श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें इस बातका विवेचन किया गया है, कि वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप न तो भक्ति-प्रधान, न तो ज्ञान-प्रधान और न योग- प्रधानभी था; किंतु वह यज्ञमय अर्थात् कर्म-प्रधान था, और वेदसंहिता तथा ब्राह्मणोंमें विशेषतः इसी यज्ञयाग आदि कर्म-प्रधान धर्मका प्रतिपादन किया गया है। आगे चल कर इसी धर्मका व्यवस्थित विवेचन जैमिनीके मीमांसा-सूत्रोंमें किया गया है। इसीलिये उसे 'मीमांसक-मार्ग' नाम प्राप्त हुआ। परंतु, यद्यपि 'मीमांसक' नाम नया है; तथापि इस विषयमें तो बिलकुलही संदेह नहीं, कि यज्ञयाग आदि धर्म अत्यंत प्राचीन है: इतनाही नहीं, तो उसे ऐतिहासिक दृष्टिसे वैदिक धर्मकी प्रथम सीढ़ी कह सकते हैं। 'मीमांसक-मार्ग' नाम प्राप्त होनेके पहले उसको त्रयी धर्म अर्थात् तीन वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्म कहते थे; और इसी नामका उल्लेख गीतामेंभी किया गया है (गीता ९.२०, २१)। कर्ममय त्रयी धर्मके इस प्रकार जोर- शोरसे प्रचलित रहनेपर, कर्मसे अर्थात् केवल यज्ञयाग आदिके बाह्य प्रयत्नसे परमेश्वरका ज्ञान कैसे हो सकता है? ज्ञान होना एक मानसिक स्थिति है; इसलिये परमेश्वरके स्वरूपका विचार किये बिना ज्ञान होना संभव नहीं, इत्यादि विषय और कल्पनाएं उपस्थित होने लगीं; और धीरे धीरे उन्हींमेंसे औपनिषदिक ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ। यह बात, छांदोग्य आदि उपनिषदोंके आरंभमें जो अवतरण दिये हैं, उनसे स्पष्ट मालूम हो जाती है। इस औपनिषदिक ब्रह्मज्ञानहीको आगे चलकर 'वेदान्त' नाम प्राप्त हुआ। परंतु, मीमांसा शब्दके समान यद्यपि वेदान्त नाम पीछेसे प्रचलित हुआ है, तथापि उससे यह नहीं कहा जा सकता, कि ब्रह्मज्ञान अथवा ज्ञान-मार्गभी नया है। यह सच है, कि कर्मकांडके अनंतरही ज्ञानकांड उत्पन्न हुआ ! परंतु स्मरण रहे, कि ये दोनों प्राचीन हैं। इस ज्ञान-मार्गहीकी दूसरी, किंतु स्वतंत्र शाखा 'कापिल-सांख्य' है। गीतारहस्यमें यह बतला दिया गया है, कि इधर ब्रह्मज्ञान अद्वैती है, तो उधर सांख्य है द्वैती, और सृष्टिकी उत्पत्तिके क्रमके संबंधमें सांख्योंके विचार मूलमें भिन्न हैं। परंतु औपनिषदिक अद्वैती ब्रह्मज्ञान तथा सांख्योंका द्वैती ज्ञान दोनों यद्यपि मूलमें भिन्न भिन्न हों, तथापि केवल ज्ञान-दृष्टिसे देखनेपर जान पड़ेगा, कि ये दोनों मार्ग अपने पहलेके यज्ञ-याग आदि कर्म-मार्गके एकहीसे विरोधी थे। अतएव यह प्रश्न स्वभावतः उत्पन्न हुआ, कि कर्मका ज्ञानसे किस प्रकार मेल किया जाय ? इसी कारणसे उपनिषत्- कालहीमें इस विषयपर दो दल हो गये थे। उनमेंसे बृहदारण्यकादि उपनिषद् तथा सांख्य यह कहने लगे, कि कर्म और ज्ञानमें नित्य विरोध है, इसलिये ज्ञान हो जानेपर कर्मका त्याग करना प्रशस्तही नहीं, किंतु आवश्यकभी है। इसके विरुद्ध ईशावास्यादि अन्य उपनिषद् यह प्रतिपादन करने लगे, कि ज्ञान हो जानेपरभी कर्म छोड़ा नहीं जा सकता, वैराग्यसे बुद्धिको निष्काम करके जगत्में व्यवहारकी सिद्धिके लिये ज्ञानी पुरुषको सब कर्म करनेही चाहिये। इन उपनिषदोंके