भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 559

५१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं है। इतना ही नहीं; किंतु इस पोथीवाली गीतामेंभी सात सौ-ही श्लोक हैं। अतएव, वर्तमान सात सौ श्लोकोंकी गीताहीको प्रमाण माननेके सिवा अन्य मार्ग नहीं है। यह हुई गीताकी बात; परंतु जब महाभारतकी ओर देखते हैं, तो कहना पड़ता है, कि यह विरोध कुछभी नहीं है। स्वयं भारतहीमें यह कहा है, कि महा- भारत-संहिताकी संख्या एक लाख है। परंतु रा. ब. चिंतामणराव वैद्यने महाभारतके अपने टीका-ग्रंथमें स्पष्ट करके बतलाया है, कि वर्तमान प्रकाशित पोथियोंमें उतने श्लोक नहीं मिलते; और भिन्न भिन्न पर्वोके अध्यायोंकी संख्याभी भारतके आरंभमें दी गई अनुक्रमणिकाके अनुसार नहीं है। ऐसी अवस्थामें, गीता और महाभारतकी तुलना करनेके लिये इन ग्रंथोंकी किसी-न-किसी विशेष पोथीका आधार लिये बिना काम नहीं चल सकता; अतएव श्रीमच्छंकराचार्यने जिस सात सौ श्लोकोंवाली गीताको प्रमाण माना है, उसी गीताको और कलकत्तेके बाबू प्रतापचंद्र राय-द्वारा प्रकाशित महाभारतकी पोथीको प्रमाण मानकर हमने इन दोनों ग्रंथोंकी तुलना की है; और हमारे इस ग्रंथमें उद्धृत महाभारतके श्लोकोंका स्थान-निर्देशभी, कलकत्तेमें मुद्रित उक्त महाभारतके अनुसारही किया गया है। इन श्लोकोंको बंबईकी पोथीमें अथवा मद्रासके पाठक्रमके अनुसार प्रकाशित कृष्णाचार्यकी प्रतिमें देखना हो; और यदि वे हमारे निर्दिष्ट किये हुए स्थानोंपर न मिलें, तो कुछ आगे पीछे ढूँढ़नेसे वे मिल जायेंगे। सात सौ श्लोकोंकी गीता और कलकत्तेके बाबू प्रतापचंद्र राय-द्वारा प्रकाशित महाभारतकी तुलना करनेसे प्रथम यही दीख पड़ता है, कि भगवद्गीता महाभारत- हीका एक भाग है; और इस बातका उल्लेख स्वयं महाभारतमेंही कई स्थानोंमें पाया जाता है। पहला उल्लेख आदिपर्वके आरंभमें दूसरे अध्यायमें दी गई अनु- क्रमणिकामें किया गया है। पर्व-वर्णनमें पहले यह कहा है - "पूर्वोक्तं भगवद्गीता- पर्व भीष्मवधस्ततः " (मभा. आ. २. ६९); और फिर अठारह पर्वोंके अध्यायों और श्लोकोंकी संख्या बतलाते समय भीष्मपर्वके वर्णनमें पुनश्च भगवद्गीताका स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया गया है :- कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः । मोहजं नाशयामास हेतुभिर्मोक्षदर्शिभिः ॥ "जिसमें मोक्षगर्भ कारण बतलाकर वासुदेवने अर्जुनके मनका मोहज कश्मल दूर कर दिया (मभा. आ. २. २४७)। इसी प्रकार आदिपर्वके (आ. १. १७९) पहले अध्यायमें प्रत्येक श्लोकके आरंभमें 'यदाश्रौषं' कहकर, जब धृतराष्ट्रने बतलाया है, कि दुर्योधन प्रभृतिकी जय-प्राप्तिके विषयमें किस किस प्रकार मेरी निराशा होती गई; तब यह वर्णन है, कि "ज्योंही सुना, कि अर्जुनके मनमें मोह उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णने उसे विश्वरूप दिखलाया, त्योंही जयके विषयमें मेरी पूरी निराशा हो गई।" आदिपर्वके इन तीनों उल्लेखोंके बाद शांतिपर्वके अंतमें नारायणीय धर्मका