श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रमाणोंसे स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि भगवद्गीता वर्तमान महाभारतकाही एक भाग है। परंतु संदेहकी गति निरंकुश रहती है; इसलिये उपर्युक्त सात निर्देशोंमेंभी कई लोगोंका समाधान नहीं होता। वे कहते हैं, कि यह कैसे सिद्ध हो सकता है, कि ये उल्लेखभी भारतमें पीछेसे नहीं जोड़ दिये गये होंगे ? इस प्रकार उनके मनमें यह शंका ज्यो-की-त्यों रह जाती है, कि गीता महाभारतका भाग है अथवा नहीं। पहले तो यह शंका केवल इसी समझसे उपस्थित हुई है, कि गीता-ग्रंथ ब्रह्मज्ञान-प्रधान है; परंतु हमने पहलेही विस्तारपूर्वक बतला दिया है, कि यह समझ ठीक नहीं, अतएव यथार्थमें देखा जाय, तो अब इस शंकाके लिये कोई स्थानही नहीं रह जाता। तथापि इन प्रमाणोंपरही अवलंबित न रहते हुए अब हम बतलाना चाहते हैं, कि अन्य प्रमाणोंसेभी उक्त शंकाकी अयथार्थता सिद्ध हो सकती है। जब दो ग्रंथोंके विषयमें यह शंका की जाती है, कि वे दोनों एकही ग्रंथकारके हैं या नहीं; तब काव्यमीमांसक- गण पहले इन दोनों बातों - शब्दसादृश्य और अर्थसादृश्य - का विचार किया करते हैं। शब्दसादृश्यमें केवल शब्दोंहीका समावेश नहीं होता किंतु उसमें भाषा- रचनाकाभी समावेश किया जाता है। इस दृष्टिसे विचार करते समय देखना चाहिये कि गीताकी भाषा और महाभारतकी भाषामें कितनी समता है। परंतु महाभारत ग्रंथ बहुत बड़ा और विस्तीर्ण है; इसलिये उसमें प्रसंगके अनुसार स्थान-स्थानपर भाषाकी रचनाभी भिन्न भिन्न रीतिसे की गई है। उदाहरणार्थ, कर्णपर्वके कर्ण और अर्जुनके युद्धका वर्णन पढ़नेसे दीख पड़ता है, कि उसकी भाषारचना अन्य प्रकरणोंकी भाषासे भिन्न है। अतएव यह निश्चित करना अत्यंत कठिन है, कि गीता और महाभारतकी भाषामें समता है या नहीं। तथापि सामान्यतः विचार करनेपर हमें परलोकवासी काशीनाथपंत तेलंगके * मतसे सहमत होकर कहना पड़ता है, कि गीताकी भाषा तथा छंदरचना आर्ष अथवा प्राचीन है। उदाहरणार्थ, काशीनाथपंतने यह बतलाया है, कि अंत (गीता २. १६), भाषा (गीता २. ५४), ब्रह्म (= प्रकृति, गीता १४. ३), योग (कर्मयोग), पादपूरक अव्यय 'ह' (गीता २. ९) आदि शब्दोंका प्रयोग गीतामें जिस अर्थमें किया गया है, उस अर्थमे वे शब्द कालिदास प्रभृतिके काव्योंमे नहीं पाये जाते; और पाठभेदहीसे क्यों न हो; परंतु गीताके ११. ३५ श्लोकमें 'नमस्कृत्या' यह अपाणिनीय शब्द रखा गया है, तथा गीता
- स्वर्गीय काशीनाथ त्र्यंबक तेलंग-द्वारा रचित भगवद्गीताका अंग्रेजी अनुवाद मैक्समूलर साहब-द्वारा संपादित प्राच्यधर्म-पुस्तकमालामें (Sacred Books of the East Series, Vol. VIII) प्रकाशित हुआ है। इस ग्रंथमें गीतापर एक टीकात्मक लेख प्रस्तावनाके तौरपर जोड़ दिया गया है। स्वर्गीय तेलंगके मतानुसार इस प्रकरणमें जो उल्लेख हैं, वे (एक स्थानको छोड़) इस प्रस्तावनाको लक्ष्य करकेही किये गये हैं।