं० श्लोकार्ध । द्रोण. (१९३. ५०); कुछ शब्दभेद है, शेष गीताके श्लोकके समान । २. १९ उभौ तौ न विजानीत० श्लोकार्ध । शांति. (२२४. १४); कुछ पाठभेद होकर बलि-वासव-संवाद और कठोप- निषदमें (२. १८) है। २. २८ अव्यक्तादीनि भूतानि० श्लोक । स्त्री. (२. ६. ९. ११); 'अव्यक्त'के बदले 'अभाव' है, शेष सब समान है। २. ३१ धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयो० श्लोकार्ध । भीष्म. (१२४. ३६); भीष्म कर्णको यही बतला रहे हैं। २. ३२ यदृच्छया० श्लोक । कर्ण. (५३. २) 'पार्थ'के बदले 'कर्ण' पद रखकर दुर्योधन कर्णसे कह रहा है। २. ४६ यावान् अर्थ उदपाने० श्लोक । उद्योग. (४५. २६); सनत्सुजातीय प्रकरणमे कुछ शब्दभेदसे पाया जाता है। २. ५९ विषया विनिवर्तन्ते० श्लोक । शांति (२०४. १६); मनु-बृहस्पति- संवादमें अक्षरशः मिलता है। २. ६७ इंद्रियाणा हि चरता० श्लोक । वन. (२१०. २६); ब्राह्मण-व्याध- संवादमें कुछ पाठभेदसे आया है और पहले रथका रूपक भी दिया गया है। २. ७० आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं० श्लोक । शांति. (२५०. ९); शुकानुप्रश्नमें ज्यों- का-त्यों आया है। ३. ४२ इंद्रियाणि पराण्याहु.० श्लोक । शांति. (२४५. ३; २४७. २) कुछ पाठभेदसे शुकानुप्रश्नमे दो बार आया है। परंतु इस श्लोकका मूल स्थान कठोपनिषदमें है (कठ. ३. १०)। ४. ७ यदा यदाहि धर्मस्य० श्लोक । वन. (१८९. २७); मार्कंडेय-प्रश्नमें ज्यों-का-त्यों है।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१९ ४. ३१ नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य ० शांति. ( २६७. ४० ) ; गोकापिली- श्लोकार्ध । याख्यानमें पाया जाता है, और सब प्रकरण यज्ञविषयकही है । ४. ४० नायं लोकोऽस्ति न परो० वन. ( १९९. ११० ) ; मार्कण्डेय समस्या- श्लोकार्ध । पर्वमें शब्दशः मिलता है । ५. ५ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं० श्लोक । शांति. ( ३०५; १९; ३१६. ४ ) ; इन दोनों स्थानोंमें कुछ पाठभेदसे वसिष्ठकराल औरयाज्ञवल्क्य-जन- कके संवादमें पाया जाता है । ५. १८ विद्याविनयसंपन्ने० श्लोक । शांति. ( २३८. १९ ) ; शुकानुप्रश्नमें अक्षरशः मिलता है । ६. ५ आत्मैव ह्यात्मनो बंधु० श्लोकार्ध । उद्योग. ( ३३. ६३, ६४ ) ; विदुर- और आगामी श्लोकका अर्ध । नीतिमें ठीक ठीक मिलता है । ६. २९ सर्वभूतस्थमात्मानं० श्लोकार्ध । शांति. ( २३८. २१ ) ; शुकानुप्रश्न, मनु- स्मृति ( १२. ९१ ), ईशावास्योप- निषद् ( ६ ) और कैवल्योपनिषदमें ( १. १० ) तो ज्यों-का-ज्यों मिलता है। ६. ४४ जिज्ञासुरपि योगस्य० श्लोकार्ध । शांति. ( २३५. ७ ) ; शुकानुप्रश्नमें कुछ पाठ-भेद करके रखा गया है । ८. १७ सहस्रयुगपर्यंतं० यह श्लोक पहले शांति. ( २३१. ३१ ) ; शुकानुप्रश्नम युगका अर्थ न बतलाकर गीतामें अक्षरशः मिलता है; और युगका अर्थ दिया गया है । बतलानेवाला कोष्टकभी पहले दिया गया है । मनुस्मृतिमेंभी कुछ पाठां- तरसे मिलता है ( मनु. १. ७३ ) । ८. २० यः स सर्वेषु भूतेषु श्लोकार्ध । शांति. ( ३३९. २३ ) ; नारायणीय धर्ममें कुछ पाठांतर होकर दो बार आया है । ९. ३२ स्त्रियो वैश्यास्तथा० यह पूरा अश्व. ( १९. ६१, ६२ ) ; अनुगीतामें श्लोक और आगामी श्लोकका कुछ पाठांतरके साथ येही श्लोक हैं । पूर्वार्ध ।
