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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

५२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सृष्टिकी उपपत्ति की जो यह परंपरा बतलाई गई है, ( मभा. शां. ३३९. ७१, ७२ ), कि वासुदेवसे संकर्षण, संकर्षणसे प्रद्युम्न, प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध और अनिरुद्धसे ब्रह्मदेव हुए; वह गीतामें नहीं ली गई। इसके अतिरिक्त यहभी सच है, कि गीता-धर्म और नारायणीय धर्ममें अन्य अनेक भेद हैं। परंतु चतुर्व्यूह परमेश्वरकी कल्पना गीताको मान्य भलेही न हो; तथापि गीताके सिद्धान्तोंपर विचार करनेसे प्रतीत होता है, कि गीता-धर्म और भागवत-धर्म एकहीसे हैं। वे सिद्धान्त ये हैं- एकव्यूह वासुदेवकी भक्तिही राजमार्ग हैं; किसीभी अन्य देवताकी भक्ति की जाय, वह वासुदेवहीको अर्पण हो जाती है; भक्त चार प्रकारके होते हैं; स्वधर्मके अनु- सार सब कर्म करके भगवद्भक्तको यज्ञचक्र जारी रखना चाहिये; और संन्यास लेना उचित नहीं है। यह पहले बतलाया जा चुका है, कि विवस्वान्-मनु, इक्ष्वाकु आदि सांप्रदायिक परंपराभी दोनों ओर एकही है। इसी प्रकार सनत्सुजातीय, शुकानुप्रश्न, याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, अनुगीता इत्यादि प्रकरणोंको पढ़नेसे यह बात ध्यानमें आ जायगी, कि गीतामें वर्णित वेदान्त या अध्यात्मज्ञानभी उक्त प्रकरणोंमें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञानसे मिलता-जुलता है। कापिल-सांख्यशास्त्रके २५ तत्त्वों और गुणोत्कर्षके सिद्धान्तसे सहमत होकरभी भगवद्गीताने जिस प्रकार यह माना है, कि प्रकृति और पुरुषकेभी परे कोई नित्य-तत्त्व है; उसी प्रकार शांतिपर्वके वसिष्ठ- कराल-जनक-संवादमें और याज्ञवल्क्य-जनक-संवादमें विस्तारपूर्वक यह प्रतिपादन किया गया है, कि सांख्योंके २५ तत्त्वोंके परे एक 'छब्बीसवाँ' तत्त्व और हैं, जिसके ज्ञानके बिना कैवल्य प्राप्त नहीं होता। यह विचार-सादृश्य केवल कर्मयोग या अध्यात्म इन्हीं दो विषयोंके संबंधमें नहीं दीख पड़ता; किंतु इन दो मुख्य विषयोंके अतिरिक्त गीतामें जो अन्याय विषय हैं, उनकी बराबरीके प्रकरणभी महाभारतमें कई जगह पाये जाते हैं। उदाहरणार्थ, गीताके पहले अध्यायके आरंभमेंही द्रोणाचार्यसे दोनों सेनाओंका जैसा वर्णन दुर्योधनने किया है, ठीक वैसाही आगे भीष्मपर्वके ५१ वें अध्यायमें, उसने फिरसे द्रोणाचार्यसे वर्णन किया है। पहले अध्यायके उत्तरार्धमें अर्जुनको जैसा विषाद हुआ, वैसाही आगे युधिष्ठिरको शांतिपर्वके आरंभमें हुआ है; और जब भीष्म तथा द्रोणका 'योगबल'से वध करनेका समय समीप आया, तब अर्जुनके मुखसे फिर वैसेही खेदयुक्त वचन निकले, हैं ( मभा. भीष्म. ९७. ४-७; १०८. ८८-९४)। गीताके (गीता १. ३२, ३३) आरंभमें अर्जुनने कहा है, कि जिनके लिये उपभोग प्राप्त करना है, उन्हींका वध करके जय प्राप्त करे, तो उसका उपयोगही क्या होगा ? और जब युद्धमें सब कौरवोंका वध हो गया, तब यही बात दुर्योधनके मुखसेभी निकली है ( मभा. शल्य. ३१. ४२-५१ ) । दूसरे अध्यायके आरंभमेंही जैसे सांख्य और कर्मयोग ये दोनों निष्ठाएँ बतलाई गई हैं, वैसेही नारा- यणीय धर्ममें और शांतिपर्वके जापकोपाख्यान तथा जनक-सुलभा-संवादमेंभी इन निष्ठाओंका वर्णन पाया जाता है (.मभा. शां. १९६, ३२० ) । तीसरे अध्यायके,

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२३ वनपर्वके आरंभमें द्रौपदीने युधिष्ठिरसे कहा है, कि अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है; कर्म न किया जाय, तो उपजीविकाभी न हो सकेगी । सो यही बातें (मभा. वन. ३२); और इन्ही तत्त्वोंका उल्लेख अनुगीतामेंभी फिरसे किया गया है। श्रौत-धर्म या स्मार्त-धर्म यज्ञमय है, यज्ञ और प्रजाको ब्रह्मदेवने एकही साथ निर्माण किया है, इत्यादि गीताका प्रवचन नारायणीय धर्मके अतिरिक्त शांतिपर्वके अन्य स्थानोंमें (शां. २६७) और मनुस्मृति (मनु. ३) मेंभी मिलता है। तुलाधार-जाजली- संवादमें तथा ब्राह्मण-व्याध-संवादमेंभी यही विचार मिलते हैं, कि स्वधर्मके अनुसार कर्म करनेमें कोई पाप नहीं है (मभा. शां. २६०-२६३; वन. २०६-२१५)। इसके सिवा, सृष्टिकी उत्पत्तिका जो थोड़ा वर्णन गीताके सातवें और आठवें अध्यायोंमें है, उसी प्रकारका वर्णन शांतिपर्वके शुकानुप्रश्नमेंभी पाया जाता है (शां. २३१); और छठे अध्यायमें पातंजलयोगके आसनोंका जो वर्णन है, उसीका फिरसे शुकानु- प्रश्न (शां. २३९) में और आगे चलकर शांतिपर्वके ३००वें अध्यायमें तथा अनुगीतामेंभी विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है (अश्व. १९)। अनुगीताके गुरुशिष्य-संवादमें किये गये मध्यमोत्तम वस्तुओंके वर्णन (अश्व. ४३, ४४) और गीताके दसवें अध्यायके विभूति-वर्णनके विषयमें तो यह कहा जा सकता है, कि इन दोनोंका प्रायः एकही अर्थ है। महाभारतमें कहा है, कि गीतामें भगवानने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखलाया था, वही संधि-प्रस्तावके समय दुर्योधन आदि कौरवोंको, और युद्धके बाद द्वारकाको लौटते समय मार्गमें उत्तंकको भगवानने दिखलाया; और नारायणने नारदको तथा दाशरथि रामने परशुरामको दिखलाया (उ. १३०; अश्व. ५५; शां. ३३९; वन ९९)। इसमें संदेह नहीं, कि गीताका विश्वरूप-वर्णन इन चारों स्थानोंके वर्णनोंसे कहीं अधिक सुरस और विस्तृत है; परंतु सब वर्णनोंको पढ़नेसे यह सहजही मालूम हो जाता है, कि अर्थ-सादृश्यकी दृष्टिसे उनमें कोई नवीनता नहीं है। गीताके चौदहवें और पंद्रहवें अध्यायोंमें इन बातोंका निरूपण किया गया है, कि सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंके कारण सृष्टिमें भिन्नता कैसे उत्पन्न होती है; इन गुणोंके लक्षण क्या हैं; और सब कर्तृत्व गुणोंहीका है, आत्माका नहीं; ठीक इसी प्रकार, इन तीनोंका वर्णन अनुगीता (अश्व. ३६-३९) और शांतिपर्वमेंभी अनेक स्थानोंमें पाया जाता है (शां. २८५, ३३०-३११); सारांश, गीतामें जिस प्रसंगका वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उसमें कुछ विषयोंका विवेचन अधिक विस्तृत हो गया है, और गीताकी विषय- विवेचन-पद्धतिभी कुछ भिन्न है; तथापि यह दीख पड़ता है, कि गीताके सब विचारोंसे समानता रखनेवाले विचार महाभारतमेंभी पृथक् पृथक्, कहीं-न-कहीं, न्यूनाधिक पायेही जाते हैं; और यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि विचार-सादृश्यके साथ- ही-साथ थोड़ीबहुत समता शब्दोंमेंभी आप-ही आप आ जाती है। मार्गशीर्ष महीनेके संबंधकी सादृश्यता तो बहुतही विलक्षण है। गीतामें “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”

