श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विवेचन ब्रह्मसूत्रोंमे किया गया है। वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका जो यह उल्लेख है, उसकी बराबरीकेही सूत्र-ग्रंथोंके अन्य उल्लेख वर्तमान महाभारतमेंभी हैं। उदाहरणार्थ, अनुशासनपर्वके अष्टावक्र आदि संवादमें “अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति” (अनु. १९. ६) यह वाक्य है। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण (शांति ३१८. ९६-७३) पचरात्र (शांति. ३३९. १०७), मनु. (अनु. ३७. १६) और यास्कके निरुक्तकाभी (शांति. ३४२. ७१) अन्यत्र साफ़ साफ़ उल्लेख किया गया है। परंतु गीताके समान महाभारतके सब भागोंको मुखाग्र करनेकी रीति नहीं थी; इसलिये यह शंका सहजही उत्पन्न होती है, कि गीताके अतिरिक्त महाभारतमें अन्य स्थानोंपर जो अन्य ग्रंथोंके उल्लेख हैं, वे काल-निर्णयार्थ कहाँ- तक विश्वसनीय माने जायें। क्योंकि, जो भाग मुखाग्र नहीं किये जाते, उनमें क्षेपक श्लोक मिला देना कोई कठिन बात नहीं। परंतु, हमारे मतानुसार, उपर्युक्त अन्य उल्लेखोंका यह बतलानेके लिये उपयोग करना कुछ अनुचित न होगा, कि वर्तमान गीतामें किया गया ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख केवल अकेला या अपूर्व अतएव अविश्वसनीय नहीं है। ऊपर सिद्धकर चुके हैं; परंतु कुंभकोणस्थ कृष्णाचार्यने, दाक्षिणात्य पाठके अनुसार, महाभारतकी जो एक पोथी हालहीमें प्रकाशित की है, उसमें शांतिपर्वके २१२ वें अध्यायमें (वार्ष्णेयाध्यात्म प्रकरणमें) प्रथम इस बातका वर्णन करते समय - कि युगके आरंभमें भिन्न भिन्न शास्त्र और इतिहास किस प्रकार निर्मित हुए - ३४ वाँ श्लोक इस प्रकार दिया है- वेदान्तकर्मयोगं च वेदविद् ब्रह्मविद्विभुः । द्वैपायनो निजग्राह शिल्पशास्त्रं भृगुः पुनः ॥ इस श्लोकमें 'वेदान्तकर्मयोग' एकवचनान्त पद है; परंतु उसका अर्थ 'वेदान्त और कर्मयोगही करना पड़ता है। अथवा यहभी प्रतीत होता है, कि 'वेदान्तं कर्मयोगं च' यही मूलपाठ होगा; और लिखते समय या छापते समय 'न्त'के ऊपरका अनुस्वार छूट गया हो। इस श्लोकमें यह साफ़ साफ़ कह दिया गया है, कि वेदान्त और कर्म- योग, दोनों शास्त्र व्यासजीको प्राप्त हुए थे; और शिल्पशास्त्र भृगुको मिला था। परंतु यह श्लोक बंबईके गणपत कृष्णाजीके छापाखानेसे प्रकाशित पोथीमें या कलकत्तेकी प्रतिमें नहीं मिलता। कुंभकोणकी पोथीका शांतिपर्वका २१२ वाँ अध्याय, बंबई और कलकत्ताकी प्रतिमें. २१० वाँ है। कुंभकोण पाठका यह श्लोक हमारे मित्र डॉक्टर गणेश कृष्ण गर्देने हमें सूचित किया, अतएव हम उनके कृतज्ञ हैं। उनके मता- नुसार इस स्थानपर कर्मयोग शब्दसे गीताही विवक्षित है; और इस श्लोकमें गीता और वेदान्त-सूत्रोंका (अर्थात् दोनोंका) कर्तृत्व व्यासजीकोही दिया गया है। महाभारतकी तीन पोथियोंमेंसे केवल एकही प्रतिमें ऐसा पाठ मिलता है, अतएव इसके विषयमें कुछ शंका उत्पन्न होती है। इस विषयमें चाहे जो कहा जाय; किंतु इस पाठसे इतना तो अवश्य सिद्ध हो जाता है, कि हमारा यह अनुमान, कि वेदान्त और कर्मयोगका कर्ता एकही है, कुछ नया या निराधार नहीं।