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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

५४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें इस बातका विवेचन किया गया है, कि वैदिक धर्मका अत्यंत प्राचीन स्वरूप न तो भक्ति-प्रधान, न तो ज्ञान-प्रधान और न योग- प्रधानभी था; किंतु वह यज्ञमय अर्थात् कर्म-प्रधान था, और वेदसंहिता तथा ब्राह्मणोंमें विशेषतः इसी यज्ञयाग आदि कर्म-प्रधान धर्मका प्रतिपादन किया गया है। आगे चल कर इसी धर्मका व्यवस्थित विवेचन जैमिनीके मीमांसा-सूत्रोंमें किया गया है। इसीलिये उसे 'मीमांसक-मार्ग' नाम प्राप्त हुआ। परंतु, यद्यपि 'मीमांसक' नाम नया है; तथापि इस विषयमें तो बिलकुलही संदेह नहीं, कि यज्ञयाग आदि धर्म अत्यंत प्राचीन है: इतनाही नहीं, तो उसे ऐतिहासिक दृष्टिसे वैदिक धर्मकी प्रथम सीढ़ी कह सकते हैं। 'मीमांसक-मार्ग' नाम प्राप्त होनेके पहले उसको त्रयी धर्म अर्थात् तीन वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्म कहते थे; और इसी नामका उल्लेख गीतामेंभी किया गया है (गीता ९.२०, २१)। कर्ममय त्रयी धर्मके इस प्रकार जोर- शोरसे प्रचलित रहनेपर, कर्मसे अर्थात् केवल यज्ञयाग आदिके बाह्य प्रयत्नसे परमेश्वरका ज्ञान कैसे हो सकता है? ज्ञान होना एक मानसिक स्थिति है; इसलिये परमेश्वरके स्वरूपका विचार किये बिना ज्ञान होना संभव नहीं, इत्यादि विषय और कल्पनाएं उपस्थित होने लगीं; और धीरे धीरे उन्हींमेंसे औपनिषदिक ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ। यह बात, छांदोग्य आदि उपनिषदोंके आरंभमें जो अवतरण दिये हैं, उनसे स्पष्ट मालूम हो जाती है। इस औपनिषदिक ब्रह्मज्ञानहीको आगे चलकर 'वेदान्त' नाम प्राप्त हुआ। परंतु, मीमांसा शब्दके समान यद्यपि वेदान्त नाम पीछेसे प्रचलित हुआ है, तथापि उससे यह नहीं कहा जा सकता, कि ब्रह्मज्ञान अथवा ज्ञान-मार्गभी नया है। यह सच है, कि कर्मकांडके अनंतरही ज्ञानकांड उत्पन्न हुआ ! परंतु स्मरण रहे, कि ये दोनों प्राचीन हैं। इस ज्ञान-मार्गहीकी दूसरी, किंतु स्वतंत्र शाखा 'कापिल-सांख्य' है। गीतारहस्यमें यह बतला दिया गया है, कि इधर ब्रह्मज्ञान अद्वैती है, तो उधर सांख्य है द्वैती, और सृष्टिकी उत्पत्तिके क्रमके संबंधमें सांख्योंके विचार मूलमें भिन्न हैं। परंतु औपनिषदिक अद्वैती ब्रह्मज्ञान तथा सांख्योंका द्वैती ज्ञान दोनों यद्यपि मूलमें भिन्न भिन्न हों, तथापि केवल ज्ञान-दृष्टिसे देखनेपर जान पड़ेगा, कि ये दोनों मार्ग अपने पहलेके यज्ञ-याग आदि कर्म-मार्गके एकहीसे विरोधी थे। अतएव यह प्रश्न स्वभावतः उत्पन्न हुआ, कि कर्मका ज्ञानसे किस प्रकार मेल किया जाय ? इसी कारणसे उपनिषत्- कालहीमें इस विषयपर दो दल हो गये थे। उनमेंसे बृहदारण्यकादि उपनिषद् तथा सांख्य यह कहने लगे, कि कर्म और ज्ञानमें नित्य विरोध है, इसलिये ज्ञान हो जानेपर कर्मका त्याग करना प्रशस्तही नहीं, किंतु आवश्यकभी है। इसके विरुद्ध ईशावास्यादि अन्य उपनिषद् यह प्रतिपादन करने लगे, कि ज्ञान हो जानेपरभी कर्म छोड़ा नहीं जा सकता, वैराग्यसे बुद्धिको निष्काम करके जगत्में व्यवहारकी सिद्धिके लिये ज्ञानी पुरुषको सब कर्म करनेही चाहिये। इन उपनिषदोंके