५२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (गीता १०. ३५) कहकर इस मासको जिस प्रकार पहला स्थान दिया है, उसी प्रकार अनुशासनपर्वके दानधर्म-प्रकरणमें जहाँ उपवासके लिये महीनोंके नाम बतलानेका मौक़ा दो बार आया है, वहाँ प्रत्येक बार मार्गशीर्षसेही महिनोंकी गिनती आरंभ की गई है (अनु. १०६, १०९) । गीतामें वर्णित आत्मौपम्यकी या सर्वभूतहितकी दृष्टि, अथवा आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक भेद तथा देवयान और पितृयान-गतिका उल्लेख महाभारतके अनेक स्थानोंमें पाया जाता है, परंतु पिछले प्रकरणोंमें इनका विस्तृत विवेचन किया जा चुका है; अतएव यहाँपर पुनरुक्तिकी आवश्यकता नहीं। भाषा-सादृश्यकी ओर देखिये, या अर्थ-सादृश्यपर ध्यान दीजिये, अथवा गीताके विषय महाभारतमें जो छः-सात उल्लेख मिलते हैं, उन पर विचार कीजिये; अनुमान यही करना पड़ता है, कि गीता वर्तमान महाभारतकाही एक भाग है; और जिस पुरुषने वर्तमान महाभारतकी रचना की है, उसीने वर्तमान गीताकाभी वर्णन किया है। हमने देखा है, कि इन सब प्रमाणोंकी ओर ध्यान न देकर अथवा किसी तरह उनका अटकल-पच्चू अर्थ लगाकर, कुछ लोगोंने गीताको प्रक्षिप्त सिद्ध करनेका का यत्न किया है। परंतु जो लोग बाह्य प्रमाणोंको नहीं मानते; और अपने- ही संशयरूपी पिशाचको अग्रस्थान दिया करते हैं, हमारे मतसे, उनकी विचार-पद्धति सर्वथा अशास्त्रीय अतएव अग्राह्य है। हाँ, यदि इस बातकी उपपत्तिही मालूम न होती, कि गीताको महाभारतमें क्या स्थान दिया गया है, तो बात कुछ और थी । परंतु जैसे कि इस प्रकरणके आरंभमें बतला दिया गया है; गीता केवल वेदान्त- प्रधान अथवा भक्ति-प्रधान नहीं है; किंतु महाभारतमे जिन प्रमाणभूत श्रेष्ठ पुरुषोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है, उनके चरित्रोंका नीति-तत्त्व या मर्म बतलानेके लिये महाभारतमें कर्मयोग-प्रधान गीताका निरूपण अत्यंत आवश्यक था; और वर्तमान समयमें महाभारतके जिस स्थानपर वह पाई जाती है, उससे बढ़कर, काव्य-दृष्टि- सेभी कोई अधिक योग्य स्थान उसके लिये दीख नहीं पड़ता । इतना सिद्ध होनेपर अंतिम सिद्धान्त यही निश्चित होता है, कि गीता महाभारतमे उचित कारणसे और उचित स्थानपरही कही गई है - वह प्रक्षिप्त नहीं है। महाभारतके समानही रामा- यणभी सर्वमान्य और उत्कृष्ट आर्ष महाकाव्य है; और उसमेंभी कथा-प्रसंगानुसार सत्य, पुत्रधर्म, मातृधर्म, रणधर्म, आदिका मार्मिक विवेचन है। परंतु यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि वाल्मीकि ऋषिका मूल हेतु अपने काव्यको महाभारतके समान "अनेकसमयान्वित, सूक्ष्म धर्म-अधर्मके न्यायोंसे ओतप्रोत, और सब लोगोंको शील तथा सच्चरितकी शिक्षा देनेमें सब प्रकारसे समर्थ" बनानेका नहीं था, इसलिये धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य या नीतिकी दृष्टिसे महाभारतकी योग्यता रामायणसे कहीं बढ़कर है। महाभारत केवल आर्ष काव्यका केवल इतिहास नहीं है; किंतु वह एक संहिताही है, जिसमें धर्म-अधर्मके सूक्ष्म प्रसंगोंका निरूपण किया गया है; और

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२५ यदि इस धर्म-संहितामें कर्मयोगका शास्त्रीय तथा तात्त्विक विवेचन न किया जाय, तो फिर वह कहाँ किया जा सकता है ? केवल वेदान्त-ग्रंथोंमें यह विवेचन नही किया जा सकता । उसके लिये योग्य स्थान धर्मसंहिताही है, और यदि महाभारत- कारने यह विवेचन न किया होता, तो यह धर्म-अधर्मका वृहत् संग्रह अथवा पाँचवाँ वेद उतनाही अपूर्ण रह जाता । इस अपूर्णताकी पूर्ति करनेके लियेही भगवद्गीता महाभारतमें रखी गई है । सचमुच यह बड़ा भाग्य है, कि इस कर्मयोगशास्त्रका मंडन महाभारतका जैसे उत्तम ज्ञानी सत्पुरुषनेही किया है, जो वेदान्तशास्त्रके समानही व्यवहारमें भी अत्यंत निपुण । इस प्रकार सिद्ध हो चुका, कि वर्तमान भगवद्गीता प्रचलित महाभारतहीका एक भाग है; तथापि अब उसके अर्थका कुछ अधिक स्पष्टीकरण करना चाहिये । भारत और महाभारत इन दो शब्दोंको हम लोग आजकल समानार्थक समझते हैं; परंतु वस्तुतः वे दो भिन्न भिन्न शब्द हैं । व्याकरणकी दृष्टिसे देखा जाय, तो 'भारत' नाम उस ग्रंथको प्राप्त हो सकता है, जिसमें भरतवंशी राजाओंके परा- क्रमका वर्णन हो । रामायण, भागवत आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति ऐसीही है; और, इस रीतिसे भारतीय युद्धका; जिस ग्रंथमें वर्णन है, उसे केवल 'भारत' कहना यथेष्ट हो सकता है; फिर वह ग्रंथ चाहे जितना विस्तृत हो । रामायण ग्रंथभी कुछ छोटा नही है; परंतु उसे कोई महारामायण नहीं कहता । फिर भारतहीको 'महाभारत' क्यो कहते हैं ? महाभारतके अंतमें यह बतलाया है, कि महत्त्व और भारतत्व इन दो गुणोंके कारण इस ग्रंथको महाभारत नाम दिया गया है ( स्वर्गा. ५. ४४ ) । परंतु 'महाभारत'का सरल शब्दार्थ 'बड़ा भारत' होता है; और ऐसा अर्थ करनेसे यह प्रश्न उठता है, कि 'बड़े' भारतके पहले क्या कोई 'छोटा' भारतभी था ? और, उसमें गीता थी या नहीं ? वर्तमान महाभारतके आदिपर्वमें लिखा है, कि उपाख्यानोंके अतिरिक्त महाभारतके श्लोकोंकी संख्या चौबीस हजार है ( महा. आ. १. १०१ ) ; और आगे चलकर यहभी लिखा है, कि पहले इसीका नाम 'जय' था ( आ. ६२. २० )। 'जय' शब्दसे भारतीय युद्धमें पांडवोंकी जयका बोध होता है; और ऐसा अर्थ करनेसे यही प्रतीत होता है, कि भारतीय युद्धका वर्णन 'जय' नामक ग्रंथमें पहले किया गया था; आगे चलकर उसी ऐतिहासिक ग्रंथमें अनेक उपाख्यान जोड़ दिये गये; और इस प्रकार महाभारत एक बड़ा ग्रंथ हो गया, जिसमें इतिहास और धर्म-अधर्म विवेचनकाभी निरूपण किया गया है । आश्वलायन गृह्यसूत्रोंके ऋषितर्पणमें “ सुमंतु-जैमिनी-वैशंपायन-पैल-सूत्र-भाष्यभारत-महाभारत धर्माचार्याः ” ( आ. गृ. ३. ४. ४ ) इस प्रकार भारत और महाभारत इन दो भिन्न भिन्न ग्रंथोंका स्पष्ट उल्लेख किया गया है; उनमेंभी उक्त अनुमानही दृढ़ हो जाता है । इस प्रकार छोटे भारतका बड़े भारतमें समावेश हो जानेमे कुछ कालके बाद, छोटा 'भारत' नामक स्वतंत्र ग्रंथ शेष नहीं रहा; और स्वभावतः लोगोंमें

५२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

यह समझ हो गई, केवल 'महाभारत' ही एक भारत ग्रंथ है ; वर्तमान महाभारतकी पोथीमेंभी यह वर्णन मिलता है, कि व्यासजीने पहले अपने पुत्र - शुक - को और अनंतर अपने अन्य शिष्योंको भारत पढ़ाया था ( आ. १. १०३ ); और आगे यहभी कहा, कि सुमंतु, जैमिनि, पैल, शुक और वैशंपायन इन पाँच शिष्योंने पाँच भिन्न भिन्न भारतसंहिताओंकी अथवा महाभारतोंकी रचना की ( आ. ६३. ९० ) । इस विषयमें यह कथा पाई जाती है, कि इन पाँच महाभारतोंमेंसे वैशंपायनके महाभारतको और जैमिनीके महाभारतसे केवल अश्वमेधपर्वहीको व्यासजीने रख लिया । इससे अब यहभी मालूम हो जाता है, कि ऋषितर्पणमें 'भारत-महाभारत' शब्दोंके पहले सुमंतु आदि नाम क्यों रखे गये हैं। परंतु यहाँ इस विषयके इतने गहरे विचारका कोई प्रयोजन नहीं । रा. ब. चिंतामणराव वैद्यने महाभारतके अपने टीका- ग्रंथमें इस विषयका विचार करके जो सिद्धान्त स्थापित किया है, वही हमें संयु- क्तिक मालूम होता है । अतएव यहाँ परइतना कह देनाही यथेष्ट होगा, कि वर्तमान समयमें जो महाभारत उपलब्ध है, वह मूलमें वैसाही न था; भारत या महा- भारतके अनेक रूपांतर हो गये हैं; और उस ग्रंथको जो अंतिम स्वरूप प्राप्त हुआ, वह हमारा वर्तमान महाभारत है। यह नहीं कहा जा सकता, कि मूल भारतमेंभी गीता न रही होगी । हाँ, यह प्रकट है कि सनत्सुजातीय, विदुरनीति, शुकानुप्रश्न, याज्ञवल्क्य-जनक-संवाद, विष्णुसहस्रनाम, अनुगीता, नारायणीय धर्म आदि प्रकरणोंके समानही वर्तमान गीताकोभी महाभारतकारने पहले ग्रंथोंके आधारपरही लिखा है – नई रचना नहीं की है । तथापि, यहभी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, कि मूल गीतामें महाभारतकारने कुछभी हेरफेर न किया होगा । उपर्युक्त विवेचनसे यह बात सहजही समझमें आ सकती है, कि वर्तमान सात सौ श्लोकोंकी गीता वर्तमान महाभारतहीका एक भाग है; दोनोंकी रचनाभी एकनेही की है; और वर्तमान महा- भारतमें वर्तमान गीताको किसीने बादमें मिला नहीं दिया है । आगे यहभी बतलाया जायगा, कि वर्तमान महाभारतका समय कौन-सा है, और मूल गीताके विषयमें हमारा मत क्या है ।

भाग २ - गीता और उपनिषद्

अब देखना चाहिये, कि गीता और भिन्न भिन्न उपनिषदोंका परस्पर संबंध क्या है । वर्तमान महाभारतहीमें स्थान-स्थानपर सामान्य रीतिसे उपनिषदोंका उल्लेख किया गया है; और बृहदारण्यक ( बृ. १. ३ ) तथा छांदोग्य ( छां. १. २ ) में वर्णित प्राणेंद्रियोंके युद्धका हालभी अनुगीता ( अश्व. २३ ) मेंभी है; तथा “ न मे स्तेनो जनपदे ” आदि कैकेय-अश्वपति राजाके मुखसे निकले हुए शब्दभी ( छां. ५. ११. ५ ) शांतिपर्वमें उक्त राजाकी कथाका वर्णन करते समय ज्यों-के- त्यों पाये जाते हैं ( शा. ७७. ८ ) । इसी प्रकार शांतिपर्वके जनक-पंचशिख-संवादमें

