भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२१

तो बिना यह कहे नहीं रहा जा सकता, कि महाभारतके अन्य प्रकरण और गीता, ये दोनों एकही लेखनीके फल हैं। यदि प्रत्येक प्रकरणपर विचार किया जाय, तो यह प्रतीत हो जायगा, कि उपर्युक्त ३३ श्लोकोंमेंसे १ मार्कंडेय प्रश्नमें, आधा मार्कंडेय-समस्यामें, १ ब्राह्मण-व्याध-संवादमें, २ विदुर-नीतिमें, १ सनत्सुजातीयमें १ मनु-बृहस्पति-संवादमें, ६।। शुकानुप्रश्नमें, १ तुलाधार-जाजलि-संवादमें, १ वसिष्ठ- कराल और याज्ञवल्क्य-जनक-संवादमें, १।। नारायणीय धर्ममें, २।। अनुगीतामें और शेष भीष्म, द्रोण, कर्ण, तथा स्त्रीपर्वमें उपलब्ध हैं। इनमेंसे प्रायः सब जगह ये श्लोक पूर्वापर संदर्भके उक्त उचित स्थानोंपरही मिलते हैं - प्रक्षिप्त नहीं हैं; और यहभी प्रतीत होता है, कि इनमेंसे कुछ श्लोक गीताहीमें समारोप दृष्टिसे लिये गये हैं। उदाहरणार्थ, 'सहस्रयुगपर्यन्तम्' (गीता. ८. १७) इस श्लोकके स्पष्टीकरणार्थ वर्ष और युगकी व्याख्या पहले बतलाना आवश्यक था; और महाभारत (शां. २३१) तथा मनुस्मृतिमें इस श्लोकके पहले उनके लक्षणभी कहे गये हैं। परंतु गीतामें यह श्लोक, 'युग' आदिकी व्याख्या न बतला कर, एकदम कहा गया है। इस दृष्टिसे विचार करनेपर यह नहीं कहा जा सकता, कि महाभारतके अन्य प्रकरणोंमें ये श्लोक गीताहीसे उद्धृत किये गये हों; और, इतने भिन्न भिन्न प्रकरणोंमेंसे गीतामें इन श्लोकोंका लिया जानाभी संभव नहीं है। अतएव, यही कहना पड़ता है, कि गीता और महाभारतके इन प्रकरणोंका लिखनेवाला कोई एकही पुरुष होना चाहिये। यहाँ यह बतला देना आवश्यक प्रतीत होता है, कि जिस प्रकार मनुस्मृतिके कई श्लोक महाभारतमें मिलते हैं,* उसी प्रकार गीताका 'सहस्रयुग- पर्यन्तम्' (८:१७) यह पूर्ण श्लोक कुछ हेरफेरके साथ, और यह श्लोकार्ध - "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्" (गीता ३. ३५; १८.४७) 'श्रेयान्'के बदले 'वरं' पाठांतर होकर - मनुस्मृतिमें पाया जाता है, तथा 'सर्वभूतस्थ- मात्मानम्' यह श्लोकार्धभी (गीता ६. २९) 'सर्वभूतेषु चात्मानम्' इस रूपसे मनुस्मृतिमें पाया जाता है (मनु. १. ७३; १०. ९७; १२. ९१)। महाभारतके अनुशासनपर्वमें तो 'मनुनाभिहितं शास्त्रम्' (अनु. ४७. ३५) कहकर मनुस्मृतिका स्पष्ट रीतिसे उल्लेख किया गया है। शब्द-सादृश्यके बदले यदि अर्थ-सादृश्य देखा जाय, तोभी उक्त अनुमान दृढ़ हो जाता है। पिछले प्रकरणोंमें गीताके कर्मयोग-मार्ग और प्रवृत्ति प्रधान भागवत-धर्म या नारायणीय धर्मकी समताका दिग्दर्शन हम करही चुके हैं। नारायणीय धर्ममें व्यक्त-


  • 'प्राच्यधर्म-पुस्तकमाला'में मनुस्मृतिका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। उसमें बुलर साहबने एक फेहरिस्त जोड़ दी है, और यहभी बतलाया है, कि मनुस्मृतिके कौन कौन-से श्लोक महाभारतमें मिलते हैं। (S. B. E. Vol. XXV, p. 533 §§ देखो)।