भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 555

परिशिष्ट-प्रकरण गीताकी बहिरंगपरीक्षा अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च । योऽध्यापयेज्जपेद्वाऽपि पापीयाञ्जायते तु सः ॥* – स्मृति पिछले प्रकरणोंमें इस बातका विस्तृत वर्णन किया गया है, कि जब भारतीय युद्धमे होनेवाले भीषण कुलक्षय और जातिक्षयका प्रत्यक्ष दृश्य पहले पहल आँखोंके सामने उपस्थित हुआ, तब अर्जुन अपने क्षात्रधर्मका त्याग करके संन्यासका स्वीकार करनेके लिये तैयार हो गया था; और उस समय उसको ठीक मार्गपर लानेके लिये श्रीकृष्णने वेदान्तशास्त्रके आधारपर यह प्रतिपादन किया, कि कर्म- योगही अधिक श्रेयस्कर है, कर्मयोगमें बुद्धिकी प्रधानता है, इसलिये ब्रह्मात्मैक्यज्ञान में अथवा परमेश्वर-भक्तिमें अपनी बुद्धिको साम्यावस्थामे रखकर उस बुद्धिके द्वारा स्वधर्मानुसार सब कर्म करते रहनेसेही मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है, मोक्ष पानेके लिये इसके सिवा अन्य किसी बातकी आवश्यकता नहीं है; और इस प्रकार उपदेश करके, भगवानने अर्जुनको युद्ध करनेमें प्रवृत्त कर दिया । गीताका यही यथार्थ तात्पर्य है। अब "गीताको भारतमें सम्मिलित करनेका कोई प्रयोजन नहीं" इत्यादि जो शंकाएँ इस भ्रमसे उत्पन्न हुई है – कि गीताग्रंथ केवल वेदान्तविषयक और निवृत्ति-प्रधान है – उनकाभी निवारण आप-ही-आप हो जाता है। क्योकि कर्णपर्वमे सत्यानृतका विवेचन करके जिस प्रकार श्रीकृष्णने अर्जुनको युधिष्ठिरके वधमे परावृत्त किया है. उसी प्रकार उसे युद्धमे प्रवृत्त करनेके लिये गीताका उपदेशभी आवश्यक था; और यदि काव्यकी दृष्टिसे देखा जाय, तोभी यह सिद्ध होता है, कि महाभारतमें अनेक स्थानोंपर ऐसेही जो अन्योन्य प्रसंग दीख पड़ते हैं, उन सबका मूल तत्त्व कहीं-न-कहीं

  • " किसी मंत्रके ऋषि, छंद, देवता और विनियोगको न जानते हुए जो ( उक्त मंत्रकी ) शिक्षा देता है अथवा जप करता है, वह पापी होता है।" यह किसी-न-किसी स्मृति-ग्रंथका वचन है, परंतु मालूम नहीं, कि किस ग्रंथका है। हाँ, उसका मूल आर्षेयब्राह्मण ( आर्षेय. १ ) श्रुति-ग्रंथमें पाया जाता है; वह यह है - “यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतब्राह्मणेन मंत्रेण याजयति वाऽध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गर्त वा प्रतिपद्यते ॥" अर्थात् ऋषि, छंद आदि किसीभी मंत्रके जो बहिरंग हैं, उनके बिना मंत्र नहीं कहना चाहिये। यही न्याय गीता सरीखे ग्रंथके लियेभी लगाया जा सकता है।