५२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र १३. १३ सर्वतः पाणिपादं० श्लोक । शांति. ( २३८. २९; अश्व १९. ४९ ) ; शुकानुप्रश्न, अनुगीता तथा अन्यत्रभी यह अक्षरशः मिलता है। इस श्लोकका मूलस्थान श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ३. १६ ) है। १३. ३० यदा भूतपृथग्भावं० श्लोक । शांति. ( १७. २३ ) ; युधिष्ठिरने अर्जु- नसे येही शब्द कहे हैं। १४. १८ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था० अश्व. ( ३९. १० ) ; अनुगीताके गुरु- श्लोक । शिष्यसंवादमें अक्षरशः मिलता है। १६. २१ त्रिविधं नरकस्येदं० श्लोक । उद्योग. ( ३२. ७ ) . विदुरनीतिमें अक्षर- शः मिलता है। १७. ३ श्रद्धामयोऽयं पुरुषः० श्लोकार्ध । शांति. ( २६३. १७ ) ; तुलाधार-जाजलि- संवादके श्रद्धा प्रकरणमें मिलता है। १८. १४ अधिष्ठानं तथा कर्ता० श्लोक शांति. ( ३४७. ८७ ) ; नारायणीय । धर्ममें अक्षरशः मिलता है। उक्त तुलनासे यह बोध होता है, कि २७ पूरे श्लोक और १२ श्लोकार्ध, गीता तथा महाभारतके भिन्न प्रकरणोंमें - कहीं कहीं तो अक्षरशः और कहीं कहीं कुछ पाठांतर होकर - एकहीसे हैं; और, यदि पूरी तौरसे जांच की जावें, तो औरभी कुछ श्लोकों तथा श्लोकार्धोंका मिलना संभव है। यदि यह देखना चाहें, कि दो-दो अथवा तीन-तीन शब्द अथवा श्लोकके चतुर्थांश ( चरण ) गीता और महाभारतमें कितने स्थानोंपर एक-से हैं, तो उपर्युक्त तालिका कहीं अधिक बढ़ानी होगी।* परंतु इस शब्द-साम्यके अतिरिक्त केवल उपर्युक्त तालिकाके श्लोक-सादृश्यका विचार करें, *यदि इस दृष्टिसे संपूर्ण महाभारत देखा जाय, तों गीता और महाभारतमें समान श्लोकपाद अर्थात् चरण सौंसेभी अधिक दीख पड़ेंगे। उनमेंसे कुछ यहाँ दिये जाते हैं - किं भोगैर्जीवितेन वा (गीता १. ३२) नैतत्त्वय्युपपद्यते (गीता २. ३), त्रायते महतो भयात् ( २. ४० ), अशांतस्य कुतः सुखम् ( २. ६६ ), उत्सी देयुरिमे लोकाः ( ३. २४), मनो दुर्निग्रहं चलम् ( ६. ३५), ममात्मा भूतभावनः ( ९. ५ ), मोघाशा मोघकर्माणः ( ९. १२), समः सर्वेषु भूतेषु ( ९. २९), दीप्तानलार्कद्युति ( ११. १७), सर्वभूतेहिते रताः ( १२. ४), तुल्यनिंदा स्तुतिः ( १२. १९ ), संतुष्टो येनकेनचित् ( १२. १९), समलोष्टाश्मकांचनः ( १४. २४ ); त्रिविधा कर्मचोदना ( १८. १८) ; निर्ममः शांतः ( १८. ५३ ), ब्रह्म- भूयाय कल्पते ( १८. ५३ ) इत्यादि ।
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२१
तो बिना यह कहे नहीं रहा जा सकता, कि महाभारतके अन्य प्रकरण और गीता, ये दोनों एकही लेखनीके फल हैं। यदि प्रत्येक प्रकरणपर विचार किया जाय, तो यह प्रतीत हो जायगा, कि उपर्युक्त ३३ श्लोकोंमेंसे १ मार्कंडेय प्रश्नमें, आधा मार्कंडेय-समस्यामें, १ ब्राह्मण-व्याध-संवादमें, २ विदुर-नीतिमें, १ सनत्सुजातीयमें १ मनु-बृहस्पति-संवादमें, ६।। शुकानुप्रश्नमें, १ तुलाधार-जाजलि-संवादमें, १ वसिष्ठ- कराल और याज्ञवल्क्य-जनक-संवादमें, १।। नारायणीय धर्ममें, २।। अनुगीतामें और शेष भीष्म, द्रोण, कर्ण, तथा स्त्रीपर्वमें उपलब्ध हैं। इनमेंसे प्रायः सब जगह ये श्लोक पूर्वापर संदर्भके उक्त उचित स्थानोंपरही मिलते हैं - प्रक्षिप्त नहीं हैं; और यहभी प्रतीत होता है, कि इनमेंसे कुछ श्लोक गीताहीमें समारोप दृष्टिसे लिये गये हैं। उदाहरणार्थ, 'सहस्रयुगपर्यन्तम्' (गीता. ८. १७) इस श्लोकके स्पष्टीकरणार्थ वर्ष और युगकी व्याख्या पहले बतलाना आवश्यक था; और महाभारत (शां. २३१) तथा मनुस्मृतिमें इस श्लोकके पहले उनके