श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पढ़नेवाले कुछ देरके लिये यदि यह परंपरागत कथा भूल जायें, कि श्रीकृष्णजीने युद्धके आरंभमेंही अर्जुनको गीता सुनाई है; और यदि वे इसी बुद्धिसे विचार करें, कि महाभारतमें धर्म-अधर्मका निरूपण करनेके लिये रचा गया यह एक आर्ष-महाकाव्य है; तोभी यही दीख पड़ेगा, कि गीताके लिये महाभारतमें जो स्थान नियुक्त किया गया है, वही गीताका महत्त्व प्रकट करनेके लिये काव्य-दृष्टिसेभी अत्यंत उचित है । जब इन बातोंकी ठीक ठीक उपपत्ति मालूम हो गई, कि गीताका प्रतिपाद्य विषय क्या है और महाभारतमें किस स्थानपर गीता बतलाई गई है; तब ऐसे प्रश्नोंका कुछभी महत्त्व दीख नहीं पड़ता, कि "रणभूमिपर गीताका ज्ञान बतलानेकी क्या आवश्यकता थी ? कदाचित् किसीने इस ग्रंथको महाभारतमें पीछे घुसेड़ दिया होगा ! अथवा, भगवद्गीतामें दसही श्लोक मुख्य हैं या सौ ?" क्योंकि अन्य प्रकरणों मेंभी यही दीख पड़ता है, कि जब एक बार यह निश्चय हो गया, कि धर्म-निरूपणार्थ 'भारत'का 'महाभारत' करनेके लिये अमुक विषय महाभारतमें अमुक कारणसे अमुक स्थानपर रखा जाना चाहिये; तब महाभारतकार इस बातकी चिंता नहीं करते, कि उस विषयके पूर्ण निरूपणमें कितना स्थान लग जायगा । तथापि गीताकी बहिरंग-परीक्षाके संबंधमें जो अन्यान्य युक्तियाँ पेश की जाती हैं, उनपरभी अब प्रसंगानुसार विचार करके उनके सत्यांशकी जाँच करना आवश्यक है । इसलिये उनमेंसे ( १ ) गीता और महाभारत, ( २ ) गीता और उपनिषद्, ( ३ ) गीता और ब्रह्मसूत्र, ( ४ ) भागवत धर्मका उदय और गीता, ( ५ ) वर्तमान गीताका काल, ( ६ ) गीता और बौद्ध ग्रंथ, ( ७ ) गीता और ईसाइयोंकी बाइबल, इन सात विषयोंका विवेचन इस प्रकरणके सात भागोंमें क्रमानुसार किया गया है । स्मरण रहे, कि उक्त बातोंका विचार करते समय, केवल काव्यकी दृष्टिसे अर्थात् व्यावहारिक और ऐतिहासिक दृष्टिसेही महाभारत, गीता, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् आदि ग्रंथोंका विवेचन बहिरंग-परीक्षा किया करते हैं, इसलिये, अब उक्त प्रश्नोंका विचार हमभी उसी दृष्टिसे करेंगे । भाग १ - गीता और महाभारत ऊपर यह अनुमान किया है, कि श्रीकृष्णजी सरीखे महात्माओंके चरित्रोंका नैतिक समर्थन करनेके लिये, महाभारतमें कर्मयोग-प्रधान गीता, उचित कारणोंसे, उचित स्थानमें रखी गई है; और गीता महाभारतकाही एक भाग होना चाहिये; वही अनुमान इन दोनों ग्रंथोंकी रचनाकी तुलना करनेसे अधिक दृढ़ हो जाता है । परंतु तुलना करनेके पहले इन दोनों ग्रंथोंके वर्तमान स्वरूपका कुछ विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है । अपने गीता-भाष्यके आरंभमें श्रीमच्छंकराचार्यजीने स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि गीता ग्रंथमें सात-सौ श्लोक हैं; और वर्तमान समयमें प्राप्त सब प्रतियोंमेंभी उतनेही श्लोक पाये जाते हैं । इन सात-सौ श्लोकोंमेंसे १ श्लोक