श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
मत भागवत धर्मके अनुसार नहीं; वरन् उपनिषदोंमे वर्णित ऋषियोके मतानुसार है; " और फिर उसके साथही साथ स्वभावतः यहभी कहना पड़ा है, कि भिन्न भिन्न ऋषियोंने भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें पृथक् पृथक् उपपादन किया है, इसलिये उन सबकी ब्रह्मसूत्रोंमे की गई एकवाक्यता ही (वे. सू. २. ३. ४३) हमें ग्राह्य है। इस दृष्टिसे विचार करनेपर यही प्रतीत होगा, कि भागवत धर्मके भक्ति-मार्गका गीतामें इस रीतिसे समावेश किया गया है, जिससे वे आक्षेप दूर हो जायें, कि जो ब्रह्मसूत्रोंमे भाग- वत धर्मपर ला दिये गये हैं। रामानुजाचार्यने अपने वेदान्तसूत्र-भाष्यमे उक्त सूत्रोंके अर्थको बदल दिया है (वे. सू. रा. भा. २. २. ४२-४५)। परंतु हमारे मतमे अर्थ क्लिष्ट अतएव अग्राह्य हैं। थिब्रो साहबका झुकाव रामानुज-भाष्यमे दिये गये अर्थकी ओरही है; परंतु उनके लेखोमे तो यही ज्ञात होता है, कि इस बातका यथार्थ स्वरूप उनके ध्यानमे नही आया। महाभारतके शांतिपर्वके अंतिम भागमें नारायणीय अथवा भागवत धर्मका जो वर्णन है, उसमें यह नहीं कहा है, कि वासुदेवसे जीव अर्थात् संकर्षण हुआ; किंतु पहले यह बतलाया है, कि "जो वासुदेव है, वही (स एव) संकर्षण अर्थात् जीव या क्षेत्रज्ञ है" (मभा. शां. ३३४. २८, २९; ३३९. ३९, ४१); और इसके बाद संकर्षणसे प्रद्युम्न तककी केवल परंपरा दी गई है। एक स्थानपर तो यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि भागवत धर्मके कोई चतुर्व्यूह, कोई त्रिव्यूह, कोई द्विव्यूह और अंतमें कोई एकव्यूहभी मानते हैं (मभा. शां. ३४८. ५३)। परंतु भागवत धर्मके इन विविध पक्षोंको स्वीकार न कर, उनमेसे सिर्फ़ वही एक मत वर्तमान गीतामें स्थिर किया गया है, जिसका मेल क्षेत्रक्षेत्रज्ञके परस्पर-संबंधमे उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रोंमे हो सके; और इस बातपर ध्यान देनेपर यह प्रश्न ठीक तौरसे हल हो जाता है, कि ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख गीतामे क्यों किया है ? अथवा यह कहनाभी अयुक्तिक नही, कि मूल गीतामे यह एक सुधारही किया गया है।
भाग - ४ भागवत धर्मका उदय और गीता
गीतारहस्यमे अनेक स्थानोंपर तथा इस प्रकरणमेंभी पहले यह बतला दिया गया है, कि उपनिषदोंके ब्रह्मज्ञान तथा कापिल-सांख्यके क्षर-अक्षर-विचारके साथ भक्ति और विशेषतः निष्काम कर्मका मेल करके कर्मयोगका शास्त्रीय रीतिसे पूर्ण- तया समर्थन करनाही गीता-ग्रंथका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। परंतु इतने विषयोंकी एकता करनेकी गीताकी पद्धति जिनके ध्यानमे पूरी तरह नही आ सकती, अथवा जिनका पहलेहीसे यह मत हो जाता है, कि इतने विषयोंकी एकता होही नहीं सकती; उन्हें इस बातका आभास हुआ करता है, कि गीताके बहुतेरे सिद्धान्त परस्परविरोधी हैं। उदाहरणार्थ, इन आक्षेपकोंका यह मत है, कि तेरहवे अध्यायका यह कथन कि - इस जगतमें जो कुछ है, वह सब निर्गुण ब्रह्म है, - सातवे अध्यायके इस कथनसे