लक्षणभी कहे गये हैं। परंतु गीतामें यह श्लोक, 'युग' आदिकी व्याख्या न बतला कर, एकदम कहा गया है। इस दृष्टिसे विचार करनेपर यह नहीं कहा जा सकता, कि महाभारतके अन्य प्रकरणोंमें ये श्लोक गीताहीसे उद्धृत किये गये हों; और, इतने भिन्न भिन्न प्रकरणोंमेंसे गीतामें इन श्लोकोंका लिया जानाभी संभव नहीं है। अतएव, यही कहना पड़ता है, कि गीता और महाभारतके इन प्रकरणोंका लिखनेवाला कोई एकही पुरुष होना चाहिये। यहाँ यह बतला देना आवश्यक प्रतीत होता है, कि जिस प्रकार मनुस्मृतिके कई श्लोक महाभारतमें मिलते हैं,* उसी प्रकार गीताका 'सहस्रयुग- पर्यन्तम्' (८:१७) यह पूर्ण श्लोक कुछ हेरफेरके साथ, और यह श्लोकार्ध - "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्" (गीता ३. ३५; १८.४७) 'श्रेयान्'के बदले 'वरं' पाठांतर होकर - मनुस्मृतिमें पाया जाता है, तथा 'सर्वभूतस्थ- मात्मानम्' यह श्लोकार्धभी (गीता ६. २९) 'सर्वभूतेषु चात्मानम्' इस रूपसे मनुस्मृतिमें पाया जाता है (मनु. १. ७३; १०. ९७; १२. ९१)। महाभारतके अनुशासनपर्वमें तो 'मनुनाभिहितं शास्त्रम्' (अनु. ४७. ३५) कहकर मनुस्मृतिका स्पष्ट रीतिसे उल्लेख किया गया है। शब्द-सादृश्यके बदले यदि अर्थ-सादृश्य देखा जाय, तोभी उक्त अनुमान दृढ़ हो जाता है। पिछले प्रकरणोंमें गीताके कर्मयोग-मार्ग और प्रवृत्ति प्रधान भागवत-धर्म या नारायणीय धर्मकी समताका दिग्दर्शन हम करही चुके हैं। नारायणीय धर्ममें व्यक्त-
- 'प्राच्यधर्म-पुस्तकमाला'में मनुस्मृतिका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। उसमें बुलर साहबने एक फेहरिस्त जोड़ दी है, और यहभी बतलाया है, कि मनुस्मृतिके कौन कौन-से श्लोक महाभारतमें मिलते हैं। (S. B. E. Vol. XXV, p. 533 §§ देखो)।
५२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सृष्टिकी उपपत्ति की जो यह परंपरा बतलाई गई है, ( मभा. शां. ३३९. ७१, ७२ ), कि वासुदेवसे संकर्षण, संकर्षणसे प्रद्युम्न, प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध और अनिरुद्धसे ब्रह्मदेव हुए; वह गीतामें नहीं ली गई। इसके अतिरिक्त यहभी सच है, कि गीता-धर्म और नारायणीय धर्ममें अन्य अनेक भेद हैं। परंतु चतुर्व्यूह परमेश्वरकी कल्पना गीताको मान्य भलेही न हो; तथापि गीताके सिद्धान्तोंपर विचार करनेसे प्रतीत होता है, कि गीता-धर्म और भागवत-धर्म एकहीसे हैं। वे सिद्धान्त ये हैं- एकव्यूह वासुदेवकी भक्तिही राजमार्ग हैं; किसीभी अन्य देवताकी भक्ति की जाय, वह वासुदेवहीको अर्पण हो जाती है; भक्त चार प्रकारके होते हैं; स्वधर्मके अनु- सार सब कर्म करके भगवद्भक्तको यज्ञचक्र जारी रखना चाहिये; और संन्यास लेना उचित नहीं है। यह पहले बतलाया जा चुका है, कि विवस्वान्-मनु, इक्ष्वाकु आदि सांप्रदायिक परंपराभी दोनों ओर एकही है। इसी प्रकार सनत्सुजातीय, शुकानुप्रश्न, याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, अनुगीता इत्यादि प्रकरणोंको पढ़नेसे यह बात ध्यानमें आ जायगी, कि गीतामें वर्णित वेदान्त या अध्यात्मज्ञानभी उक्त प्रकरणोंमें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञानसे मिलता-जुलता है। कापिल-सांख्यशास्त्रके २५ तत्त्वों और गुणोत्कर्षके सिद्धान्तसे सहमत होकरभी भगवद्गीताने जिस प्रकार यह माना है, कि प्रकृति और पुरुषकेभी परे कोई नित्य-तत्त्व है; उसी प्रकार