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५२७ बृहदारण्यक (बृ. ४. ५. १३) का यह विषय मिलता है, कि 'न प्रेत्य संज्ञास्ति' - मरनेपर ज्ञातको कोई संज्ञा नहीं रहती, क्योंकि वह ब्रह्ममें मिल जाता है; और वहीं अंतमें प्रश्न (प्रश्न. ६. ५) तथा मुंडक (मुं. ३. २. ८) उपनिषदोंमें वर्णित नदी और समुद्रका दृष्टान्त नाम-रूपसे विमुक्त पुरुषके विषयमें दिया गया है। इंद्रियोंको घोड़े कह कर ब्राह्मण-व्याध-संवाद (वन. २१०) में और अनुगीतामें बुद्धिको सारथीकी जो उपमा दी गई है, वहीभी कठोपनिषद्‌सेही ली गई है (कठ. १. ३. ३) ; और कठोपनिषद्‌के ये दोनों श्लोक - "एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा" (कठ. ३. १२) और "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात्" (कठ २. १४) - भी शांतिपर्वमें दो स्थानोंपर (शां. १८७. २९; ३३१. ४४) कुछ फेरफारके साथ पाये जाते हैं। श्वेताश्वतरका 'सर्वतः पाणिपादम्' श्लोकभी, जैसा कि पहले कह चुके हैं, महाभारतमें अनेक स्थानोंपर और गीतामेंभी मिलता है। परंतु केवल इतनेहीमें यह सादृश्य पूरा नहीं हो जाता, इनके सिवा उपनिषदोंके औरभी बहुत-से वाक्य महाभारतमें कई स्थानोंपर मिलते हैं। यहीं क्यों; यहभी कहा जा सकता है, कि महाभारतका अध्यात्मज्ञान प्रायः उपनिषदोंसेही लिया गया है। गीतारहस्यके नवें और तेरहवें प्रकरणोंमें हमने विस्तारपूर्वक दिखला दिया है, कि महाभारतके समानही भगवद्गीताका अध्यात्मज्ञानभी उपनिषदोंके आधार- पर स्थापित है; और गीतामें भक्ति-मार्गका जो वर्णन है, वहभी इस ज्ञानमे अलग नहीं है। अतएव यहाँ उसको दुबारा न लिखकर संक्षेपमें सिर्फ़ यही बतलाते हैं, कि गीताके द्वितीय अध्यायमें वर्णित आत्माका अशोच्यत्व, आठवें अध्यायका अक्षर- ब्रह्मस्वरूप और तेरहवें अध्यायका क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार तथा विशेष करके 'ज्ञेय' पर- ब्रह्मका स्वरूप - इन सब विषयोंका वर्णन गीतामें अक्षरशः उपनिषदोंके आधारपरही किया गया है। कुछ उपनिषद् गद्यमें हैं और कुछ पद्यमें हैं। उनमेंसे गद्यात्मक उप- निषदोंके वाक्योंको पद्यमय गीतामें ज्यों-का-त्यों उद्धृत करना संभव नहीं; तथापि जिन्होंने छांदोग्योपनिषद् आदिको पढ़ा है, उनके ध्यानमें यह बात सहजही आ जायगी, कि "जो है सो है; और जो नहीं, हो नहीं" (गीता २. १६) तथा "यं यं वापि स्मरन् भावम् ०" (गीता ८. ६) इत्यादि विचार छांदोग्योपनिषद्‌से लिये गये हैं; और "क्षीणे पुण्ये" (गीता ९. २१), "ज्योतिषां ज्योतिः" (गीता १३.१७) तथा "मात्रास्पर्शाः" (गीता २. १४) इत्यादि विचार और वाक्य बृहदारण्यक उपनिषदसे लिये गये हैं। परंतु गद्यात्मक उपनिषदोंको छोड़ जब पद्या- त्मक उपनिषदोंपर विचार करते हैं, तो यह समता इससेभी अधिक स्पष्ट हो जाती है। क्योंकि इन पद्यात्मक उपनिषदोंके कुछ श्लोक ज्यों-के त्यों भगवद्गीतामें उद्धृत किये गये हैं। उदाहरणार्थ, कठोपनिषदके छः-सात श्लोक अक्षरशः अथवा कुछ शब्दभेदसे गीतामें लिये गये हैं। गीताके द्वितीय अध्यायका "आश्चर्यवत्पश्यति ०" (गीता. २. २९) श्लोक, कठोपनिषद्‌की द्वितीय वल्लीके "आश्चर्यो वक्ता ०"

५२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (कठ. २. ७) श्लोकके समान है; और “न जायते म्रियते वा कदाचित्०” (गीता २. २०) श्लोक तथा “यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरंति०” (गीता ८. ११) श्लोकार्ध, गीता और कठोपनिषद्‌में अक्षरशः एकही हैं (कठ. २. १९; २. १५)। यह पहलेही बतला दिया गया है, कि गीताका “इंद्रियाणि पराण्याहु०” (गीता ३. ४२) श्लोक कठोपनिषदसे (कठ. ३. १०) लिया गया है। इसी प्रकार गीताके पंद्रहवें अध्यायमें वर्णित अश्वत्थ वृक्षका रूपक कठोपनिषदसे और “न तद्भासयते सूर्यो०” (गीता १५. ६) श्लोक कठ तथा श्वेताश्वतर उपनिषदोंसे शब्दोंमें कुछ फेरफार करके लिया गया है।” श्वेताश्वतर उपनिषदकी अन्य बहुतेरी कल्पनाएँ तथा श्लोकभी गीतामें पाये जाते हैं। नवें प्रकरणमें कह चुके हैं, कि माया शब्दका प्रयोग पहले पहल श्वेताश्वेतरोपनिषदमें हुआ है; और वहीसे वह गीता तथा महा- भारतमें लिया गया होगा। शब्द-सादृश्यसे यहभी प्रकट होता है, कि गीताके छठे अध्यायमें योगाभ्यासके लिये योग्य स्थलका जो यह वर्णन किया गया है – “शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य०” (गीता ६. ११) – वह श्वेताश्वतरोपनिपदके “समे शुचौ” आदि (श्वे. २. १०) मंत्रसे लिया गया है, और “समं कायशिरोग्रीवं” (गीता ६. १३) ये शब्दभी श्वेताश्वतरोपनिपदके “त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम्” (श्वे. २. ८) मंत्रसे लिये हैं। इसी प्रकार “सर्वतः पाणिपादं” श्लोक तथा उसके आगेका श्लोकार्धभी गीता (गीता १३. १३) और श्वेताश्वतरोपनिपदमें शब्दशः मिलते हैं (श्वे. ३. १६); और “अणोरणीयांसं” तथा “आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” पदभी गीतामें (८. ९) और श्वेताश्वतरोपनिषद् (श्वे. ३ ९. २०) में एकहीसे हैं। इनके अतिरिक्त गीता और उपनिषदोंका शब्द-सादृश्य यह है, कि “सर्वभूतस्थमात्मानम्” (गीता ६. २९) और “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो” (गीता १५. १५) ये दोनों श्लोकार्ध कैवल्योपनिपदमें (कैं. १. १०; २. ३) ज्यों-के-त्यो मिलते हैं। परंतु इस शब्द-सादृश्यके विषयपर अधिक विचार करनेकी कोई आवश्यकता नही। क्योकि इस बातका किसीकोभी संदेह नही है, कि गीताका वेदान्त-विषय उपनिषदोंके आधारपर प्रतिपादित किया गया है। हमें विशेष कर यही देखना है, कि उपनिषदोंके विवेचनमें और गीताके विवेचनमें कुछ अंतर है या नहीं; और यदि है, तो किस वातमें; अतएव अब उसीपर दृष्टि डालनी चाहिये। उपनिषदोंकी संख्या बहुत है। उनमेंसे कुछ उपनिषदोंकी भाषा तो इतनी अर्वाचीन है, कि उनका और पुराने उपनिषदोंका असमकालीन होना सहजही मालूम पड़ जाता है। अतएव गीता और उपनिषदोंमें प्रतिपादित विषयोंके सादृश्य का विचार करते समय, इस प्रकरणमें हमने प्रधानतासे उन्हीं उपनिषदोंको तुलनाके लिये लिया है, जिनका उल्लेख ब्रह्मसूत्रोंमें है। इन उपनिषदोंके अर्थको और गीताके अध्यात्मको जब हम मिलाकर देखते हैं, तब प्रथम यही बोध होता है, कि यद्यपि दोनोंमें निर्गुण परब्रह्मका स्वरूप एक-सा है, तथापि निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्तिका

