श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१७ ११. ४८ में ‘शक्य अहं’ इस प्रकार अपाणिनीय संधिभी की गई है। इसी तरह “सेनानीनामहं स्कन्दः” (गीता १०. २४) में जो ‘सेनानीनां’ षष्ठीकारक है वहभी पाणिनीके अनुसार शुद्ध नहीं है। आर्ष वृत्तरचनाके उदाहरणोंको स्वर्गीय तेलंगने स्पष्ट करके नहीं बतलाया है; परंतु हमें यह प्रतीत होता है, कि ग्यारहवें अध्यायवाले विश्वरूप-वर्णनके (गीता ११. १५-५०) छत्तीस श्लोकोंको लक्ष्य करकेही उन्होंने गीताकी छंदरचनाको आर्ष कहा है। इन श्लोकोंके प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं; परंतु गणोंका कोई नियम नहीं है; एक इंद्रवज्रा चरण है तो दूसरा उपेंद्र- वज्रा, तीसरा है शालिनी, तो चौथा किसी अन्य प्रकारका; इस तरह उक्त छत्तीस श्लोकोंमें - अर्थात् १४४ चरणोंमें - भिन्न भिन्न जातिके कुल ग्यारह चरण दीख पड़ते हैं। तथापि उनमें यह नियमभी दीख पड़ता है, कि प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं; और उनमेंसे पहला, चौथा, आठवाँ और अंतिम दो अक्षर गुरु हैं; तथा छठा अक्षर प्रायः लघुही है। इससे यह अनुमान किया जाता है, कि ऋग्वेद तथा उप- निषदोंके त्रिष्टुप् छंदके ढंगपरही ये श्लोक रचे गये हैं। ऐसे ग्यारह अक्षरोंके विषम- वृत्त कालिदासके काव्योंमें नहीं मिलते। हाँ, शांकुतल नाटकका “अमी वेदिं परितः क्लृप्तधिष्ण्याः” यह श्लोक इसी छंदमें है; परंतु कालिदासहीने उसे ‘ऋक्छंद’ अर्थात् ऋग्वेदका छंद कहा है। इससे यह बात प्रकट हो जाती है, कि आर्ष वृत्तोंके प्रचारके समयहीमें गीता-ग्रंथकी रचना हुई है। महाभारतके अन्य स्थलोंमें उक्त प्रकारके आर्ष शब्द और वैदिक वृत्त दीख पड़ते हैं। परंतु इसके अतिरिक्त इन दोनों ग्रंथोंके भाषासादृश्यका दूसरा दृढ़ प्रमाण यह है, कि महाभारत और गीतामें एकहीसे अनेक श्लोक पाये जाते हैं। महाभारतके सब श्लोकोंकी छानबीन कर यह निश्चित करना कठिन है, कि उनमेंसे गीतामें कितने श्लोक उपलब्ध हैं। परंतु महाभारत पढ़ते समय उसमें जो श्लोक अक्षरशः या न्यूनाधिक पाठभेदसे गीताके श्लोकोंके सदृश हमें जान पड़े, उनकी संख्याभी कुछ कम नहीं है; और उनके आधारपर भाषा- सादृश्यके प्रश्नका निर्णयभी सहजही हो सकता है। नीचे दिये गये श्लोक और श्लोकार्ध, गीता और महाभारत (कलकत्ता की प्रति) में शब्दशः अथवा एक-आध शब्दकी भिन्नता होकर ज्यों-के-त्यों मिलते हैं :- गीता महाभारत १. ९ नानाशास्त्रप्रहरणा.० श्लोकार्ध । भीष्मपर्व (५१. ४) ; गीताके सदृशही दुर्योधन द्रोणाचार्यसे अपनी सेनाका वर्णन कर रहा है । १. १० अपर्याप्तं० पूरा श्लोक । भीष्म. (५१. ६)