शांतिपर्वके वसिष्ठ- कराल-जनक-संवादमें और याज्ञवल्क्य-जनक-संवादमें विस्तारपूर्वक यह प्रतिपादन किया गया है, कि सांख्योंके २५ तत्त्वोंके परे एक 'छब्बीसवाँ' तत्त्व और हैं, जिसके ज्ञानके बिना कैवल्य प्राप्त नहीं होता। यह विचार-सादृश्य केवल कर्मयोग या अध्यात्म इन्हीं दो विषयोंके संबंधमें नहीं दीख पड़ता; किंतु इन दो मुख्य विषयोंके अतिरिक्त गीतामें जो अन्याय विषय हैं, उनकी बराबरीके प्रकरणभी महाभारतमें कई जगह पाये जाते हैं। उदाहरणार्थ, गीताके पहले अध्यायके आरंभमेंही द्रोणाचार्यसे दोनों सेनाओंका जैसा वर्णन दुर्योधनने किया है, ठीक वैसाही आगे भीष्मपर्वके ५१ वें अध्यायमें, उसने फिरसे द्रोणाचार्यसे वर्णन किया है। पहले अध्यायके उत्तरार्धमें अर्जुनको जैसा विषाद हुआ, वैसाही आगे युधिष्ठिरको शांतिपर्वके आरंभमें हुआ है; और जब भीष्म तथा द्रोणका 'योगबल'से वध करनेका समय समीप आया, तब अर्जुनके मुखसे फिर वैसेही खेदयुक्त वचन निकले, हैं ( मभा. भीष्म. ९७. ४-७; १०८. ८८-९४)। गीताके (गीता १. ३२, ३३) आरंभमें अर्जुनने कहा है, कि जिनके लिये उपभोग प्राप्त करना है, उन्हींका वध करके जय प्राप्त करे, तो उसका उपयोगही क्या होगा ? और जब युद्धमें सब कौरवोंका वध हो गया, तब यही बात दुर्योधनके मुखसेभी निकली है ( मभा. शल्य. ३१. ४२-५१ ) । दूसरे अध्यायके आरंभमेंही जैसे सांख्य और कर्मयोग ये दोनों निष्ठाएँ बतलाई गई हैं, वैसेही नारा- यणीय धर्ममें और शांतिपर्वके जापकोपाख्यान तथा जनक-सुलभा-संवादमेंभी इन निष्ठाओंका वर्णन पाया जाता है (.मभा. शां. १९६, ३२० ) । तीसरे अध्यायके,
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२३ वनपर्वके आरंभमें द्रौपदीने युधिष्ठिरसे कहा है, कि अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है; कर्म न किया जाय, तो उपजीविकाभी न हो सकेगी । सो यही बातें (मभा. वन. ३२); और इन्ही तत्त्वोंका उल्लेख अनुगीतामेंभी फिरसे किया गया है। श्रौत-धर्म या स्मार्त-धर्म यज्ञमय है, यज्ञ और प्रजाको ब्रह्मदेवने एकही साथ निर्माण किया है, इत्यादि गीताका प्रवचन नारायणीय धर्मके अतिरिक्त शांतिपर्वके अन्य स्थानोंमें (शां. २६७) और मनुस्मृति (मनु. ३) मेंभी मिलता है। तुलाधार-जाजली- संवादमें तथा ब्राह्मण-व्याध-संवादमेंभी यही विचार मिलते हैं, कि स्वधर्मके अनुसार कर्म करनेमें कोई पाप नहीं है (मभा. शां. २६०-२६३; वन. २०६-२१५)। इसके सिवा, सृष्टिकी उत्पत्तिका जो थोड़ा वर्णन गीताके सातवें और आठवें अध्यायोंमें है, उसी प्रकारका वर्णन शांतिपर्वके शुकानुप्रश्नमेंभी पाया जाता है (शां. २३१); और छठे अध्यायमें पातंजलयोगके आसनोंका जो वर्णन है, उसीका फिरसे शुकानु- प्रश्न (शां. २३९) में और आगे चलकर शांतिपर्वके ३००वें अध्यायमें तथा अनुगीतामेंभी विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है (अश्व. १९)। अनुगीताके गुरुशिष्य-संवादमें किये गये मध्यमोत्तम वस्तुओंके वर्णन (अश्व. ४३, ४४) और गीताके दसवें अध्यायके विभूति-वर्णनके विषयमें तो यह कहा जा सकता है, कि इन दोनोंका प्रायः एकही अर्थ है। महाभारतमें कहा है, कि गीतामें भगवानने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखलाया था, वही संधि-प्रस्तावके समय दुर्योधन आदि कौरवोंको, और युद्धके बाद द्वारकाको लौटते समय मार्गमें उत्तंकको भगवानने दिखलाया; और नारायणने