वर्णन करते समय, 'अविद्या' शब्दके बदले 'माया' या 'अज्ञान' शब्दहीका उपयोग गीतामें किया गया है। नवें प्रकरणमें इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया गया है, कि 'माया' शब्द श्वेताश्वतरोपनिषदमें आ चुका है; नामरूपात्मक अविद्याके लियेही यह दूसरा पर्याय शब्द है; तथा यहभी ऊपर बतला दिया गया है, कि श्वेताश्वत- रोपनिषद्के कुछ श्लोक गीतामें अक्षरशः पाये जाते हैं। इससे पहला अनुमान यह किया जाता है, कि - "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छां. ३. १४. १) या "सर्वमात्मानं पश्यति" (बृ. ४. ४. २३) अथवा "सर्वभूतेषु चात्मानम्" (ईश. ६) इस सिद्धान्तका अथवा उपनिषदोंके सारे अध्यात्मज्ञानका यद्यपि गीतामें संग्रह किया गया है, तथापि गीता-ग्रंथ तब बना होगा, जब कि नामरूपात्मक अविद्याको उपनिषदोंमेंही 'माया' नाम प्राप्त हो गया होगा। अब यदि इस बातका विचार करें, कि उपनिषदोंके और गीताके उपपादनमें क्या भेद है, तो दीख पड़ेगा, कि गीतामें कापिल-सांख्यशास्त्रको विशेष महत्त्व दिया गया है। बृहदारण्यक या छांदोग्य, दोनों उपनिषद् ज्ञान-प्रधान हैं; परंतु उनमें तो सांख्य-प्रक्रियाका नामभी दीख नहीं पड़ता; और कठ आदि उपनिषदोंमें यद्यपि अव्यक्त, महान् इत्यादि सांख्योंके शब्द आये हैं, तथापि यह स्पष्ट है, कि उनका अर्थ सांख्य-प्रक्रियाके अनुसार न करके वेदान्त-पद्धतिके अनुसार करना चाहिये। मैत्र्युप- निषदके उपपादनकोभी यही न्याय उपयुक्त किया जा सकता है। इस प्रकार सांख्य- प्रक्रियाको बहिष्कृत करनेकी सीमा यहाँतक आ पहुँची है, कि वेदान्त-सूत्रोंमें पंची- करणके बदले छांदोग्य उपनिषदके आधारपर त्रिवृत्करणहीसे सृष्टिके नामरूपात्मक वैचित्र्यकी उत्पत्ति बतलाई गई है (वे. सू. २. ४. २०)। सांख्योंको एकदम अलग करके अध्यायके क्षर-अक्षरका विवेचन करनेकी यह पद्धति गीतामें स्वीकृत नहीं हुई है। तथापि स्मरण रहे, कि गीतामें सांख्योंके सिद्धान्त ज्यों-के-त्यों नहीं ले लिये गये हैं। त्रिगुणात्मक अव्यक्त प्रकृतिमे, गुणोत्कर्षके अनुसार, सारी व्यक्त-सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें सांख्योंके जो सिद्धान्त हैं, वे गीताको ग्राह्य हैं; और उनके इस मतसेभी गीता सहमत है, कि पुरुष निर्गुण हो कर द्रष्टा है। परंतु द्वैत-सांख्यज्ञानपर अद्वैत-वेदान्तका पहले इस प्रकार प्राबल्य स्थापित कर दिया है, कि प्रकृति और पुरुष स्वतंत्र नहीं हैं; वे दोनों उपनिषदमें वर्णित आत्मरूपी एकही परब्रह्मके रूप अर्थात् विभू- तियाँ हैं, और फिर सांख्योंके क्षर-अक्षर-विचारका वर्णन गीतामें किया गया है। उप- निषदोंके ब्रह्मात्मैक्यरूप अद्वैत-मतके साथ स्थापित किया हुआ द्वैती सांख्योंके सृष्ट्यु- त्पत्तिचक्रका यह मेल गीताके समान महाभारतके अन्य स्थानोंमें किये हुए अध्यात्मविवे- चनमेंभी पाया जाता है; और ऊपर जो अनुमान किया गया है, कि गीता और महाभारत, ये दोनों ग्रंथ एकही व्यक्तिके द्वारा रच गये हैं, वह इस मेलसे औरभी दृढ़ हो जाता है। उपनिषदोंकी अपेक्षा गीताके उपपादनमें जो दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता है, वह व्यक्तोपासना अथवा भक्तिमार्ग है। भगवद्गीताके समानही उपनिषदोंमेंभी गी. र. ३४

केवल यज्ञयाग आदि कर्म ज्ञान-दृष्टिसे गौण माने गये हैं ; परंतु व्यक्त मानव-देहधारी ईश्वरकी उपासना प्राचीन उपनिषदोंमें नहीं दीख पड़ती । उपनिषत्कार इस तत्त्वसे सहमत हैं, कि अव्यक्त और निर्गुण परब्रह्मका आकलन होना कठिन है, इसलिये मन, आकाश, सूर्य, अग्नि, यज्ञ आदि सगुण प्रतीकोंकी उपासना करनी चाहिये । परंतु उपासनाके लिये प्राचीन उपनिषदोंमें जिन प्रतीकोंका वर्णन किया गया है, उनमें मनुष्यदेहधारी परमेश्वरके स्वरूपका प्रतीक नहीं बतलाया गया है । मैत्र्युपनिषद् (मै. ३. ७) में कहा है, कि रुद्र, शिव, विष्णु, अच्युत, नारायण, – ये सब परमात्मा- हीके रूप हैं । श्वेताश्वतरोपनिषदमें 'महेश्वर' आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं; और “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः” (श्वे. ५. १३) अथवा “यस्य देवे परा भक्तिः” (श्वे. ६. २३) आदि वचनभी श्वेताश्वतरमें पाये जाते हैं । परंतु यह निश्चय- पूर्वक नहीं कहा जा सकता, कि इन वचनोंके नारायण, विष्णु आदि शब्दोंसे विष्णुके मानव-देहधारी अवतारही विवक्षित हैं । कारण यह है, कि रुद्र और विष्णु ये दोनों देवता, वैदिक अर्थात् प्राचीन हैं ; तब यह कैसे मान लिया जाय, कि “यज्ञो वै विष्णुः” (तैं. सं. १. ७. ८) इत्यादि प्रकारसे प्राचीन यज्ञयागहीको विष्णुकी उपासनाका जो स्वरूप आगे दिया गया है, वही उपर्युक्त उपनिषदोंका अभिप्राय नहीं होगा ? तथापि यदि कोई कहे, कि मानव-देहधारी अवतारोंकी कल्पना उस समयभी होगी, तो वहभी बिलकुलही असंभव नहीं है । क्योंकि, श्वेताश्वतरोपनिषदमें जो 'भक्ति' शब्द है, उसे यज्ञरूपी उपासनाके विषयमें प्रयुक्त करना ठीक नहीं जँचता । यह बात सच है, कि महानारायण, नृसिंहतापनी, रामतापनी, तथा गोपालतापनी आदि उप- निषदोंके वचन श्वेताश्वतरोपनिषदके वचनोंकी अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट हैं, इस- लिये उनके विषयमें उक्त प्रकारकी शंका करनेके लिये कोई स्थानही नहीं रह जाता । परंतु इन उपनिषदोंका काल निश्चित करनेके लिये ठीक ठीक साधन नहीं है, इसलिये इन उपनिषदोंके आधारपर यह प्रश्न ठीक तौरसे हल नहीं किया जा सकता, कि वैदिक धर्ममें मानवदेहधारी विष्णुकी भक्तिका उदय कब हुआ ? तथापि अन्य रीतिसे वैदिक भक्ति-मार्गकी प्राचीनता अच्छी तरह सिद्ध की जा सकती है । पाणिनीका एक सूत्र है 'भक्तिः' – अर्थात् जिसमें भक्ति हो (पा. ४. ३. ९५); इसके आगे “वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्” (पा. ४. ३. ९८) सूत्रमें कहा गया है, कि जिसकी वासुदेवमें भक्ति हो, उसे 'वासुदेवक' और जिसकी अर्जुनमें भक्ति हो, उसे 'अर्जुनक' कहना चाहिये; और पतंजलिके महाभाष्यमें इसपर टीका करते समय कहा गया है, कि इस सूत्रमें 'वासुदेव' क्षत्रियका या भगवान्‌का नाम है । इन ग्रंथोंमेंसे पातंजलभाष्यके विषयमें डॉक्टर भांडारकरने यह सिद्ध किया है, कि वह ईसाई सनके लगभग ढाई सौ वर्ष पहले बना है; और इसमें तो संदेह नहीं, कि पाणिनीका काल इससेभी अधिक प्राचीन है । इसके सिवा भक्तिका उल्लेख बौद्ध धर्म-ग्रंथोंमेंभी किया गया है, और हमने आगे चलकर विस्तारपूर्वक बतलाया है, कि बौद्ध धर्मके महायान पंथमें भक्तिके

तत्त्वोंका प्रवेश होनेके लिये श्रीकृष्णका 'भागवत-धर्म' ही कारण हुआ होगा। अतएव यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि कम-से-कम बुद्धके पहले - अर्थात् ईसाई सनके पहले लगभग छः सौसे अधिक वर्ष - हमारे यहाँका 'भक्ति-मार्ग' पूरी तरह स्थापित हो गया था। नारद-पञ्चरात्र या शाण्डिल्य अथवा नारदके भक्ति-सूत्र उसके बादके हैं। परंतु उससे भक्ति-मार्ग अथवा भागवत धर्मकी प्राचीनतामे कुछभी बाधा हो नहीं सकती। गीतारहस्यमें किये गये विवेचनसे ये बातें स्पष्ट विदित हो जाती हैं, कि प्राचीन उपनिषदोंमें जिन सगुणोपासनाओंका वर्णन है, उसीसे क्रमशः हमारा भक्ति-मार्ग निकला है; पातजलयोगमें चित्तको स्थिर करनेके लिये किसी-न-किसी व्यक्त और प्रत्यक्ष वस्तुको दृष्टिके सामने रखना पड़ता है, इसलिये उससे भक्ति-मार्गकी ओरभी पुष्टि हो गई है; भक्ति-मार्ग किसी अन्य स्थानसे हिंदुस्थानमें नहीं लाया गया है और न उसे कहींसे लानेकी आवश्यकताभी थी। हिंदुस्थानहीमे इस प्रकारसे प्रादुर्भूत भक्ति-मार्गका और विशेषतः वासुदेव-भक्तिका उपनिषदोंमें वर्णित वेदान्तकी दृष्टिसे मंडन करनाही गीताके प्रतिपादनका एक विशेष भाग है। परंतु गीताका इससेभी अधिक महत्त्वपूर्ण भाग, कर्मयोगके साथ भक्ति और ब्रह्मज्ञानका मेल कर देनाही है। चातुर्वर्ण्यके अथवा श्रौतयज्ञयाग आदि कर्मोंको यद्यपि उपनिषदोंने गौण माना है, तथापि कुछ उपनिषत्कारोंका कथन है, कि उन्हें चित्त-शुद्धिके लिये तो करनाही चाहिये, और चित्त-शुद्धि होनेपरभी उन्हें छोड़ देना उचित नहीं। इतना होनेपरभी कहना चाहिये कि अधिकांश उपनिषदोंका झुकाव सामान्यतः कर्मसंन्यासकी ओरही है। ईशावास्योपनिषदके समान कुछ अन्य उपनिषदोंमेंभी "कुर्वन्नेवेह कर्माणि" जैसे आमरण कर्म करते रहनेके विषयमें वचन पाये जाते हैं; परंतु अध्यात्मज्ञान और सांसारिक कर्मोंके बीचका विरोध मिटाकर प्राचीन कालसे प्रचलित उस कर्मयोगका समर्थन जैसा गीतामें किया गया है, वैसा किसीभी अन्य उपनिषदमें नहीं पाया जाता। अथवा यहभी कहा जा सकता है, कि इसी विषयमें गीताका सिद्धान्त अधिकांश उपनिषत्कारोंके सिद्धान्तोंसे भिन्न है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें इस विषयका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है, इसलिये उसके बारेमें यहाँ अधिक लिखनेकी आवश्यकता नहीं। गीताके छठ्ठे अध्यायमें जिस योग-साधनका निर्देश किया गया है, उसका विस्तृत और ठीक ठीक विवेचन पातञ्जल-योग-सूत्रोंमें पाया जाता है, और इस समय ये सूत्रही इस विषयके प्रमाणभूत ग्रंथ समझे जाते हैं। इन सूत्रोंके चार अध्याय हैं। पहले अध्यायके आरंभमें ही योगकी व्याख्या इस प्रकार की गई है, कि "योगश्चित्त- वृत्तिनिरोधः"; और यह बतलाया गया है, कि "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः"- यह निरोध अभ्यास तथा वैराग्यसे किया जा सकता है। आगे चलकर यमनियम- आसन-प्राणायाम आदि योगसाधनोंका वर्णन करके तीसरे और चौथे अध्यायोंमें इस बातका निरूपण किया है, कि संप्रज्ञात अर्थात् निर्विकल्प समाधिसे अणिमा-

