श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'स्मृति' शब्दसे कौन-सा ग्रंथ विवक्षित है; तब इस अड़चनसे कैसे पार पावें ? हमारे मतानुसार इस अड़चनसे बचनेका केवल एकही मार्ग है। यदि यह मान लिया जाय कि जिसने ब्रह्मसूत्रोंकी रचना की है, उसीने मूल भारत तथा गीताको वर्तमान स्वरूप दिया है, तो कोई अड़चन या विरोध नहीं रह जाता। ब्रह्मसूत्रोंको 'व्याससूत्र' कहनेकी रीति पड़ गई है; और "शेषत्वान्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनि." (वे सू. ३. ४. २) इस सूत्रपर शांकरभाष्यकी टीकामें आनंदगिरिने लिखा है, कि जैमिनि वेदान्त-सूत्रकार व्यासजीके शिष्य थे; और अपने आरंभके मंगलाचरणमेंभी, 'श्रीमद्व्यासपयोनिधिर्निधिरसौ' इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मसूत्रोंका वर्णन किया है। यह कथा वर्तमान महाभारतके आधारपर हम ऊपर बतला चुके हैं, कि महा- भारतकार व्यासजीके पैल, शुक, सुमन्तु, जैमिनि और वैशंपायन नामक पाँच शिष्य थे; और उनको व्यासजीने महाभारत पढ़ाया था। इन दोनों बातोंको मिला कर विचार करनेसे यही अनुमान होता है, कि मूल भारत और तदंतर्गत गीताको वर्तमान स्वरूप देनेका तथा ब्रह्मसूत्रोंकी रचना करनेका कामभी एक बादरायण व्यासजीनेही किया होगा। इस कथनका यह मतलब नहीं, कि बादरायणाचार्यने वर्तमान महाभारतकी नवीन रचना की। हमारे कथनका भावार्थ यह है :- महा- भारत ग्रंथके अति विस्तृत होनेके कारण संभव है, कि बादरायणाचार्यके समय उसके कुछ भाग इधर उधर बिखर गये हों या लुप्तभी हो गये हों; ऐसी अवस्थामे तत्कालीन उपलब्ध महाभारतके भागोंकी खोज करके तथा ग्रंथमें जहाँ जहाँ अपूर्णता, अशुद्धियाँ और त्रुटियाँ दीख पड़ीं, वहाँ वहाँ उनका संशोधन और उनकी पूर्ति करके, तथा अनुक्रमणिका आदि जोड़ कर बादरायणाचार्यने इस ग्रंथका पुनरुज्जीवन किया हो; अथवा उसे वर्तमान स्वरूप दिया हो। मराठी साहित्यमें यह बात प्रसिद्ध है, कि ज्ञानेश्वरी ग्रंथका ऐसाही संशोधन एकनाथ महाराजने किया था; और यह कथाभी प्रचलित है, कि एक बार संस्कृतका व्याकरण-महाभाष्य प्रायः लुप्त हो गया था और उसका पुनरुद्धार चंद्रशेखराचार्यको करना पड़ा। अब इस बातकीभी ठीक ठीक उपपत्ति लग जाती है, कि महाभारतके अन्य प्रकरणोंमे गीताके श्लोक क्यों पाये जाते हैं; तथा यह बातभी सहजही हल हो जाती है कि गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका स्पष्ट उल्लेख और ब्रह्मसूत्रोंमें 'स्मृति' शब्दसे गीताका निर्देश क्यों किया गया है। जिस गीताके आधारपर वर्तमान गीता बनी है, वह बादरायणाचार्यके पहलेभी उपलब्ध थी, इसी कारण ब्रह्मसूत्रोमे 'स्मृति' शब्दसे उसका निर्देश किया गया; और महाभारतका संशोधन करते समय गीतामे * यह बतलाया गया, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विस्तारपूर्वक
- पिछले प्रकरणोंमें हमने यह बतलाया है, कि ब्रह्मसूत्र वेदान्तसंबंधी मुख्य ग्रंथ है, और इसी प्रकार गीता कर्मयोगविषयक प्रधान ग्रंथ है। अब यदि हमारा यह अनुमान सत्य हो, कि ब्रह्मसूत्र और गीताकी रचना अकेले व्यासजीनेही की है; तो इन दोनों शास्त्रोंका कर्त्ता उन्हीको मानना पड़ता है। हम यह बात अनुमानद्वारा