भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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बतलाना आवश्यक था, इसलिये उसे भगवद्गीतामें बतलाकर व्यावहारिक धर्म- अधर्मके अथवा कार्य-अकार्य व्यवस्थितिके निरूपण की पूर्ति गीताहीमें की है। वनपर्वके ब्राह्मण-व्याध-संवादमें व्याधने वेदान्तके आधार पर इस बातका विवेचन किया है, कि "मै मांस बेचनेका रोजगार क्यों करता हूँ।" और, शांतिपर्वके तुलाधार-जाजलि- संवादमेंभी, उसी तरह, तुलाधारने अपने वाणिज्य व्यवसायका समर्थन किया है (वन. २०६-२१५; शां. २६०-२६३) । परंतु यह उपपत्ति उन विशिष्ट व्यव- सायोंहीकी है। इसी प्रकार अहिंसा, सत्य आदि विषयोंका विवेचन यद्यपि महाभारतमें कई स्थानोंपर मिलता है, तथापि वहभी एकदेशीय अर्थात् उन विशिष्ट विषयोंके लियेही है, इसलिये वह महाभारतका प्रधान भाग नही माना जा सकता; अथवा इस प्रकारके एकदेशीय विवेचनसे यहभी निर्णय नहीं किया जा सकता, कि जिन भगवान् श्रीकृष्ण और पांडवोंके उज्ज्वल कार्योंका वर्णन करनेके लिये व्यासजीने महाभारतकी रचना की है, उन महानुभावोंके चरित्रोंको आदर्श मानकर मनुष्य उस प्रकार आचरण करे या नहीं। यदि यही मान लिया जाय, कि संसार निःसार है और कभी-न-कभी संन्यास लेनाही हितकारक है, तो स्वभावतः ये प्रश्न उपस्थित होते हैं, कि श्रीकृष्ण तथा पांडवोंको इतनी झंझटमें पड़नेका कारणही क्या था? और, यदि उनके प्रयत्नोंका कुछ हेतु मान लिया जाय, तो लोकसंग्रहार्थ उनका गौरव करके व्यासजीको तीन वर्षपर्यत लगातार परिश्रम करके (मभा. आ. ६२. ५२) एक लाख श्लोकोंके इस बृहत्-ग्रंथको लिखनेका प्रयोजनही क्या था? केवल इतनाही कह देनेसे ये प्रश्न यथेष्ट हल नहीं हो सकते, कि वर्णाश्रम-कर्म चित्त-शुद्धिके लिये किये जाते हैं; क्योंकि चाहे जो कहा जाय; स्वधर्माचरण अथवा जगतके अन्य सब व्यवहार तो संन्यास-दृष्टिसे गौणही माने जाते हैं। इसलिये, महाभारतमें जिन महान् पुरुषोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है, उन महात्माओंके आचरणपर 'मूले कुठारः' न्यायसे होनेवाले आक्षेपको हटाकर, उक्त ग्रंथमें कहीं-न-कही विस्तार- पूर्वक यह बतलाना आवश्यक था, कि संसारके सब काम करने चाहिये या नहीं और यदि कहा जाय, कि करने चाहिये; तो प्रत्येक मनुष्यको अपना अपना कर्म संसारमें किस प्रकार करना चाहिये, जिससे वह कर्म उसकी मोक्ष-प्राप्तिके मार्गमें बाधा न डाल सके। नलोपाख्यान, रामोपाख्यान आदि महाभारतके उपाख्यानोंमें उक्त बातोंका विवेचन करना उपयुक्त न हुआ होता, क्योंकि ऐसा करनेसे उन उपांगोंके सदृश्य यह विवेचनभी गौणही माना गया होता। इसी प्रकार वनपर्व अथवा शांतिपर्वके अनेक विषयोंकी खिचड़ीमें यदि गीताकोभी सम्मिलित कर दिया जाता, तो उसका महत्त्व अवश्यही घट गया होता। अतएव उद्योगपर्व समाप्त होनेपर महाभारतका प्रधान कार्य-भारतीय युद्ध-आरंभ होनेके ठीक मौकेपरही, उसपर ऐसे आक्षेप किये गये हैं, जो नीति-धर्मकी दृष्टिसे अपरिहार्य दीख पड़ते हैं; और वहीं यह कर्म-अकर्म विवेचनका स्वतंत्र शास्त्र उपपत्तिसहित बतलाया गया है। सारांश,