नारदको तथा दाशरथि रामने परशुरामको दिखलाया (उ. १३०; अश्व. ५५; शां. ३३९; वन ९९)। इसमें संदेह नहीं, कि गीताका विश्वरूप-वर्णन इन चारों स्थानोंके वर्णनोंसे कहीं अधिक सुरस और विस्तृत है; परंतु सब वर्णनोंको पढ़नेसे यह सहजही मालूम हो जाता है, कि अर्थ-सादृश्यकी दृष्टिसे उनमें कोई नवीनता नहीं है। गीताके चौदहवें और पंद्रहवें अध्यायोंमें इन बातोंका निरूपण किया गया है, कि सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंके कारण सृष्टिमें भिन्नता कैसे उत्पन्न होती है; इन गुणोंके लक्षण क्या हैं; और सब कर्तृत्व गुणोंहीका है, आत्माका नहीं; ठीक इसी प्रकार, इन तीनोंका वर्णन अनुगीता (अश्व. ३६-३९) और शांतिपर्वमेंभी अनेक स्थानोंमें पाया जाता है (शां. २८५, ३३०-३११); सारांश, गीतामें जिस प्रसंगका वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उसमें कुछ विषयोंका विवेचन अधिक विस्तृत हो गया है, और गीताकी विषय- विवेचन-पद्धतिभी कुछ भिन्न है; तथापि यह दीख पड़ता है, कि गीताके सब विचारोंसे समानता रखनेवाले विचार महाभारतमेंभी पृथक् पृथक्, कहीं-न-कहीं, न्यूनाधिक पायेही जाते हैं; और यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि विचार-सादृश्यके साथ- ही-साथ थोड़ीबहुत समता शब्दोंमेंभी आप-ही आप आ जाती है। मार्गशीर्ष महीनेके संबंधकी सादृश्यता तो बहुतही विलक्षण है। गीतामें “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”
५२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (गीता १०. ३५) कहकर इस मासको जिस प्रकार पहला स्थान दिया है, उसी प्रकार अनुशासनपर्वके दानधर्म-प्रकरणमें जहाँ उपवासके लिये महीनोंके नाम बतलानेका मौक़ा दो बार आया है, वहाँ प्रत्येक बार मार्गशीर्षसेही महिनोंकी गिनती आरंभ की गई है (अनु. १०६, १०९) । गीतामें वर्णित आत्मौपम्यकी या सर्वभूतहितकी दृष्टि, अथवा आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक भेद तथा देवयान और पितृयान-गतिका उल्लेख महाभारतके अनेक स्थानोंमें पाया जाता है, परंतु पिछले प्रकरणोंमें इनका विस्तृत विवेचन किया जा चुका है; अतएव यहाँपर पुनरुक्तिकी आवश्यकता नहीं। भाषा-सादृश्यकी ओर देखिये, या अर्थ-सादृश्यपर ध्यान दीजिये, अथवा गीताके विषय महाभारतमें जो छः-सात उल्लेख मिलते हैं, उन पर विचार कीजिये; अनुमान यही करना पड़ता है, कि गीता वर्तमान महाभारतकाही एक भाग है; और जिस पुरुषने वर्तमान महाभारतकी रचना की है, उसीने वर्तमान गीताकाभी वर्णन किया है। हमने देखा है, कि इन सब प्रमाणोंकी ओर ध्यान न देकर अथवा किसी तरह उनका अटकल-पच्चू अर्थ लगाकर, कुछ लोगोंने गीताको प्रक्षिप्त सिद्ध करनेका का यत्न किया है। परंतु जो लोग बाह्य प्रमाणोंको नहीं मानते; और अपने- ही संशयरूपी पिशाचको अग्रस्थान दिया करते हैं, हमारे मतसे, उनकी विचार-पद्धति सर्वथा अशास्त्रीय अतएव अग्राह्य है। हाँ, यदि इस बातकी उपपत्तिही मालूम न होती, कि गीताको महाभारतमें क्या स्थान दिया गया है, तो बात कुछ और थी । परंतु जैसे कि इस प्रकरणके आरंभमें बतला दिया गया है; गीता केवल वेदान्त- प्रधान अथवा भक्ति-प्रधान नहीं है; किंतु महाभारतमे जिन प्रमाणभूत श्रेष्ठ पुरुषोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है, उनके चरित्रोंका नीति-तत्त्व या मर्म बतलानेके लिये महाभारतमें कर्मयोग-प्रधान