श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र १. १२–१९ तक आठ श्लोक । भीष्म (५१. २२–२९); कुछ शब्द- भेद रहते हुए शेष गीताके श्लोकोंके समानही हैं। १. ४५ अहो बत महत्पापं० श्लोकार्ध । द्रोण. (१९३. ५०); कुछ शब्दभेद है, शेष गीताके श्लोकके समान । २. १९ उभौ तौ न विजानीत० श्लोकार्ध । शांति. (२२४. १४); कुछ पाठभेद होकर बलि-वासव-संवाद और कठोप- निषदमें (२. १८) है। २. २८ अव्यक्तादीनि भूतानि० श्लोक । स्त्री. (२. ६. ९. ११); 'अव्यक्त'के बदले 'अभाव' है, शेष सब समान है। २. ३१ धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयो० श्लोकार्ध । भीष्म. (१२४. ३६); भीष्म कर्णको यही बतला रहे हैं। २. ३२ यदृच्छया० श्लोक । कर्ण. (५३. २) 'पार्थ'के बदले 'कर्ण' पद रखकर दुर्योधन कर्णसे कह रहा है। २. ४६ यावान् अर्थ उदपाने० श्लोक । उद्योग. (४५. २६); सनत्सुजातीय प्रकरणमे कुछ शब्दभेदसे पाया जाता है। २. ५९ विषया विनिवर्तन्ते० श्लोक । शांति (२०४. १६); मनु-बृहस्पति- संवादमें अक्षरशः मिलता है। २. ६७ इंद्रियाणा हि चरता० श्लोक । वन. (२१०. २६); ब्राह्मण-व्याध- संवादमें कुछ पाठभेदसे आया है और पहले रथका रूपक भी दिया गया है। २. ७० आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं० श्लोक । शांति. (२५०. ९); शुकानुप्रश्नमें ज्यों- का-त्यों आया है। ३. ४२ इंद्रियाणि पराण्याहु.० श्लोक । शांति. (२४५. ३; २४७. २) कुछ पाठभेदसे शुकानुप्रश्नमे दो बार आया है। परंतु इस श्लोकका मूल स्थान कठोपनिषदमें है (कठ. ३. १०)। ४. ७ यदा यदाहि धर्मस्य० श्लोक । वन. (१८९. २७); मार्कंडेय-प्रश्नमें ज्यों-का-त्यों है।