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४३ भाष्योंमेंसे इस भेदको निकाल डालनेका प्रयत्न किया गया है। परंतु गीतारहस्यके ग्यारहवे प्रकरणके अंतमें किये गये विवेचनसे यह बात ध्यानमे आ जाएगी, कि शांकर-भाष्यमें ये साप्रदायिक अर्थ खीचातानीमे किये गये हैं, और इसलिये इन उपनिषदोंपर स्वतंत्र रीतिसे विचार करते समय वे अर्थ ग्राह्य नही माने जा सकते। यह नहीं कि, केवल यज्ञयागादि कर्म तथा ब्रह्मज्ञानहीमे मेल करनेका प्रयत्न किया गया हो; किंतु मैत्र्युपनिषदके विवेचनसे यह बातभी साफ़ साफ़ प्रकट होती है, कि कापिलसांख्यमे पहले पहल स्वतंत्र रीतिसे प्रादुर्भूत क्षराक्षरज्ञानकी तथा उप- निषदोंके ब्रह्मज्ञानकी एकवाक्यता - जितनी हो सकती थी - करनेकाभी प्रयत्न उसी समय आरंभ हुआ था। बृहदारण्यकादि प्राचीन उपनिषदोमे कापिल-सांख्यज्ञानको कुछ महत्त्व नहीं दिया गया है। परंतु मैत्र्युपनिषदमें सांख्योंकी परिभाषाका पूर्णतया स्वीकार करके यह कहा है, कि अंतमे एक परब्रह्महीमे सांख्योके चौबीस तत्त्व निर्मित हुए हैं। तथापि कापिल-सांख्यशास्त्रभी वैराग्य-प्रधान अर्थात् कर्मके विरुद्ध है। तात्पर्य यह है, कि प्राचीन कालमेंही वैदिक धर्मके तीन दल हो गये थे - ( १ ) केवल यज्ञयाग आदि कर्म करनेका मार्ग; ( २ ) ज्ञान तथा वैराग्यसे कर्म- संन्यास करना, अर्थात् ज्ञाननिष्ठा अथवा सांख्यमार्ग; और ( ३ ) ज्ञान तथा वैराग्य- बुद्धिहीसे नित्य कर्म करनेका मार्ग, अर्थात् ज्ञानकर्म-समुच्चय-मार्ग। इनमेंसे ज्ञानमार्ग- हीसे आगे चलकर दो अन्य शाखाएँ - योग और भक्ति - निर्मित हुई हैं। छांदो- ग्यादि प्राचीन उपनिषदोंमें यह कहा है, कि परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मचिंतन अत्यंत आवश्यक है; और यह चिंतन, मनन तथा ध्यान करनेके लिये चित्त एकाग्र होना चाहिये; और चित्तको स्थिर करनेके लिये परब्रह्मका कोई न कोई सगुण प्रतीक पहले नेत्रोके सामने रखना पड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मोपासना करते रहनेसे चित्तकी जो एकाग्रता हो जाती है, उसीको आगे विशेष महत्त्व दिया जाने लगा और चित्तनिरोधरूपी योग एक जुदा मार्ग हो गया; और जब सगुण प्रतीकके बदले परमेश्वरके मानवरूपधारी व्यक्त प्रतीककी उपासनाका आरंभ धीरे धीरे होने लगा, तब अंतमे भक्ति-मार्ग उत्पन्न हुआ। यह भक्तिमार्ग औपनिषदिक ज्ञानसे अलग, बीचहीमे स्वतंत्र रीतिसे प्रादुर्भूत नहीं हुआ है; और न भक्तिकी कल्पना हिंदुस्थानमे किसी अन्य देशसे लाई गई है। सब उपनिषदोंका अवलोकन करनेसे यह क्रम दीख पड़ता है, कि पहले ब्रह्मचिंतनके लिये यज्ञके अंगोंकी अथवा ॐकारकी उपासना थी; आगे चलकर