गीताका निरूपण अत्यंत आवश्यक था; और वर्तमान समयमें महाभारतके जिस स्थानपर वह पाई जाती है, उससे बढ़कर, काव्य-दृष्टि- सेभी कोई अधिक योग्य स्थान उसके लिये दीख नहीं पड़ता । इतना सिद्ध होनेपर अंतिम सिद्धान्त यही निश्चित होता है, कि गीता महाभारतमे उचित कारणसे और उचित स्थानपरही कही गई है - वह प्रक्षिप्त नहीं है। महाभारतके समानही रामा- यणभी सर्वमान्य और उत्कृष्ट आर्ष महाकाव्य है; और उसमेंभी कथा-प्रसंगानुसार सत्य, पुत्रधर्म, मातृधर्म, रणधर्म, आदिका मार्मिक विवेचन है। परंतु यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि वाल्मीकि ऋषिका मूल हेतु अपने काव्यको महाभारतके समान "अनेकसमयान्वित, सूक्ष्म धर्म-अधर्मके न्यायोंसे ओतप्रोत, और सब लोगोंको शील तथा सच्चरितकी शिक्षा देनेमें सब प्रकारसे समर्थ" बनानेका नहीं था, इसलिये धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य या नीतिकी दृष्टिसे महाभारतकी योग्यता रामायणसे कहीं बढ़कर है। महाभारत केवल आर्ष काव्यका केवल इतिहास नहीं है; किंतु वह एक संहिताही है, जिसमें धर्म-अधर्मके सूक्ष्म प्रसंगोंका निरूपण किया गया है; और
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२५ यदि इस धर्म-संहितामें कर्मयोगका शास्त्रीय तथा तात्त्विक विवेचन न किया जाय, तो फिर वह कहाँ किया जा सकता है ? केवल वेदान्त-ग्रंथोंमें यह विवेचन नही किया जा सकता । उसके लिये योग्य स्थान धर्मसंहिताही है, और यदि महाभारत- कारने यह विवेचन न किया होता, तो यह धर्म-अधर्मका वृहत् संग्रह अथवा पाँचवाँ वेद उतनाही अपूर्ण रह जाता । इस अपूर्णताकी पूर्ति करनेके लियेही भगवद्गीता महाभारतमें रखी गई है । सचमुच यह बड़ा भाग्य है, कि इस कर्मयोगशास्त्रका मंडन महाभारतका जैसे उत्तम ज्ञानी सत्पुरुषनेही किया है, जो वेदान्तशास्त्रके समानही व्यवहारमें भी अत्यंत निपुण । इस प्रकार सिद्ध हो चुका, कि वर्तमान भगवद्गीता प्रचलित महाभारतहीका एक भाग है; तथापि अब उसके अर्थका कुछ अधिक स्पष्टीकरण करना चाहिये । भारत और महाभारत इन दो शब्दोंको हम लोग आजकल समानार्थक समझते हैं; परंतु वस्तुतः वे दो भिन्न भिन्न शब्द हैं । व्याकरणकी दृष्टिसे देखा जाय, तो 'भारत' नाम उस ग्रंथको प्राप्त हो सकता है, जिसमें भरतवंशी राजाओंके परा- क्रमका वर्णन हो । रामायण, भागवत आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति ऐसीही है; और, इस रीतिसे भारतीय युद्धका; जिस ग्रंथमें वर्णन है, उसे केवल 'भारत' कहना यथेष्ट हो सकता है; फिर वह ग्रंथ चाहे जितना विस्तृत हो । रामायण ग्रंथभी कुछ छोटा नही है; परंतु उसे कोई महारामायण नहीं कहता । फिर भारतहीको 'महाभारत' क्यो कहते हैं ? महाभारतके अंतमें यह बतलाया है, कि महत्त्व और भारतत्व इन दो गुणोंके कारण इस ग्रंथको महाभारत नाम दिया गया है ( स्वर्गा. ५. ४४ ) । परंतु 'महाभारत'का सरल शब्दार्थ 'बड़ा भारत' होता है; और ऐसा अर्थ करनेसे यह प्रश्न उठता है, कि 'बड़े' भारतके पहले क्या कोई 'छोटा' भारतभी था ? और, उसमें गीता थी या नहीं ? वर्तमान महाभारतके आदिपर्वमें लिखा है, कि उपाख्यानोंके अतिरिक्त महाभारतके श्लोकोंकी संख्या चौबीस हजार है ( महा. आ. १. १०१ ) ; और आगे चलकर यहभी लिखा है, कि पहले इसीका नाम 'जय' था ( आ. ६२. २० )। 