भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 584

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५३९ 'ब्रह्मसूत्र पदैश्चैव' इत्यादि श्लोकके पदोंके अर्थ-स्वारस्यकी मीमांसा करके हम ऊपर इस बातका निर्णय कर चुके हैं, कि वर्तमान भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंहीका उल्लेख किया गया है। परंतु भगवद्गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख होनेका - और वहभी तेरहवें अध्यायमें अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारहीमें होनेका - हमारे मतमें एक और महत्त्वपूर्ण तथा दृढ़ कारण है। भगवद्गीतामें वासुदेव- भक्तिका तत्त्व यद्यपि मूल भागवत या पांचरात्र-धर्मसे लिया गया है, जैसा हम पिछले प्रकरणोंमें कह आये हैं, चतुर्व्यूह-पांचरात्र-धर्ममें वर्णित मूल जीव और मनकी उत्पत्तिके विषयका यह मत भगवद्गीताको मान्य नहीं है, कि वासुदेवसे संकर्षण अर्थात् जीव, संकर्षणसे प्रद्युम्न (मन) और प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध (अहंकार) उत्पन्न हुआ। ब्रह्मसूत्रोंका यह सिद्धान्त है, कि जीवात्मा किसी अन्य वस्तुसे उत्पन्न नहीं हुआ है (वे. सू. २. ३. १७), और वह सनातन परमात्माहीका नित्य 'अंश' है (वे. सू० २. ३. ४३) । इसलिये ब्रह्मसूत्रोंके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें पहले कहा है, कि वासुदेवसे संकर्षणका होना अर्थात् भागवत-धर्मीय जीवसंबंधी उत्पत्ति संभव नहीं (वे. सू. २. २. ४२); और फिर यह कहा है, कि मन जीवकी एक इंद्रिय है इसलिये जीवसे प्रद्युम्नका (मन) होनाभी संभव नहीं (वे. सू. २. २. ४३) : क्योंकि लोकव्यवहारकी ओर देखनेसे तो यही बोध होता है, कि कर्त्ताहीमे कारण या साधन उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार बादरायणाचार्यने, भागवत धर्ममें वर्णित जीवकी उत्पत्तिका युक्तिपूर्वक खंडन किया है। संभव है, कि भागवत धर्मवाले इसपर यह उत्तर दें, कि हम वासुदेव (ईश्वर), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन) तथा अनिरुद्धको (अहंकार) एकही समान ज्ञानी समझते हैं; और एकसे दूसरेकी उत्पत्तिको लाक्षणिक तथा गौण मानते हैं। परंतु ऐसा माननेसे कहना पड़ेगा, कि एक मुख्य परमेश्वरके बदले चार मुख्य परमेश्वर हैं, अतएव ब्रह्मसूत्रोंमें कहा है, कि यह उत्तरभी समर्पक नहीं है; और बादरायणाचार्यने अंतिम निर्णय यह किया है, कि यह मत - परमेश्वरसे जीवका उत्पन्न होना - वेदों अर्थात् उपनिषदोंके मतके विरुद्ध अतएव त्याज्य है (वे. सू. २. २. ४४, ४५)। यद्यपि यह बात सच है, कि भागवत धर्मका कर्मप्रधान भक्ति-तत्त्व भगवद्गीतामें लिया गया है, तथापि गीताका यहभी सिद्धान्त है, कि जीव वासुदेवसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु वह नित्य परमात्माहीका 'अंश' है (गीता १५. ७)। जीवविषयक यह सिद्धान्त मूल भागवत धर्मसे नहीं लिया गया, इसलिये यह बतलाना आवश्यक था, कि इसका आधार क्या है। क्योंकि यदि ऐसा न किया जाता, तो संभव था, कि यह भ्रम उपस्थित हो जाता, कि चतुर्व्यूह भागवत धर्मके प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-तत्त्वके साथही साथ जीवकी उत्पत्ति- विषयक कल्पनासेभी गीता सहमत है। अतएव क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें जब जीवात्माका स्वरूप बतलानेका समय आया, तब अर्थात् गीताके तेरहवें अध्यायके आरंभहीमें यह स्पष्ट रूपसे कह देना पड़ा, कि "क्षेत्रज्ञके अर्थात् जीवके स्वरूपके संबंधमें हमारा