रुद्र, विष्णु आदि वैदिक देवताओंकी, अथवा आकाश आदि सगुण व्यक्त-ब्रह्म-प्रतीकोंकी, उपासनाका आरंभ हुआ; और अंतमें इसी हेतुसे अर्थात् ब्रह्मप्राप्तिके लियेही राम, नृसिंह, श्रीकृष्ण, वासुदेव आदिकी भक्ति, अर्थात् एक प्रकारकी उपासना, जारी हुई है। उपनिषदोंकी भाषामे यह बातभी साफ़ साफ़ मालूम होती है, कि उनमेंसे योगतत्त्वादि योग- विषयक उपनिषद् अथवा नृसिंहतापनी, रामतापनी आदि भक्तिविषयक उपनिषद्

५४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

छांदोग्यादिकी अपेक्षा अर्वाचीन है। अतएव ऐतिहासिक दृष्टिसे यह कहना पड़ता है, कि छांदोग्यादि प्राचीन उपनिषदोंमे वर्णित कर्म, ज्ञान अथवा संन्यास, और ज्ञानकर्म-समुच्चय - इन तीनों दलोंका प्रादुर्भाव हो जानेपरही आगे योग-मार्ग और भक्ति-मार्गको श्रेष्ठता प्राप्त हुई है। परंतु योग और भक्ति, ये दोनों साधन यद्यपि उक्त प्रकारसे आगे श्रेष्ठ माने गये तथापि उनके पहलेके ब्रह्मज्ञानकी श्रेष्ठता उसमें कुछ कम नहीं हुई; और न उसका कम होना संभवही था। इसी कारण योग-प्रधान अथवा भक्ति-प्रधान उपनिषदोंमेंभी ब्रह्मज्ञानको भक्ति और योगका अंतिम साध्य कहा है। और ऐसा वर्णनभी कई स्थानोंमें पाया जाता है, कि जिन रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण तथा वासुदेव आदिकी भक्ति की जाती है, वेभी परमात्माके अथवा परब्रह्मके रूप हैं (मैत्र्यु. ७. ७; रामपू. १६; अमृतबिंदु २२ आदि)। सारांश वैदिक धर्ममें समय समयपर आत्मज्ञानी पुरुषोंने जिन धर्मांगोंको प्रवृत्त किया है, वे प्राचीन समयमे प्रचलित धर्मांगोंसेही प्रादुर्भूत हुए हैं; और नये धर्मांगोंका प्राचीन समयमें प्रचलित धर्मांगोंके साथ मेल करा देनाही वैदिक धर्मकी उन्नतिको पहलेसे मुख्य उद्देश्य रहा है, तथा भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनेके इसी उद्देश्यको स्वीकार करके, आगे चलकर स्मृतिकारोंने आश्रमव्यवस्था-धर्मका प्रतिपादन किया है। भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनेकी इस प्राचीन पद्धतिपर ध्यान दिया जाता है तब यह कहना सयुक्तिक नहीं प्रतीत होता, कि उक्त पूर्वापर पद्धतिको छोड़ केवल गीता-धर्मही अकेला प्रवृत्त हुआ होगा। ब्राह्मण-ग्रंथोंके यज्ञ-यागादि कर्म, उपनिषदोंका ब्रह्मज्ञान, कपिल-सांख्य, चित्त- निरोधस्पी योग तथा भक्ति, यही वैदिक धर्मके मुख्य मुख्य अंग हैं, और इनकी उत्पत्तिके क्रमका सामान्य इतिहास ऊपर लिखा गया है। अब इस बातका विचार किया जाएगा, कि गीतामें इन सब धर्मांगोंका जो प्रतिपादन किया गया है, उसका मूल क्या है? - अर्थात् वह प्रतिपादन साक्षात् भिन्न भिन्न उपनिषदोंसे गीतामें लिया गया है अथवा बीचमें एक-आध सीढ़ी और है। केवल ब्रह्मज्ञानके विवेचनके समय कठ आदि उपनिषदोंके कुछ श्लोक गीतामें ज्यों-के-त्यों दिये गये हैं; और ज्ञान- कर्म-समुच्चय-पक्षका प्रतिपादन करते समय जनक आदिके औपनिषदिक उदाहरणभी दिये गये हैं। इससे