५३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लघिमा आदि अलौकिक सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त होती हैं, तथा इसी समाधीमें अन्तमें ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष मिल जाता है। भगवद्गीतामेंभी पहले चित्तनिरोध करनेकी आवश्यकता (गीता ६. २०) बतलाई गई है। फिर कहा है, कि अभ्यास तथा वैराग्य इन दोनों साधनोंसे चित्तका निरोध करना चाहिये (गीता ६. ३५); और अन्तमें निर्विकल्प समाधि लगानेकी रीतिकी वर्णन करके, यह दिखलाया है, कि उसमें क्या सुख है। परन्तु केवल इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकेगा कि पातंजलयोग-मार्गसे भगवद्गीता सहमत है; अथवा पातंजल-सूत्र भगवद्गीतासे प्राचीन हैं। पातंजल- सूत्रोंकी नाईं भगवान्ने यह नहीं कहा है कि समाधि सिद्ध होनेके लिये नाक पकड़े पकड़े सारी आयु व्यतीत कर देनी चाहिये। कर्मयोगकी सिद्धिके लिये बुद्धिकी समता होनी चाहिये; और उस समताकी प्राप्तिके लिये केवल साधनरूपमें चित्तनिरोध तथा समाधिका वर्णन गीतामें किया गया है। ऐसी अवस्थामे यही कहना चाहिये, कि इस विषयमें पातंजल-सूत्रोंकी अपेक्षा श्वेताश्वतरोपनिषद् या कठोपनिषद्के साथ गीता अधिक मिलती-जुलती है। ध्यान-बिंदु, क्षुरिका और योगतत्त्व उपनिषदभी योगविषयकही हैं। परन्तु उनका मुख्य प्रतिपाद्य विषय केवल योग है, और उनमें सिर्फ योगहीकी महत्ताका वर्णन किया गया है, इसलिये केवल कर्मयोगको श्रेष्ठ माननेवाली गीतासे इन एकपक्षीय उपनिषदोंका मेल करना उचित नहीं, और न वह होही सकता है। थामसन साहेबने गीताका अंग्रेजीमें जो अनुवाद किया है, उसके उपोद्घातमें आप कहते हैं, कि गीताका कर्मयोग पातंजलयोगहीका एक रूपांतर है परन्तु यह बात असंभव है। इस विषयपर हमारा यही कथन है, कि गीताके 'योग' शब्दका ठीक ठीक अर्थ समझमें न आनेके कारण यह भ्रम उत्पन्न हुआ है। क्योंकि इधर गीताका कर्मयोग प्रवृत्ति-प्रधान है, तो उधर पातंजल-योग बिल्कुल उसके विरुद्ध अर्थात् निवृत्ति-प्रधान है। अतएव उनमेंसे एकका दूसरेसे प्रादुर्भूत होना कभी संभव नहीं; औरभी यह बात गीतामें कहीं नहीं गई है। इतनाही नहीं; यहभी कहा जा सकता है, कि योग शब्दका प्राचीन अर्थ 'कर्मयोग' था और संभव है, कि वही शब्द पातंजल-सूत्रोंके अनंतर केवल 'चित्तनिरोधरूपी योग' के अर्थमें प्रचलित हो गया हो। चाहे जो हो, यह निर्विवाद सिद्ध है कि प्राचीन समयमें जनक आदिने जिस निष्काम कर्माचरणके मार्गका अवलंबन किया था, उसीके सदृश गीताका योग अर्थात् कर्मयोगभी है; और वह मनु-इक्ष्वाकु आदि महानुभावोंकी परंपरासे चले हुए भागवत धर्ममें लिया गया है - वह कुछ पातंजलयोगसे उत्पन्न नहीं हुआ है। अबतक किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि गीता-धर्म और उपनिषदोंमें किन किन बातोंकी विषमता और समानता है। इनमेंसे अधिकांश बातोंका विवेचन गीतारहस्यमें स्थान-स्थानपर किया जा चुका है। अतएव यहाँ संक्षेपमें यह बतलाया जाता है, कि यद्यपि गीतामें प्रतिपादित ब्रह्मज्ञान उपनिषदोंके आधारपरही बतलाया गया है, तथापि उपनिषदोंके अध्यात्मज्ञानकाही निरा अनुवाद

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५३३ न कर, उसमें वासुदेव-भक्तिका और मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः-क्रमका अर्थात् अक्षर-ज्ञानकाभी समावेश किया गया है, और उस वैदिक कर्मयोग-धर्महीका प्रधानतासे प्रतिपादन किया गया है, जो सामान्य लोगोंके लिये आचरण करनेमें सुगम हो; एवं इस लोक साथ परलोकमें श्रेयस्कर हो। उपनिषदोंकी अपेक्षा गीतामें जो कुछ विशेषता है, वह यही है। अतएव ब्रह्मज्ञानके अतिरिक्त अन्य बातोंमेंभी संन्यास-प्रधान उपनिषदोंके तथा गीताका मेल करनेके लिये सांप्रदायिक दृष्टिसे गीताके अर्थकी खींचातानी करना उचित नहीं है। यह सच है, कि दोनोंमें अध्यात्म- ज्ञान एकही-सा है; परंतु – जैसा कि हमने गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें स्पष्ट दिखला दिया है – अध्यात्मज्ञानरूपी मस्तक एव भलेही हो, तोभी सांख्य तथा कर्मयोग वैदिक धर्म-पुरुषके दो समान बलवाले हाथ हैं; और इनमेंसे ईशावास्योप- निषद्के अनुसार, ज्ञानयुक्त कर्महीका प्रतिपादन मुक्त-कंठसे गीतामें किया गया है। भाग – ३ गीता और ब्रह्मसूत्र ज्ञान-प्रधान, भक्ति-प्रधान और योग-प्रधान उपनिषदोंके साथ भगवद्गीतामें जो सादृश्य और भेद हैं, उनका इस प्रकार विवेचन कर चुकनेपर यथार्थमें ब्रह्म-सूत्रों और गीताकी तुलना करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें भिन्न भिन्न ऋषियोंके बतलाये हुए अध्यात्म-सिद्धान्तोंका नियमबद्ध विचार करनेके लियेही बादरायणाचार्यके ब्रह्मसूत्रोंकी रचना हुई है, इसलिये उनमें उपनिषदोंसे भिन्न भिन्न विचारोंका होना संभव नहीं। परंतु भगवद्गीताके तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका विचार करते समय आरम्भमेंही ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है :- ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका "अनेक प्रकारसे विविध छंदोंके द्वारा (अनेक) ऋषियोंने पृथक् पृथक् और हेतुयुक्त तथा पूर्ण निश्चयकारक ब्रह्मसूत्रपदोंमेंभी विवेचन किया है" (गीता १३. ४)। और यदि इन ब्रह्मसूत्रोंका तथा वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंको एकही मान लें, तो कहना पड़ता है कि वर्तमान गीता वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंके बाद बनी होगी। अतएव गीताका काल-निर्णय करनेकी दृष्टिसे इस बातका अवश्य विचार करना पड़ता है, कि ये ब्रह्मसूत्र कौनसे हैं। क्योंकि वर्तमान वेदान्त-सूत्रोंके अतिरिक्त ब्रह्मसूत्र नामक कोई दूसरा ग्रंथ नहीं पाया जाता, और न उसके विषयमें कहीं वर्णनही है।*

  • इस विषयका विचार स्वर्लोकवासी तेलंगने किया है। इसके सिवा सन् १८९५में इसी विषयपर प्रो. तुकाराम रामचन्द्र अमलनेरकर, बी. ए नेभी एक निबंध प्रकाशित किया है।

