भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 558

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१३ धृतराष्ट्रका है, ४० संजयके, ८४ अर्जुनके और ५७५ भगवानके हैं। परंतु बंबईमें गणपत कृष्णाजीके छापाखानेमें मुद्रित महाभारतकी प्रतिमें भीष्मपर्वमें वर्णित गीताके अठारह अध्यायोंके बाद जो अध्याय आरंभ होता है, उसके (अर्थात् भीष्मपर्वके तेंतालीसवें अध्यायके) आरंभमें साढ़ेपाँच श्लोकोंमें गीतारहस्यका वर्णन किया गया है और उसमें कहा है :- षट्शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः । अर्जुनः सप्तपंचाशत् सप्तषष्टिं तु संजयः । धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ॥ “गीतामें केशवके ६२०, अर्जुनके ५७, संजयके ६७ और धृतराष्ट्रका १, इस प्रकार कुल मिलाकर ७४५ श्लोक हैं।” मद्रास इलाकेमें जो पाठ प्रचलित है, उसके अनुसार कृष्णाचार्य-द्वारा प्रकाशित महाभारतकी प्रतिमें ये श्लोक पाये जाते हैं। परंतु कलकत्तेमें मुद्रित महाभारतमें ये नहीं मिलते; और भारत-टीकाकार नीलकंठने तो इनके विषयमें यह लिखा है, कि इन साढ़ेपाँच श्लोकोंको “गौडैः न पठ्यन्ते” अतएव प्रतीत होता है, कि ये प्रक्षिप्त हैं। परंतु यद्यपि इन्हें प्रक्षिप्त मान लें; तथापि यह नहीं बतलाया जा सकता, कि गीतामें ७४५ श्लोक ( अर्थात् वर्तमान प्रतियोंमें जो ७०० श्लोक हैं उनसे ४५ श्लोक अधिक) किसे और कब मिले। महाभारत बड़ा भारी ग्रंथ है, इसलिये संभव है, कि इसमें समय समयपर अन्य श्लोक जोड़ दिये गये हों तथा कुछ निकाल डाले गये हों। परंतु यह बात गीताके विषयमें नहीं कही जा सकती। गीता-ग्रंथ सदैव पठनीय होनेके कारण वेदोंके सदृश पूरी गीताकोभी कंठाग्र करनेवाले लोग पहले बहुत थे, और अबतकभी कुछ हैं। यही कारण है, कि वर्तमान गीतामें बहुत-से पाठांतर नहीं हैं; और जो कुछ भिन्न पाठ हैं, वे सब टीकाकारोंको मालूम हैं। इसके सिवा यहभी कहा जा सकता है, कि इसी हेतुसे गीता-ग्रंथमें बराबर ७०० श्लोक रखे गये हैं, कि इसमें कोई फेरफार न कर सके। अब प्रश्न यह है, कि बंबई तथा मद्रासमें मुद्रित महाभारतकी प्रतियोंमेंही ४५ श्लोक, और वेभी सब भगवानहीके ज्यादा कहाँसे आ गये ? संजय और अर्जुनके श्लोकोंका जोड़ वर्तमान प्रतियोंमें, और इस गणनामें समान अर्थात् १२४ हैं; और ग्यारहवें अध्यायके “पश्यामि देवान्” (गीता ११. १५--३१) आदि १७ श्लोकोंके साथ मतभेदके कारण संभव है, कि अन्य दस श्लोकभी संजयके माने जावें, इसलिये कहा जा सकता है, कि यद्यपि संजय और अर्जुनके श्लोकोंका जोड़ समानही है, तथापि प्रत्येक श्लोकको पृथक् पृथक् गिननेमें कुछ फ़र्क हो गया होगा। परंतु इस बातका कुछ पता नहीं लगता, कि वर्तमान प्रतियोंमें भगवानके जो ५७५ श्लोक हैं, उनके बदले ६२० (अर्थात् ४५ अधिक) कहाँसे आ गये। यदि यह कहते हैं, कि गीताका ‘स्तोत्र’ या ‘ध्यान’ या इसी प्रकारके किसी अन्य प्रकरणका इसमें समावेश किया गया होगा; तो देखते हैं, कि बंबईमें मुद्रित महाभारतकी पोथीमें वह प्रकरण गी. र. ३३