भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१९ ४. ३१ नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य ० शांति. ( २६७. ४० ) ; गोकापिली- श्लोकार्ध । याख्यानमें पाया जाता है, और सब प्रकरण यज्ञविषयकही है । ४. ४० नायं लोकोऽस्ति न परो० वन. ( १९९. ११० ) ; मार्कण्डेय समस्या- श्लोकार्ध । पर्वमें शब्दशः मिलता है । ५. ५ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं० श्लोक । शांति. ( ३०५; १९; ३१६. ४ ) ; इन दोनों स्थानोंमें कुछ पाठभेदसे वसिष्ठकराल औरयाज्ञवल्क्य-जन- कके संवादमें पाया जाता है । ५. १८ विद्याविनयसंपन्ने० श्लोक । शांति. ( २३८. १९ ) ; शुकानुप्रश्नमें अक्षरशः मिलता है । ६. ५ आत्मैव ह्यात्मनो बंधु० श्लोकार्ध । उद्योग. ( ३३. ६३, ६४ ) ; विदुर- और आगामी श्लोकका अर्ध । नीतिमें ठीक ठीक मिलता है । ६. २९ सर्वभूतस्थमात्मानं० श्लोकार्ध । शांति. ( २३८. २१ ) ; शुकानुप्रश्न, मनु- स्मृति ( १२. ९१ ), ईशावास्योप- निषद् ( ६ ) और कैवल्योपनिषदमें ( १. १० ) तो ज्यों-का-ज्यों मिलता है। ६. ४४ जिज्ञासुरपि योगस्य० श्लोकार्ध । शांति. ( २३५. ७ ) ; शुकानुप्रश्नमें कुछ पाठ-भेद करके रखा गया है । ८. १७ सहस्रयुगपर्यंतं० यह श्लोक पहले शांति. ( २३१. ३१ ) ; शुकानुप्रश्नम युगका अर्थ न बतलाकर गीतामें अक्षरशः मिलता है; और युगका अर्थ दिया गया है । बतलानेवाला कोष्टकभी पहले दिया गया है । मनुस्मृतिमेंभी कुछ पाठां- तरसे मिलता है ( मनु. १. ७३ ) । ८. २० यः स सर्वेषु भूतेषु श्लोकार्ध । शांति. ( ३३९. २३ ) ; नारायणीय धर्ममें कुछ पाठांतर होकर दो बार आया है । ९. ३२ स्त्रियो वैश्यास्तथा० यह पूरा अश्व. ( १९. ६१, ६२ ) ; अनुगीतामें श्लोक और आगामी श्लोकका कुछ पाठांतरके साथ येही श्लोक हैं । पूर्वार्ध ।