और, यह कहना तो किसी प्रकार उचित नहीं जंचता, कि वर्तमान ब्रह्मसूत्रोंके बाद गीता बनी होगी। क्योंकि, गीताकी प्राचीनताके विषयमें परंपरागत समझ चली आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है, कि प्रायः इसी कठिनाईको ध्यानमें लाकर शांकरभाष्यमें 'ब्रह्मसूत्रपदैः'का अर्थ "श्रुतियोंके अथवा उपनिषदोंके ब्रह्मप्रतिपादक वाक्य" किया गया है। परंतु, इसके विपरीत शांकरभाष्यके टीकाकार आनंदगिरि और रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य प्रभृति गीताके अन्यान्य भाष्यकार यह कहते हैं, कि यहाँ पर 'ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव' शब्दोंसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इन बादरायणाचार्यके ब्रह्मसूत्रोंकाही निर्देश किया गया है, और श्रीधरस्वामीको दोनों अर्थ अभिप्रेत हैं। अतएव इस श्लोकका मन्यार्थ हमें स्वतंत्र रीतिसेही निश्चित करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ विचार "ऋषियोंने अनेक प्रकारसे पृथक्" कहा है; और इसके सिवा (चैव) "हेतुयुक्त और विनिश्चयात्मक ब्रह्मसूत्रपदोंनेभी" वही अर्थ कहा है; इस प्रकार 'चैव' (औरभी) पदसे इस बातका स्पष्टीकरण हो जाता है, कि इस श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारके दो भिन्न भिन्न स्थानोंका उल्लेख किया गया है। ये दोनों स्थान केवल भिन्नही नहीं हैं, किंतु उनमेंसे पहला अर्थात् ऋषियोंका किया हुआ वर्णन "विविध छंदोंके द्वारा पृथक् पृथक् अर्थात् भिन्न भिन्न तथा अनेक प्रकारका" है; और उसका अनेक ऋषियों-द्वारा किया जाना 'ऋषिभि' से (इस बहुवचन तृतीयान्त पद) स्पष्ट हो जाता है; तथा ब्रह्मसूत्रपदोंका दूसरा "वर्णन हेतुयुक्त और निश्च- यात्मक" है, इस प्रकार इन दोनों वर्णनोंकी विशेष भिन्नताकाभी स्पष्टीकरण इसी श्लोकमें है। 'हेतुमत्' शब्द महाभारतमें कई स्थानोंपर पाया जाता है; और उसका अर्थ है- "नैयायिक पद्धतिसे कार्यकारणभाव बतलाकर किया हुआ प्रतिपादन"- उदाहरणार्थ, जनकके सन्मुख सुलभाका किया हुआ भाषण अथवा श्रीकृष्ण जब शिष्टाईके लिये कौरवोंकी सभामें गये, उस समय उनका किया हुआ भाषण लीजिये। महाभारतमेंही पहले भाषणको "हेतुमत् और अर्थवन्" (मभा. शां. ३२०. १९, १) और दूसरेको 'सहेतुक' (मभा उद्योग. १३१. २) कहा है। इससे प्रकट होता है, कि जिस प्रतिपादनमें साधक-बाधक प्रमाण बतलाकर अन्तमें कोईभी अनुमान निस्सन्देह सिद्ध किया जाता है, उसीको 'हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः' विशेषण लगाये जा सकते हैं. ये शब्द उपनिषदोंके ऐसे संकीर्ण प्रतिपादनको नहीं लगाये जा सकते, कि जो एक स्थानमें कुछ हो और दूसरे स्थानमें कुछ। अतएव "ऋषिभि बहुधा विविधैः पृथक्" और "हेतुमद्भिः विनिश्चितैः" पदोंके विशेषात्मक स्वारस्यको यदि स्थिर रखना हो, तो यही कहना पड़ेगा कि गीताके उक्त श्लोकमें "ऋषियों-द्वारा विविध छंदोंमें किये गये अनेक प्रकारके पृथक्" विवेचनोंसे भिन्न भिन्न उपनिषदोंके संकीर्ण और पृथक् वाक्यही अभिप्रेत हैं, तथा "हेतुयुक्त और विनिश्चयात्मक ब्रह्म- सूत्रपदों" से ब्रह्मसूत्र-ग्रंथका वह विवेचनही अभिप्रेत है, कि जिसमें साधक-बाधक प्रमाण दिखलाकर अंतिम सिद्धान्तोंका संदेहरहित निर्णय किया गया है। यहभी

गीता की बहिरंगपरीक्षा ५३५ स्मरण रहे, कि उपनिषदोंके सब विचार इधर उधर बिखरे हुए हैं, अर्थात् अनेक ऋषियोंको जैसे सूझते गये, वैसेही वे कहे गये हैं, उनमें कोई विशेष पद्धति या क्रम नहीं है; अतएव उनकी एकवाक्यता किये बिना उपनिषदोंका भावार्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता । यही कारण है, कि उपनिषदोंके साथही साथ उस ग्रंथका अर्थात् वेदान्त-सूत्र '(ब्रह्मसूत्र) काभी उल्लेख कर देना आवश्यक था, जिसमें कार्यकारण- हेतु दिखला कर उनकी (अर्थात् विचारोंकी) एकवाक्यता की गई है। गीताके श्लोकोंका उक्त अर्थ करनेसे यह प्रकट हो जाता है, कि उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र गीताके पहले बने हैं। उनमेंसे मुख्य मुख्य उपनिषदोंके विषयमें तो कुछभी मतभेद नहीं रह जाता; क्योंकि इन उपनिषदोंके श्लोकही गीतामें शब्दशः पाये जाते हैं। परंतु ब्रह्मसूत्रोंके विषयमें संदेह अवश्य किया जा सकता है, क्योंकि ब्रह्मसूत्रोंमें यद्यपि 'भगवद्गीता' शब्दका उल्लेख प्रत्यक्षमें नहीं किया गया है; तथापि भाष्यकार मानते हैं, कि कुछ सूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दोंसे भगवद्गीताहीका निर्देश किया गया है। जिन ब्रह्मसूत्रोंमें शांकरभाष्यके अनुसार 'स्मृति' शब्दसे गीताहीका उल्लेख किया गया है, उनमेंसे नीचे दिये हुए सूत्र मुख्य हैं:– ब्रह्मसूत्र – अध्याय, पाद और सूत्र गीता – अध्याय और श्लोक १.२.६ स्मृतेश्च । गीता १८.६१ "ईश्वरः सर्वभूतानां ०" आदि श्लोक । १.३.२३ अपि च स्मर्यते । गीता १५.६. "न तद्भासयते सूर्यः" आदि । २.१.३६ उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च गीता १५.३ "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते ०" आदि । २.३.४५ अपि च स्मर्यते । गीता १५.७. "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः ०" आदि । ३.२.१७ दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते । गीता १३.१२ "ज्ञेयं यत्तत् प्रवक्ष्यामि ०" आदि । ३.३.३१ अनियमः सर्वासामविरोधः गीता ८.३६ "शुक्लकृष्णे गती ह्येते ०" शब्दानुमानाभ्याम् आदि । ४.१.१० स्मरन्ति च । गीता ६.११ "शुचौ देशे ०" आदि । ४.२.२१ योगिनः प्रति च स्मर्यंते । गीता ८.२३ "यत्र काले त्वनावृत्तिमा- वृत्तिं चैव योगिनः ०" आदि । उपर्युक्त आठ स्थानोंमेंसे कुछ यदि संदिग्धभी माने जायें, तथापि, हमारे मतसे तो चौथे (ब्र. सू. २.३.४५) और आठवेंके (ब्र. सू. ४.२.२१) विषयमें कुछ संदेह नहीं है; और यह बातभी स्मरण रखने योग्य है, कि इस विषयमें, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य और वल्लभाचार्य, इन चारों भाष्यकारोंका

मन कभी-सा है। ब्रह्मसूत्रके उक्त दोनों स्थानोंके (ब्र. सू. २. ३. ४५; ४. २. २१) विषयमें इस प्रसंगपरभी अवश्य ध्यान देना चाहिये - जीवात्मा और परमात्माके परस्पर-संबंधका विचार करते समय, पहले "नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः" (ब्र. सू. २. ३. १७) इस सूत्रसे यह निर्णय किया है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंके समान जीवात्मा परमात्मासे उत्पन्न नहीं हुआ है; उसके बाद "अंशो नाना- व्यपदेशात्०" (ब्र. सू. २. ३. ४३) सूत्रमें यह बतलाया है, कि जीवात्मा पर- मात्माहीका 'अंश' है; और आगे 'मंत्रवर्णाच्च' (ब्र. सू. २. ३. ४४) इस प्रकार श्रुतिका प्रमाण देकर अंतमें "अपि च स्मर्यते" (ब्र. सू. २. ३. ४५) - "स्मृतिमेंही यही कहा है" - इस सूत्रका प्रयोग किया गया है। सब भाष्यकारोंका कथन है, कि यह स्मृतिही गीताका "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः" (गीता १५. ७) यह वचन है। परंतु इसकी अपेक्षा अंतिम स्थान (अर्थात् ब्रह्मसूत्र ४. २. २१) औरभी अधिक निस्संदेह है। यह पहलेही, दसवें प्रकरणमें, बतलाया जा चुका है, कि देवयान और पितृयाण गतियोंमें क्रमानुसार उत्तरायणके छः महीने और दक्षिणायनके छः महीने होते हैं; और उनका अर्थ काल-प्रधान न करके बाद- रायणाचार्य कहते हैं, कि इन शब्दोंसे तत्कालाभिमानी देवता अभिप्रेत हैं (वे. सू. ४. ३. ४)। अब यह प्रश्न हो सकता है, कि दक्षिणायन और उत्तरायण शब्दोंका काल-वाचक अर्थ क्या कभी लियाही न जावे ? इसलिये "योगिनः प्रति च स्मर्यते" (ब्र. सू. ४. २. २१) अर्थात् ये काल "स्मृतियोंमें योगियोंके लिये विहित माने गये हैं" इस सूत्रका प्रयोग किया गया है; और गीतामें (गीता ८. २३) यह बात साफ़ साफ़ कह दी गई है, कि "यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः" - ये काल योगियोंको विहित हैं। इससे भाष्यकारोंके मतानुसार यही कहना पड़ता है, कि उक्त दोनों स्थानोंपर ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे भगवद्गीताही विवक्षित है। परंतु जब यह मानते हैं, कि भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख है; और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे भगवद्गीताका निर्देश किया गया है; तो दोनोंमें काल-दृष्टिसे विरोध उत्पन्न हो जाता है। क्योंकि भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका साफ़ साफ़ उल्लेख है, इसलिये ब्रह्मसूत्रोंका गीताके पहले रचा जाना निश्चित होता है, और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका निर्देश माना जाय तो गीताका ब्रह्मसूत्रोंके पहले होना निश्चित हुआ जाता है। ब्रह्मसूत्रोंका एक बार गीता पहले रचा जाना और दूसरी बार उन्हीं सूत्रोंका गीताके बाद रचा जाना संभव नहीं। अच्छा, अब यदि इस झगड़ेसे बचनेके लिये गीताके 'ब्रह्मसूत्रपदैः' शब्दसे शांकरभाष्यमें दिये हुए अर्थको स्वीकार करते हैं, तो 'हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः' इत्यादि पदोंका स्वारस्यही नष्ट हो जाता है; और यदि यह मानें, कि ब्रह्मसूत्रोंके 'स्मृति' शब्दसे गीताके अतिरिक्त कोई दूसरा स्मृति-ग्रंथ विवक्षित होगा; तो यह कहना पड़ेगा, कि सभी भाष्यकारोंने भूल की है। अच्छा; यदि उनकी भूल कहें; तोभी यह बतलाया नहीं जा सकता, कि

