श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सृष्टिकी उपपत्ति की जो यह परंपरा बतलाई गई है, ( मभा. शां. ३३९. ७१, ७२ ), कि वासुदेवसे संकर्षण, संकर्षणसे प्रद्युम्न, प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध और अनिरुद्धसे ब्रह्मदेव हुए; वह गीतामें नहीं ली गई। इसके अतिरिक्त यहभी सच है, कि गीता-धर्म और नारायणीय धर्ममें अन्य अनेक भेद हैं। परंतु चतुर्व्यूह परमेश्वरकी कल्पना गीताको मान्य भलेही न हो; तथापि गीताके सिद्धान्तोंपर विचार करनेसे प्रतीत होता है, कि गीता-धर्म और भागवत-धर्म एकहीसे हैं। वे सिद्धान्त ये हैं- एकव्यूह वासुदेवकी भक्तिही राजमार्ग हैं; किसीभी अन्य देवताकी भक्ति की जाय, वह वासुदेवहीको अर्पण हो जाती है; भक्त चार प्रकारके होते हैं; स्वधर्मके अनु- सार सब कर्म करके भगवद्भक्तको यज्ञचक्र जारी रखना चाहिये; और संन्यास लेना उचित नहीं है। यह पहले बतलाया जा चुका है, कि विवस्वान्-मनु, इक्ष्वाकु आदि सांप्रदायिक परंपराभी दोनों ओर एकही है। इसी प्रकार सनत्सुजातीय, शुकानुप्रश्न, याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, अनुगीता इत्यादि प्रकरणोंको पढ़नेसे यह बात ध्यानमें आ जायगी, कि गीतामें वर्णित वेदान्त या अध्यात्मज्ञानभी उक्त प्रकरणोंमें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञानसे मिलता-जुलता है। कापिल-सांख्यशास्त्रके २५ तत्त्वों और गुणोत्कर्षके सिद्धान्तसे सहमत होकरभी भगवद्गीताने जिस प्रकार यह माना है, कि प्रकृति और पुरुषकेभी परे कोई नित्य-तत्त्व है; उसी प्रकार शांतिपर्वके वसिष्ठ- कराल-जनक-संवादमें और याज्ञवल्क्य-जनक-संवादमें विस्तारपूर्वक यह प्रतिपादन किया गया है, कि सांख्योंके २५ तत्त्वोंके परे एक 'छब्बीसवाँ' तत्त्व और हैं, जिसके ज्ञानके बिना कैवल्य प्राप्त नहीं होता। यह विचार-सादृश्य केवल कर्मयोग या अध्यात्म इन्हीं दो विषयोंके संबंधमें नहीं दीख पड़ता; किंतु इन दो मुख्य विषयोंके अतिरिक्त गीतामें जो अन्याय विषय हैं, उनकी बराबरीके प्रकरणभी महाभारतमें कई जगह पाये जाते हैं। उदाहरणार्थ, गीताके पहले अध्यायके आरंभमेंही द्रोणाचार्यसे दोनों सेनाओंका जैसा वर्णन दुर्योधनने किया है, ठीक वैसाही आगे भीष्मपर्वके ५१ वें अध्यायमें, उसने फिरसे द्रोणाचार्यसे वर्णन किया है। पहले अध्यायके उत्तरार्धमें अर्जुनको जैसा विषाद हुआ, वैसाही आगे युधिष्ठिरको शांतिपर्वके आरंभमें हुआ है; और जब भीष्म तथा द्रोणका 'योगबल'से वध करनेका समय समीप आया, तब अर्जुनके मुखसे फिर वैसेही खेदयुक्त वचन निकले, हैं ( मभा. भीष्म. ९७. ४-७; १०८. ८८-९४)। गीताके (गीता १. ३२, ३३) आरंभमें अर्जुनने कहा है, कि जिनके लिये उपभोग प्राप्त करना है, उन्हींका वध करके जय प्राप्त करे, तो उसका उपयोगही क्या होगा ? और जब युद्धमें सब कौरवोंका वध हो गया, तब यही बात दुर्योधनके मुखसेभी निकली है ( मभा. शल्य. ३१. ४२-५१ ) । दूसरे अध्यायके आरंभमेंही जैसे सांख्य और कर्मयोग ये दोनों निष्ठाएँ बतलाई गई हैं, वैसेही नारा- यणीय धर्ममें और शांतिपर्वके जापकोपाख्यान तथा जनक-सुलभा-संवादमेंभी इन निष्ठाओंका वर्णन पाया जाता है (.मभा. शां. १९६, ३२० ) । तीसरे अध्यायके,