भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 956 में से

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पृष्ठ 560

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१५ वर्णन करते हुए गीताका फिरभी उल्लेख करना पड़ा है। नारायणीय, सात्वत, ऐकांतिक और भागवत - ये चारों नाम समानार्थक हैं। नारायणीयोपाख्यानमें (शां. ३३४-३५१) उस भक्तिप्रधान प्रवृत्ति-मार्गके उपदेशका वर्णन किया गया है, कि जिसका उपदेश नारायण ऋषि अथवा भगवानने श्वेतद्वीपमे नारदजीको किया था। पिछले प्रकरणोंमें भागवत धर्मके इस तत्त्वका वर्णन किया जा चुका है, कि वासुदेवकी एकांतभावसे भक्ति करके इस जगत्के सब व्यवहार स्वधर्मानुसार करते रहनेसेही मोक्षकी प्राप्ती हो जाती है, और यहभी बतला दिया गया है, कि इसी प्रकार भगवद्गीतामेंभी संन्यास-मार्गकी अपेक्षा कर्मयोगही श्रेष्ठतर माना गया है। इस नारायणीय धर्मकी परंपराका वर्णन करते समय वैशंपायन जनमेजयसे कहते हैं, कि यह धर्म साक्षात् नारायणसे नारदको प्राप्त हुआ है; और यही धर्म “कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पतः” (महा. शां. ३४६. १०) - हरिगीता अथवा भगवद्गीतामें बतलाया गया है। इसी प्रकार आगे चलकर ३४८ वें अध्यायके ८ वें श्लोकमें यह बतलाया गया है, कि :- समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपांडवयोधुंधे । अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ॥ कौरव और पांडवोंके युद्धके समय विमनस्क अर्जुनको भगवानने ऐकांतिक अथवा नारायण-धर्मकी इन विधियोंका उपदेश किया था; और सब युगोंमें स्थित नारा- यण-धर्मकी परंपरा बतलाकर पुनश्च कहा है, कि इस धर्मका और यतियोंके धर्म अर्थात् संन्यास-धर्मका वर्णन 'हरिगीता'में किया गया है (महा. शां. ३४८. ५३)। आदिपर्व और शांतिपर्वमें किये गये इन छः उल्लेखोंके अतिरिक्त अश्वमेधपर्वके अनु- गीतापर्वमेंभी और एक बार भगवद्गीताका उल्लेख किया गया है। जब भारतीय युद्ध पूरा हो गया, युधिष्ठिरका राज्याभिषेकभी हो गया; और एक दिन श्रीकृष्ण तथा अर्जुन एकत्र बैठे हुए थे; तब श्रीकृष्णने कहा- “यहाँ अब मेरे रहनेकी कोई आवश्य कता नहीं है; द्वारका जानेकी इच्छा है।” इसपर अर्जुनने श्रीकृष्णसे प्रार्थना की, कि युद्धके आरंभमें पहले आपने मुझे जो उपदेश किया था, वह मैं भूल गया; इसलिये वह मुझे फिरसे बतलाइये (अश्व. १६)। तब इस विनतीके अनुसार, द्वारकाको जानेके पहले, श्रीकृष्णने अर्जुनको अनुगीता सुनाई है। इस अनुगीताके आरंभहीमें भगवानने कहा है- “दुर्भाग्य-वश तू उस उपदेशको भूल गया; जिसे मैंने तुझे युद्धके आरंभमें बतलाया था। उस उपदेशको फिरसे वैसेही बतलाना अब मेरे लियेभी असंभव है, इसलिये उसके बदले तुझे कुछ अन्य बातें बतलाता हूँ” (महा. अश्व. अनुगीता १६. ९-१३)। यह बात ध्यान देने योग्य है, कि अनुगीतामें वर्णित कुछ प्रकरण गीताके प्रकरणोंके समानही है। अनुगीताके उक्त निर्देशको मिलाकर महाभारतमें भगवद्गीताका सात बार स्पष्ट उल्लेख हो गया है। अर्थात् अंतर्गत

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