'स्मृति' शब्दसे कौन-सा ग्रंथ विवक्षित है; तब इस अड़चनसे कैसे पार पावें ? हमारे मतानुसार इस अड़चनसे बचनेका केवल एकही मार्ग है। यदि यह मान लिया जाय कि जिसने ब्रह्मसूत्रोंकी रचना की है, उसीने मूल भारत तथा गीताको वर्तमान स्वरूप दिया है, तो कोई अड़चन या विरोध नहीं रह जाता। ब्रह्मसूत्रोंको 'व्याससूत्र' कहनेकी रीति पड़ गई है; और "शेषत्वान्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनि." (वे सू. ३. ४. २) इस सूत्रपर शांकरभाष्यकी टीकामें आनंदगिरिने लिखा है, कि जैमिनि वेदान्त-सूत्रकार व्यासजीके शिष्य थे; और अपने आरंभके मंगलाचरणमेंभी, 'श्रीमद्व्यासपयोनिधिर्निधिरसौ' इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मसूत्रोंका वर्णन किया है। यह कथा वर्तमान महाभारतके आधारपर हम ऊपर बतला चुके हैं, कि महा- भारतकार व्यासजीके पैल, शुक, सुमन्तु, जैमिनि और वैशंपायन नामक पाँच शिष्य थे; और उनको व्यासजीने महाभारत पढ़ाया था। इन दोनों बातोंको मिला कर विचार करनेसे यही अनुमान होता है, कि मूल भारत और तदंतर्गत गीताको वर्तमान स्वरूप देनेका तथा ब्रह्मसूत्रोंकी रचना करनेका कामभी एक बादरायण व्यासजीनेही किया होगा। इस कथनका यह मतलब नहीं, कि बादरायणाचार्यने वर्तमान महाभारतकी नवीन रचना की। हमारे कथनका भावार्थ यह है :- महा- भारत ग्रंथके अति विस्तृत होनेके कारण संभव है, कि बादरायणाचार्यके समय उसके कुछ भाग इधर उधर बिखर गये हों या लुप्तभी हो गये हों; ऐसी अवस्थामे तत्कालीन उपलब्ध महाभारतके भागोंकी खोज करके तथा ग्रंथमें जहाँ जहाँ अपूर्णता, अशुद्धियाँ और त्रुटियाँ दीख पड़ीं, वहाँ वहाँ उनका संशोधन और उनकी पूर्ति करके, तथा अनुक्रमणिका आदि जोड़ कर बादरायणाचार्यने इस ग्रंथका पुनरुज्जीवन किया हो; अथवा उसे वर्तमान स्वरूप दिया हो। मराठी साहित्यमें यह बात प्रसिद्ध है, कि ज्ञानेश्वरी ग्रंथका ऐसाही संशोधन एकनाथ महाराजने किया था; और यह कथाभी प्रचलित है, कि एक बार संस्कृतका व्याकरण-महाभाष्य प्रायः लुप्त हो गया था और उसका पुनरुद्धार चंद्रशेखराचार्यको करना पड़ा। अब इस बातकीभी ठीक ठीक उपपत्ति लग जाती है, कि महाभारतके अन्य प्रकरणोंमे गीताके श्लोक क्यों पाये जाते हैं; तथा यह बातभी सहजही हल हो जाती है कि गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका निर्देश क्यों किया गया है। जिस गीताके आधारपर वर्तमान गीता बनी है, वह बादरायणाचार्यके पहलेभी उपलब्ध थी, इसी कारण ब्रह्मसूत्रोमे 'स्मृति' शब्दसे उसका निर्देश किया गया; और महाभारतका संशोधन करते समय गीतामे * यह बतलाया गया, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विस्तारपूर्वक

  • पिछले प्रकरणोंमें हमने यह बतलाया है, कि ब्रह्मसूत्र वेदान्तसंबंधी मुख्य ग्रंथ है, और इसी प्रकार गीता कर्मयोगविषयक प्रधान ग्रंथ है। अब यदि हमारा यह अनुमान सत्य हो, कि ब्रह्मसूत्र और गीताकी रचना अकेले व्यासजीनेही की है; तो इन दोनों शास्त्रोंका कर्त्ता उन्हीको मानना पड़ता है। हम यह बात अनुमानद्वारा

५३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विवेचन ब्रह्मसूत्रोंमे किया गया है। वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका जो यह उल्लेख है, उसकी बराबरीकेही सूत्र-ग्रंथोंके अन्य उल्लेख वर्तमान महाभारतमेंभी हैं। उदाहरणार्थ, अनुशासनपर्वके अष्टावक्र आदि संवादमें “अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति” (अनु. १९. ६) यह वाक्य है। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण (शांति ३१८. ९६-७३) पचरात्र (शांति. ३३९. १०७), मनु. (अनु. ३७. १६) और यास्कके निरुक्तकाभी (शांति. ३४२. ७१) अन्यत्र साफ़ साफ़ उल्लेख किया गया है। परंतु गीताके समान महाभारतके सब भागोंको मुखाग्र करनेकी रीति नहीं थी; इसलिये यह शंका सहजही उत्पन्न होती है, कि गीताके अतिरिक्त महाभारतमें अन्य स्थानोंपर जो अन्य ग्रंथोंके उल्लेख हैं, वे काल-निर्णयार्थ कहाँ- तक विश्वसनीय माने जायें। क्योंकि, जो भाग मुखाग्र नहीं किये जाते, उनमें क्षेपक श्लोक मिला देना कोई कठिन बात नहीं। परंतु, हमारे मतानुसार, उपर्युक्त अन्य उल्लेखोंका यह बतलानेके लिये उपयोग करना कुछ अनुचित न होगा, कि वर्तमान गीतामें किया गया ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख केवल अकेला या अपूर्व अतएव अविश्वसनीय नहीं है। ऊपर सिद्धकर चुके हैं; परंतु कुंभकोणस्थ कृष्णाचार्यने, दाक्षिणात्य पाठके अनुसार, महाभारतकी जो एक पोथी हालहीमें प्रकाशित की है, उसमें शांतिपर्वके २१२ वें अध्यायमें (वार्ष्णेयाध्यात्म प्रकरणमें) प्रथम इस बातका वर्णन करते समय - कि युगके आरंभमें भिन्न भिन्न शास्त्र और इतिहास किस प्रकार निर्मित हुए - ३४ वाँ श्लोक इस प्रकार दिया है- वेदान्तकर्मयोगं च वेदविद् ब्रह्मविद्विभुः । द्वैपायनो निजग्राह शिल्पशास्त्रं भृगुः पुनः ॥ इस श्लोकमें 'वेदान्तकर्मयोग' एकवचनान्त पद है; परंतु उसका अर्थ 'वेदान्त और कर्मयोगही करना पड़ता है। अथवा यहभी प्रतीत होता है, कि 'वेदान्तं कर्मयोगं च' यही मूलपाठ होगा; और लिखते समय या छापते समय 'न्त'के ऊपरका अनुस्वार छूट गया हो। इस श्लोकमें यह साफ़ साफ़ कह दिया गया है, कि वेदान्त और कर्म- योग, दोनों शास्त्र व्यासजीको प्राप्त हुए थे; और शिल्पशास्त्र भृगुको मिला था। परंतु यह श्लोक बंबईके गणपत कृष्णाजीके छापाखानेसे प्रकाशित पोथीमें या कलकत्तेकी प्रतिमें नहीं मिलता। कुंभकोणकी पोथीका शांतिपर्वका २१२ वाँ अध्याय, बंबई और कलकत्ताकी प्रतिमें. २१० वाँ है। कुंभकोण पाठका यह श्लोक हमारे मित्र डॉक्टर गणेश कृष्ण गर्देने हमें सूचित किया, अतएव हम उनके कृतज्ञ हैं। उनके मता- नुसार इस स्थानपर कर्मयोग शब्दसे गीताही विवक्षित है; और इस श्लोकमें गीता और वेदान्त-सूत्रोंका (अर्थात् दोनोंका) कर्तृत्व व्यासजीकोही दिया गया है। महाभारतकी तीन पोथियोंमेंसे केवल एकही प्रतिमें ऐसा पाठ मिलता है, अतएव इसके विषयमें कुछ शंका उत्पन्न होती है। इस विषयमें चाहे जो कहा जाय; किंतु इस पाठसे इतना तो अवश्य सिद्ध हो जाता है, कि हमारा यह अनुमान, कि वेदान्त और कर्मयोगका कर्ता एकही है, कुछ नया या निराधार नहीं।

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५३९ 'ब्रह्मसूत्र पदैश्चैव' इत्यादि श्लोकके पदोंके अर्थ-स्वारस्यकी मीमांसा करके हम ऊपर इस बातका निर्णय कर चुके हैं, कि वर्तमान भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंहीका उल्लेख किया गया है। परंतु भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख होनेका - और वहभी तेरहवें अध्यायमें अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारहीमें होनेका - हमारे मतमें एक और महत्त्वपूर्ण तथा दृढ़ कारण है। भगवद्गीतामें वासुदेव- भक्तिका तत्त्व यद्यपि मूल भागवत या पांचरात्र-धर्मसे लिया गया है, जैसा हम पिछले प्रकरणोंमें कह आये हैं, चतुर्व्यूह-पांचरात्र-धर्ममें वर्णित मूल जीव और मनकी उत्पत्तिके विषयका यह मत भगवद्गीताको मान्य नहीं है, कि वासुदेवसे संकर्षण अर्थात् जीव, संकर्षणसे प्रद्युम्न (मन) और प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध (अहंकार) उत्पन्न हुआ। ब्रह्मसूत्रोंका यह सिद्धान्त है, कि जीवात्मा किसी अन्य वस्तुसे उत्पन्न नहीं हुआ है (वे. सू. २. ३. १७), और वह सनातन परमात्माहीका नित्य 'अंश' है (वे. सू० २. ३. ४३) । इसलिये ब्रह्मसूत्रोंके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें पहले कहा है, कि वासुदेवसे संकर्षणका होना अर्थात् भागवत-धर्मीय जीवसंबंधी उत्पत्ति संभव नहीं (वे. सू. २. २. ४२); और फिर यह कहा है, कि मन जीवकी एक इंद्रिय है इसलिये जीवसे प्रद्युम्नका (मन) होनाभी संभव नहीं (वे. सू. २. २. ४३) : क्योंकि लोकव्यवहारकी ओर देखनेसे तो यही बोध होता है, कि कर्त्ताहीमे कारण या साधन उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार बादरायणाचार्यने, भागवत धर्ममें वर्णित जीवकी उत्पत्तिका युक्तिपूर्वक खंडन किया है। संभव है, कि भागवत धर्मवाले इसपर यह उत्तर दें, कि हम वासुदेव (ईश्वर), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन) तथा अनिरुद्धको (अहंकार) एकही समान ज्ञानी समझते हैं; और एकसे दूसरेकी उत्पत्तिको लाक्षणिक तथा गौण मानते हैं। परंतु ऐसा माननेसे कहना पड़ेगा, कि एक मुख्य परमेश्वरके बदले चार मुख्य परमेश्वर हैं, अतएव ब्रह्मसूत्रोंमें कहा है, कि यह उत्तरभी समर्पक नहीं है; और बादरायणाचार्यने अंतिम निर्णय यह किया है, कि यह मत - परमेश्वरसे जीवका उत्पन्न होना - वेदों अर्थात् उपनिषदोंके मतके विरुद्ध अतएव त्याज्य है (वे. सू. २. २. ४४, ४५)। यद्यपि यह बात सच है, कि भागवत धर्मका कर्मप्रधान भक्ति-तत्त्व भगवद्गीतामें लिया गया है, तथापि गीताका यहभी सिद्धान्त है, कि जीव वासुदेवसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु वह नित्य परमात्माहीका 'अंश' है (गीता १५. ७)। जीवविषयक यह सिद्धान्त मूल भागवत धर्मसे नहीं लिया गया, इसलिये यह बतलाना आवश्यक था, कि इसका आधार क्या है। क्योंकि यदि ऐसा न किया जाता, तो संभव था, कि यह भ्रम उपस्थित हो जाता, कि चतुर्व्यूह भागवत धर्मके प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-तत्त्वके साथही साथ जीवकी उत्पत्ति- विषयक कल्पनासेभी गीता सहमत है। अतएव क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें जब जीवात्माका स्वरूप बतलानेका समय आया, तब अर्थात् गीताके तेरहवें अध्यायके आरंभहीमें यह स्पष्ट रूपसे कह देना पड़ा, कि "क्षेत्रज्ञके अर्थात् जीवके स्वरूपके संबंधमें हमारा