प्रतीत होता है, कि गीता-ग्रंथ साक्षात् उपनिषदोंके आधारपर रचा गया होगा। परंतु गीताहीमे गीता-धर्मकी जो परंपरा दी गई है, उसमें तो उपनिषदोंका कहींभी उल्लेख नहीं मिलता। जिस प्रकार गीतामें द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानमय यज्ञको श्रेष्ठ माना है (गीता ४ ३३), उसी प्रकार छांदोग्योप- निषदमेभी एक स्थानपर यह कहा है, कि मनुष्यका जीवन एक प्रकारका यज्ञही है (छां. ३. १६, १७)। और इस प्रकारके यज्ञकी महत्ताका वर्णन करते हुए यहभी कहा है, कि "यह यज्ञ-विद्या घोर आंगिरस नामक ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको बतलाई।" उस देवकीपुत्र कृष्ण तथा गीताके श्रीकृष्णको एकही व्यक्ति माननेके

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४५ लिये कोई प्रमाण नहीं है। परंतु यदि कुछ देरके लिए दोनोंको एकही व्यक्ति लें; तोभी स्मरण रहे, कि ज्ञान-यज्ञको श्रेष्ठ माननेवाली गीतामें घोर आंगिरसका कहींभी उल्लेख नहीं किया गया है। इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषदमे यह बात प्रकट है, कि जनकका मार्ग यद्यपि ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक था, तथापि उस समय इस मार्गमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था। अतएव भक्तियुक्त ज्ञान-कर्म- समुच्चय पंथकी सांप्रदायिक परंपरामे जनककी गणना नही की जा सकती, और न वह गीतामें की गई है। गीताके चौथे अध्यायके आरंभमें कहा है (गीता ४. १-३), कि युगके आरंभमें भगवानने पहले विवस्वानको, विवस्वानने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको गीता-धर्मका उपदेश किया था; परंतु कालके हेरफेरसे उसका लोप हो जानेके कारण वह फिरसे अर्जुनको बतलाना पड़ा। गीता-धर्मकी परंपराका ज्ञान होनेके लिये ये श्लोक अत्यंत महत्त्वके हैं, परंतु टीकाकारोंने शब्दार्थ बतलानेके अतिरिक्त उनका विशेष रीतिसे स्पष्टीकरण नहीं किया है; और कदाचित् ऐसा करना उन्हे इष्टभी न रहा हो। क्योकि, यदि कहा जाय, कि गीता-धर्म मूलमें किसी एक विशिष्ट पंथका है; तो उससे अन्य धार्मिक पंथोंको कुछ-न-कुछ गौणता प्राप्त हो जाती है। परंतु हमने गीतारहस्यके आरंभमे तथा गीताके चौथे अध्यायके प्रथम दो श्लोकोंकी टीकामे प्रमाणसहित इस बातका स्पष्टीकरण कर दिया है, कि गीतामें वर्णित परंपराका मेल उस परंपराके साथ पूरा दीख पडता है, कि जो महाभारतान्तर्गत नारायणीयोपाख्यानमे वर्णित भागवत धर्मकी परंपरा में अंतिम त्रेतायुग-कालीन परंपरा है। भागवत धर्म तथा गीता-धर्मकी परंपराकी एकताको देखकर कहना पड़ता है कि गीता-ग्रंथ भागवत-धर्मीय है; और यदि इस विषयमें कुछ शंका हो, तो महाभारतमें दिये गये वैशंपायनके इस वाक्य - "गीतामें भागवत धर्मही बतलाया गया है" (मभा. शां. ३४६. १०) से वह दूर हो जाती है। इस प्रकार जब यह सिद्ध हो गया, कि गीता औपनिषदिक ज्ञानका अर्थात् वेदान्तका स्वतंत्र ग्रंथ नही है, उसमे भागवत