भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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५२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र १३. १३ सर्वतः पाणिपादं० श्लोक । शांति. ( २३८. २९; अश्व १९. ४९ ) ; शुकानुप्रश्न, अनुगीता तथा अन्यत्रभी यह अक्षरशः मिलता है। इस श्लोकका मूलस्थान श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ३. १६ ) है। १३. ३० यदा भूतपृथग्भावं० श्लोक । शांति. ( १७. २३ ) ; युधिष्ठिरने अर्जु- नसे येही शब्द कहे हैं। १४. १८ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था० अश्व. ( ३९. १० ) ; अनुगीताके गुरु- श्लोक । शिष्यसंवादमें अक्षरशः मिलता है। १६. २१ त्रिविधं नरकस्येदं० श्लोक । उद्योग. ( ३२. ७ ) . विदुरनीतिमें अक्षर- शः मिलता है। १७. ३ श्रद्धामयोऽयं पुरुषः० श्लोकार्ध । शांति. ( २६३. १७ ) ; तुलाधार-जाजलि- संवादके श्रद्धा प्रकरणमें मिलता है। १८. १४ अधिष्ठानं तथा कर्ता० श्लोक शांति. ( ३४७. ८७ ) ; नारायणीय । धर्ममें अक्षरशः मिलता है। उक्त तुलनासे यह बोध होता है, कि २७ पूरे श्लोक और १२ श्लोकार्ध, गीता तथा महाभारतके भिन्न प्रकरणोंमें - कहीं कहीं तो अक्षरशः और कहीं कहीं कुछ पाठांतर होकर - एकहीसे हैं; और, यदि पूरी तौरसे जांच की जावें, तो औरभी कुछ श्लोकों तथा श्लोकार्धोंका मिलना संभव है। यदि यह देखना चाहें, कि दो-दो अथवा तीन-तीन शब्द अथवा श्लोकके चतुर्थांश ( चरण ) गीता और महाभारतमें कितने स्थानोंपर एक-से हैं, तो उपर्युक्त तालिका कहीं अधिक बढ़ानी होगी।* परंतु इस शब्द-साम्यके अतिरिक्त केवल उपर्युक्त तालिकाके श्लोक-सादृश्यका विचार करें, *यदि इस दृष्टिसे संपूर्ण महाभारत देखा जाय, तों गीता और महाभारतमें समान श्लोकपाद अर्थात् चरण सौंसेभी अधिक दीख पड़ेंगे। उनमेंसे कुछ यहाँ दिये जाते हैं - किं भोगैर्जीवितेन वा (गीता १. ३२) नैतत्त्वय्युपपद्यते (गीता २. ३), त्रायते महतो भयात् ( २. ४० ), अशांतस्य कुतः सुखम् ( २. ६६ ), उत्सी देयुरिमे लोकाः ( ३. २४), मनो दुर्निग्रहं चलम् ( ६. ३५), ममात्मा भूतभावनः ( ९. ५ ), मोघाशा मोघकर्माणः ( ९. १२), समः सर्वेषु भूतेषु ( ९. २९), दीप्तानलार्कद्युति ( ११. १७), सर्वभूतेहिते रताः ( १२. ४), तुल्यनिंदा स्तुतिः ( १२. १९ ), संतुष्टो येनकेनचित् ( १२. १९), समलोष्टाश्मकांचनः ( १४. २४ ); त्रिविधा कर्मचोदना ( १८. १८) ; निर्ममः शांतः ( १८. ५३ ), ब्रह्म- भूयाय कल्पते ( १८. ५३ ) इत्यादि ।