भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 586

गीता की बहिरंगपरीक्षा ५४१ बिलकुलही विरुद्ध है, कि यह सब सगुण वासुदेवही है । (गीता ७.१९) इसी प्रकार भगवान् एक जगह कहते हैं, कि "मुझे शत्रु और मित्र समान हैं" (गीता ९.२९); और दूसरे स्थानपरभी कहते हैं, कि "ज्ञानी तथा भक्तिमान् पुरुष मुझे अत्यन्त प्रिय हैं' (गीता ७.१७, १२.१९) - ये दोनों बातें परस्परविरोधी हैं। परन्तु हमने गीतारहस्यमें अनेक स्थानोंपर इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया है, कि वस्तुतः ये विरोध नहीं हैं, किंतु एकही बातपर एक बार अध्यात्म-दृष्टिसे और दूसरी बार भक्तिकी दृष्टिसे विचार किया गया है, इसलिये यद्यपि दिखनेमें ये विरोधी बातें कहनी पड़ीं, तथापि अंतमें व्यापक तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे गीतामें उनका मेलभी कर दिया गया है। इसपरभी कुछ लोगोंका यह आक्षेप है, कि अव्यक्त ब्रह्म- ज्ञान और व्यक्त परमेश्वरकी भक्तिमें यद्यपि उक्त प्रकारसे मेल कर दिया गया है, तथापि मूल गीतामें इस मेलका होना संभव नहीं; क्योंकि मूल गीता वर्तमान गीताके समान परस्परविरोधी बातोंसे भरी नहीं थी, उसमें वेदान्तियोंने अथवा सांख्यशास्त्रा- भिमानियोंने अपने अपने शास्त्रोंके भाग पीछेसे घुसेड़ दिये हैं। उदाहरणार्थ, प्रो. गार्वेका कथन है, कि मूल गीतामें भक्तिका मेल केवल सांख्य तथा योगहीसे किया गया है, वेदान्तके साथ मीमांसकोंके कर्म-मार्गके साथ भक्तिका मेल कर देनेका काम किसीने पीछेसे किया है। मूल गीतामें इस प्रकार जो श्लोक पीछेसे जोड़े गये, उनकी, अपने मतानुसार एक तालिकाभी उसने जर्मन भाषामें अनुवादित अपनी गीताके अन्तमें दी है! हमारे मतानुसार ये सब कल्पनाएँ भ्रममूलक हैं। वैदिक धर्मके भिन्न भिन्न अंगोंकी ऐतिहासिक परंपरा और गीताके 'सांख्य' तथा 'योग' शब्दोंका सच्चा अर्थ ठीक ठीक न समझनेके कारण, और विशेषतः तत्त्वज्ञानविरहित अर्थात् केवल भक्तिप्रधान ईसाई धर्मत्रीका इतिहास उक्त लेखकों के (प्रो. गार्वे प्रभृति) सामने गड़ा रहनेके कारण, उक्त प्रकारके भ्रम उत्पन्न हो गये हैं। ईसाई धर्म पहले केवल भक्तिप्रधान था; और ग्रीक लोगोंके अथवा अन्य तत्त्वज्ञानमे उसका मेल करनेका कार्य पीछेसे किया गया है। परन्तु यह बात हमारे धर्मकी नहीं। हिंदुस्थानमें भक्ति-मार्गका उदय होनेके पहलेही मीमांसकोंका यज्ञ-मार्ग, उपनिषत्कारोंका ज्ञान तथा सांख्य और योग - इन सबको परिपक्व दशा प्राप्त हो चुकी थी। इसलिये पहलेहीसे हमारे देशवासियोंको स्वतंत्र रीतिसे प्रतिपादित ऐसा भक्ति-मार्ग कभीभी मान्य नहीं हो सकता था जो इन सब शास्त्रोंमें और विशेष करके उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मज्ञानसे अलग हो। इन बातोंपर ध्यान देनेसे यह मानना पड़ता है कि गीताके धर्म-प्रतिपादनका स्वरूप पहलेहीसे प्रायः वर्तमान गीताके प्रतिपादनके सदृशही था। गीतारहस्यका विवेचनभी इसी बातकी ओर ध्यान देकर किया गया है, परन्तु यह विषय अत्यन्त महत्त्वका है, इसलिये संक्षेपमें यहांपर यह बतलाना चाहिये, कि गीता-धर्मके मूल स्वरूप तथा परंपराके संबंधमें ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर, हमारे मनमें कौन-कौन-सी बातें निष्पन्न होती हैं।