'जय' शब्दसे भारतीय युद्धमें पांडवोंकी जयका बोध होता है; और ऐसा अर्थ करनेसे यही प्रतीत होता है, कि भारतीय युद्धका वर्णन 'जय' नामक ग्रंथमें पहले किया गया था; आगे चलकर उसी ऐतिहासिक ग्रंथमें अनेक उपाख्यान जोड़ दिये गये; और इस प्रकार महाभारत एक बड़ा ग्रंथ हो गया, जिसमें इतिहास और धर्म-अधर्म विवेचनकाभी निरूपण किया गया है । आश्वलायन गृह्यसूत्रोंके ऋषितर्पणमें “ सुमंतु-जैमिनी-वैशंपायन-पैल-सूत्र-भाष्यभारत-महाभारत धर्माचार्याः ” ( आ. गृ. ३. ४. ४ ) इस प्रकार भारत और महाभारत इन दो भिन्न भिन्न ग्रंथोंका स्पष्ट उल्लेख किया गया है; उनमेंभी उक्त अनुमानही दृढ़ हो जाता है । इस प्रकार छोटे भारतका बड़े भारतमें समावेश हो जानेमे कुछ कालके बाद, छोटा 'भारत' नामक स्वतंत्र ग्रंथ शेष नहीं रहा; और स्वभावतः लोगोंमें
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यह समझ हो गई, केवल 'महाभारत' ही एक भारत ग्रंथ है ; वर्तमान महाभारतकी पोथीमेंभी यह वर्णन मिलता है, कि व्यासजीने पहले अपने पुत्र - शुक - को और अनंतर अपने अन्य शिष्योंको भारत पढ़ाया था ( आ. १. १०३ ); और आगे यहभी कहा, कि सुमंतु, जैमिनि, पैल, शुक और वैशंपायन इन पाँच शिष्योंने पाँच भिन्न भिन्न भारतसंहिताओंकी अथवा महाभारतोंकी रचना की ( आ. ६३. ९० ) । इस विषयमें यह कथा पाई जाती है, कि इन पाँच महाभारतोंमेंसे वैशंपायनके महाभारतको और जैमिनीके महाभारतसे केवल अश्वमेधपर्वहीको व्यासजीने रख लिया । इससे अब यहभी मालूम हो जाता है, कि ऋषितर्पणमें 'भारत-महाभारत' शब्दोंके पहले सुमंतु आदि नाम क्यों रखे गये हैं। परंतु यहाँ इस विषयके इतने गहरे विचारका कोई प्रयोजन नहीं । रा. ब. चिंतामणराव वैद्यने महाभारतके अपने टीका- ग्रंथमें इस विषयका विचार करके जो सिद्धान्त स्थापित किया है, वही हमें संयु- क्तिक मालूम होता है । अतएव यहाँ परइतना कह देनाही यथेष्ट होगा, कि वर्तमान समयमें जो महाभारत उपलब्ध है, वह मूलमें वैसाही न था; भारत या महा- भारतके अनेक रूपांतर हो गये हैं; और उस ग्रंथको जो अंतिम स्वरूप प्राप्त हुआ, वह हमारा वर्तमान महाभारत है। यह नहीं कहा जा सकता, कि मूल भारतमेंभी गीता न रही होगी । हाँ, यह प्रकट है कि सनत्सुजातीय, विदुरनीति, शुकानुप्रश्न, याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, विष्णुसहस्रनाम, अनुगीता, नारायणीय धर्म आदि प्रकरणोंके समानही वर्तमान गीताकोभी महाभारतकारने पहले ग्रंथोंके आधारपरही लिखा है – नई रचना नहीं की है । तथापि, यहभी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, कि मूल गीतामें महाभारतकारने कुछभी हेरफेर न किया होगा । उपर्युक्त विवेचनसे यह बात सहजही समझमें आ सकती है, कि वर्तमान सात सौ श्लोकोंकी गीता वर्तमान महाभारतहीका एक भाग है; दोनोंकी रचनाभी एकनेही की है; और वर्तमान महा- भारतमें वर्तमान गीताको किसीने बादमें मिला नहीं दिया है । आगे यहभी बतलाया जायगा, कि वर्तमान महाभारतका समय कौन-सा है, और मूल गीताके विषयमें हमारा मत क्या है ।
भाग २ - गीता और उपनिषद्
अब देखना चाहिये, कि गीता और भिन्न भिन्न उपनिषदोंका परस्पर संबंध क्या है । वर्तमान महाभारतहीमें स्थान-स्थानपर सामान्य रीतिसे उपनिषदोंका उल्लेख किया गया है; और बृहदारण्यक ( बृ. १. ३ ) तथा छांदोग्य ( छां. १. २ ) में वर्णित प्राणेंद्रियोंके युद्धका हालभी अनुगीता ( अश्व. २३ ) मेंभी है; तथा “ न मे स्तेनो जनपदे ” आदि कैकेय-अश्वपति राजाके मुखसे निकले हुए शब्दभी ( छां. ५. ११. ५ ) शांतिपर्वमें उक्त राजाकी कथाका वर्णन करते समय ज्यों-के- त्यों पाये जाते हैं ( शा. ७७. ८ ) । इसी प्रकार शांतिपर्वके जनक-पंचशिख-संवादमें
गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२७ बृहदारण्यक (बृ. ४. ५. १३) का यह विषय मिलता है, कि 'न प्रेत्य संज्ञास्ति' - मरनेपर ज्ञातको कोई संज्ञा नहीं रहती, क्योंकि वह ब्रह्ममें मिल जाता है; और वहीं अंतमें प्रश्न (प्रश्न. ६. ५) तथा मुंडक (मुं. ३. २. ८) उपनिषदोंमें वर्णित नदी और समुद्रका दृष्टान्त नाम-रूपसे विमुक्त पुरुषके विषयमें दिया गया है। इंद्रियोंको घोड़े कह कर ब्राह्मण-व्याध-संवाद (वन. २१०) में और अनुगीतामें बुद्धिको सारथीकी जो उपमा दी गई है, वहीभी कठोपनिषद्सेही ली गई है (कठ. १. ३. ३) ; और कठोपनिषद्के ये दोनों श्लोक - "एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा" (कठ. ३. १२) और "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात्" (कठ २. १४) - भी शांतिपर्वमें दो स्थानोंपर (शां. १८७. २९; ३३१. ४४) कुछ फेरफारके साथ पाये जाते हैं। श्वेताश्वतरका 'सर्वतः पाणिपादम्' श्लोकभी, जैसा कि पहले कह चुके हैं, महाभारतमें अनेक स्थानोंपर और गीतामेंभी मिलता है। परंतु केवल इतनेहीमें यह सादृश्य पूरा नहीं हो जाता, इनके सिवा उपनिषदोंके औरभी बहुत-से वाक्य महाभारतमें कई स्थानोंपर मिलते हैं। यहीं क्यों; यहभी कहा जा सकता है, कि महाभारतका अध्यात्मज्ञान प्रायः उपनिषदोंसेही लिया गया है। गीतारहस्यके नवें और तेरहवें प्रकरणोंमें हमने विस्तारपूर्वक दिखला दिया है, कि महाभारतके समानही भगवद्गीताका अध्यात्मज्ञानभी उपनिषदोंके आधार- पर स्थापित है; और गीतामें भक्ति-मार्गका जो वर्णन है, वहभी इस ज्ञानमे अलग नहीं है। अतएव यहाँ उसको दुबारा न लिखकर संक्षेपमें सिर्फ़ यही बतलाते हैं, कि गीताके द्वितीय अध्यायमें वर्णित आत्माका अशोच्यत्व, आठवें अध्यायका अक्षर- ब्रह्मस्वरूप और तेरहवें अध्यायका क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार तथा विशेष करके 'ज्ञेय' पर- ब्रह्मका स्वरूप - इन सब विषयोंका वर्णन गीतामें अक्षरशः उपनिषदोंके आधारपरही किया गया है। कुछ उपनिषद् गद्यमें हैं और कुछ पद्यमें हैं। उनमेंसे गद्यात्मक उप- निषदोंके वाक्योंको पद्यमय गीतामें ज्यों-का-त्यों उद्धृत करना संभव नहीं; तथापि जिन्होंने छांदोग्योपनिषद् आदिको पढ़ा है, उनके ध्यानमें यह बात सहजही आ जायगी, कि "जो है सो है; और जो नहीं, हो नहीं" (गीता २. १६) तथा "यं यं वापि स्मरन् भावम् ०" (गीता ८. ६) इत्यादि विचार छांदोग्योपनिषद्से लिये गये हैं; और "क्षीणे पुण्ये" (गीता ९. २१), "ज्योतिषां ज्योतिः" (गीता १३.१७) तथा "मात्रास्पर्शाः" (गीता २. १४) इत्यादि विचार और वाक्य बृहदारण्यक उपनिषदसे लिये गये हैं। परंतु गद्यात्मक उपनिषदोंको छोड़ जब पद्या- त्मक उपनिषदोंपर विचार करते हैं, तो यह समता इससेभी अधिक स्पष्ट हो जाती है। क्योंकि इन पद्यात्मक उपनिषदोंके कुछ श्लोक ज्यों-के त्यों भगवद्गीतामें उद्धृत किये गये हैं। उदाहरणार्थ, कठोपनिषदके छः-सात श्लोक अक्षरशः अथवा कुछ शब्दभेदसे गीतामें लिये गये हैं। गीताके द्वितीय अध्यायका "आश्चर्यवत्पश्यति ०" (गीता. २. २९) श्लोक, कठोपनिषद्की द्वितीय वल्लीके "आश्चर्यो वक्ता ०"