५४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

मत भागवत धर्मके अनुसार नहीं; वरन् उपनिषदोंमे वर्णित ऋषियोके मतानुसार है; " और फिर उसके साथही साथ स्वभावतः यहभी कहना पड़ा है, कि भिन्न भिन्न ऋषियोंने भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें पृथक् पृथक् उपपादन किया है, इसलिये उन सबकी ब्रह्मसूत्रोंमे की गई एकवाक्यता ही (वे. सू. २. ३. ४३) हमें ग्राह्य है। इस दृष्टिसे विचार करनेपर यही प्रतीत होगा, कि भागवत धर्मके भक्ति-मार्गका गीतामें इस रीतिसे समावेश किया गया है, जिससे वे आक्षेप दूर हो जायें, कि जो ब्रह्मसूत्रोंमे भाग- वत धर्मपर ला दिये गये हैं। रामानुजाचार्यने अपने वेदान्तसूत्र-भाष्यमे उक्त सूत्रोंके अर्थको बदल दिया है (वे. सू. रा. भा. २. २. ४२-४५)। परंतु हमारे मतमे अर्थ क्लिष्ट अतएव अग्राह्य हैं। थिब्रो साहबका झुकाव रामानुज-भाष्यमे दिये गये अर्थकी ओरही है; परंतु उनके लेखोमे तो यही ज्ञात होता है, कि इस बातका यथार्थ स्वरूप उनके ध्यानमे नही आया। महाभारतके शांतिपर्वके अंतिम भागमें नारायणीय अथवा भागवत धर्मका जो वर्णन है, उसमें यह नहीं कहा है, कि वासुदेवसे जीव अर्थात् संकर्षण हुआ; किंतु पहले यह बतलाया है, कि "जो वासुदेव है, वही (स एव) संकर्षण अर्थात् जीव या क्षेत्रज्ञ है" (मभा. शां. ३३४. २८, २९; ३३९. ३९, ४१); और इसके बाद संकर्षणसे प्रद्युम्न तककी केवल परंपरा दी गई है। एक स्थानपर तो यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि भागवत धर्मके कोई चतुर्व्यूह, कोई त्रिव्यूह, कोई द्विव्यूह और अंतमें कोई एकव्यूहभी मानते हैं (मभा. शां. ३४८. ५३)। परंतु भागवत धर्मके इन विविध पक्षोंको स्वीकार न कर, उनमेसे सिर्फ़ वही एक मत वर्तमान गीतामें स्थिर किया गया है, जिसका मेल क्षेत्रक्षेत्रज्ञके परस्पर-संबंधमे उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रोंमे हो सके; और इस बातपर ध्यान देनेपर यह प्रश्न ठीक तौरसे हल हो जाता है, कि ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख गीतामे क्यों किया है ? अथवा यह कहनाभी अयुक्तिक नही, कि मूल गीतामे यह एक सुधारही किया गया है।

भाग - ४ भागवत धर्मका उदय और गीता

गीतारहस्यमे अनेक स्थानोंपर तथा इस प्रकरणमेंभी पहले यह बतला दिया गया है, कि उपनिषदोंके ब्रह्मज्ञान तथा कापिल-सांख्यके क्षर-अक्षर-विचारके साथ भक्ति और विशेषतः निष्काम कर्मका मेल करके कर्मयोगका शास्त्रीय रीतिसे पूर्ण- तया समर्थन करनाही गीता-ग्रंथका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। परंतु इतने विषयोंकी एकता करनेकी गीताकी पद्धति जिनके ध्यानमे पूरी तरह नही आ सकती, अथवा जिनका पहलेहीसे यह मत हो जाता है, कि इतने विषयोंकी एकता होही नहीं सकती; उन्हें इस बातका आभास हुआ करता है, कि गीताके बहुतेरे सिद्धान्त परस्परविरोधी हैं। उदाहरणार्थ, इन आक्षेपकोंका यह मत है, कि तेरहवे अध्यायका यह कथन कि - इस जगतमें जो कुछ है, वह सब निर्गुण ब्रह्म है, - सातवे अध्यायके इस कथनसे

गीता की बहिरंगपरीक्षा ५४१ बिलकुलही विरुद्ध है, कि यह सब सगुण वासुदेवही है । (गीता ७.१९) इसी प्रकार भगवान् एक जगह कहते हैं, कि "मुझे शत्रु और मित्र समान हैं" (गीता ९.२९); और दूसरे स्थानपरभी कहते हैं, कि "ज्ञानी तथा भक्तिमान् पुरुष मुझे अत्यन्त प्रिय हैं' (गीता ७.१७, १२.१९) - ये दोनों बातें परस्परविरोधी हैं। परन्तु हमने गीतारहस्यमें अनेक स्थानोंपर इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया है, कि वस्तुतः ये विरोध नहीं हैं, किंतु एकही बातपर एक बार अध्यात्म-दृष्टिसे और दूसरी बार भक्तिकी दृष्टिसे विचार किया गया है, इसलिये यद्यपि दिखनेमें ये विरोधी बातें कहनी पड़ीं, तथापि अंतमें व्यापक तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे गीतामें उनका मेलभी कर दिया गया है। इसपरभी कुछ लोगोंका यह आक्षेप है, कि अव्यक्त ब्रह्म- ज्ञान और व्यक्त परमेश्वरकी भक्तिमें यद्यपि उक्त प्रकारसे मेल कर दिया गया है, तथापि मूल गीतामें इस मेलका होना संभव नहीं; क्योंकि मूल गीता वर्तमान गीताके समान परस्परविरोधी बातोंसे भरी नहीं थी, उसमें वेदान्तियोंने अथवा सांख्यशास्त्रा- भिमानियोंने अपने अपने शास्त्रोंके भाग पीछेसे घुसेड़ दिये हैं। उदाहरणार्थ, प्रो. गार्वेका कथन है, कि मूल गीतामें भक्तिका मेल केवल सांख्य तथा योगहीसे किया गया है, वेदान्तके साथ मीमांसकोंके कर्म-मार्गके साथ भक्तिका मेल कर देनेका काम किसीने पीछेसे किया है। मूल गीतामें इस प्रकार जो श्लोक पीछेसे जोड़े गये, उनकी, अपने मतानुसार एक तालिकाभी उसने जर्मन भाषामें अनुवादित अपनी गीताके अन्तमें दी है! हमारे मतानुसार ये सब कल्पनाएँ भ्रममूलक हैं। वैदिक धर्मके भिन्न भिन्न अंगोंकी ऐतिहासिक परंपरा और गीताके 'सांख्य' तथा 'योग' शब्दोंका सच्चा अर्थ ठीक ठीक न समझनेके कारण, और विशेषतः तत्त्वज्ञानविरहित अर्थात् केवल भक्तिप्रधान ईसाई धर्मत्रीका इतिहास उक्त लेखकों के (प्रो. गार्वे प्रभृति) सामने गड़ा रहनेके कारण, उक्त प्रकारके भ्रम उत्पन्न हो गये हैं। ईसाई धर्म पहले केवल भक्तिप्रधान था; और ग्रीक लोगोंके अथवा अन्य तत्त्वज्ञानमे उसका मेल करनेका कार्य पीछेसे किया गया है। परन्तु यह बात हमारे धर्मकी नहीं। हिंदुस्थानमें भक्ति-मार्गका उदय होनेके पहलेही मीमांसकोंका यज्ञ-मार्ग, उपनिषत्कारोंका ज्ञान तथा सांख्य और योग - इन सबको परिपक्व दशा प्राप्त हो चुकी थी। इसलिये पहलेहीसे हमारे देशवासियोंको स्वतंत्र रीतिसे प्रतिपादित ऐसा भक्ति-मार्ग कभीभी मान्य नहीं हो सकता था जो इन सब शास्त्रोंमें और विशेष करके उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मज्ञानसे अलग हो। इन बातोंपर ध्यान देनेसे यह मानना पड़ता है कि गीताके धर्म-प्रतिपादनका स्वरूप पहलेहीसे प्रायः वर्तमान गीताके प्रतिपादनके सदृशही था। गीतारहस्यका विवेचनभी इसी बातकी ओर ध्यान देकर किया गया है, परन्तु यह विषय अत्यन्त महत्त्वका है, इसलिये संक्षेपमें यहांपर यह बतलाना चाहिये, कि गीता-धर्मके मूल स्वरूप तथा परंपराके संबंधमें ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर, हमारे मनमें कौन-कौन-सी बातें निष्पन्न होती हैं।