धर्मका प्रतिपादन किया गया है; तब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नही, कि भागवत धर्मसे अलग करके गीताकी जो चर्चा की जाएगी, वह अपूर्ण तथा भ्रममूलक होगी। अतएव, भागवत धर्म कब उत्पन्न हुआ और उसका मूल स्वरूप क्या था, इत्यादि प्रश्नोंके विषयमें जो बाते इस समय उपलब्ध हैं, उनकाभी विचार संक्षेपमें यहाँ किया जाना चाहिये। गीतारहस्यमें हम पहलेही कह चुके हैं, कि इस भागवतधर्मकेही नारायणीय, सात्वत, पांचरात्र-धर्म आदि अन्य नाम हैं। उपनिषत्कालके बाद और बुद्धके पहले जो वैदिक धर्म-ग्रंथ बने, उनमेंसे अधिकांश ग्रंथ लुप्त हो गये हैं, इस कारण भागवत धर्मपर वर्तमान समयमे जो ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनमेंसे, गीताके अतिरिक्त, मुख्य ग्रंथ येही हैं - महाभारतान्तर्गत शांतिपर्वके अंतिम अठारह अध्यायोंमे निरूपित नारायणीयोपाख्यान (मभा. शां. गी. र. ३५

३३४-३५१). शाण्डिल्य-सूत्र, भागवत-पुराण, नारद-पांचरात्र, नारद-सूत्र, तथा रामानुजाचार्य आदिके ग्रंथ। इनमें रामानुजाचार्यके ग्रंथ तो प्रत्यक्षमें सांप्रदायिक दृष्टिसेही, अर्थात् भागवतधर्मके विशिष्टाद्वैत वेदान्तसे मेल करनेके लिये विक्रम संवत् १२३५ में (शालिवाहन शकके लगभग बारहवें शतकमे) लिखे गये हैं। अतएव भागवत धर्मका मूल-स्वरूप निश्चित करनेके लिये इन ग्रंथोंका सहारा नहीं लिया जा सकता; और यही बात मध्वादि के अन्य वैष्णव ग्रंथोंकीभी है। श्रीमद्भागवतपुराण इसके पहलेका है। परंतु इस पुराणके आरम्भमेंही यह कथा है (भाग. स्क. १ अ. ४, ५), कि जब व्यासजीने देखा, कि महाभारतमे, अत- एव गीतामेंभी, नैष्कर्म्य-प्रधान भागवत धर्मका जो निरूपण किया गया है, उसमे भक्तिका जैसा चाहिये वैसा वर्णन नहीं है; और "भक्तिके बिना केवल नैष्कर्म्य शोभा नहीं पाता", तब उनका मन कुछ उदास और अप्रसन्न हो गया; एवं अपने मनकी उस तलमलाहटको दूर करनेके लिये नारदजीकी सूचनासे उन्होंने भक्तिके माहात्म्यका प्रतिपादन करनेवाले भागवतपुराणकी रचना की। इस कथाका ऐतिहासिक दृष्टिसे विचार करनेपर दीख पड़ेगा, कि मूल भागवत धर्ममें अर्थात् भारतान्तर्गत भागवत धर्ममें नैष्कर्म्यको जो श्रेष्ठता दी गयी थी, वह जब समयके हेरफेरसे कम होने लगी; और उसके बदले जब भक्तिको प्रधानता दी जाने लगी, तब भागवत धर्मके इस दूसरे स्वरूपका (अर्थात् भक्तिप्रधान भागवत धर्मका) प्रतिपादन करनेके लिये यह भागवतपुराणरूपी मेवा पीछे तैयार किया गया है। नारदपंचरात्र-ग्रंथभी इसी प्रकार का अर्थात् केवल भक्ति-प्रधान है; और उसमे द्वादश-स्कंधोंके भागवतपुराणका तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण, विष्णुपुराण, गीता और महाभारतका नामोल्लेख कर स्पष्ट निर्देश किया गया है (ना. प. २. ७. २८-३२; ३. १४. ३३; ४. ३. १५४)। इसलिये यह प्रकट है, कि भागवत धर्मके मूल-स्वरूपका निर्णय करनेके लिये इस ग्रंथकी योग्यता भागवत- पुराणसेभी कम दर्जेकी है। नारदसूत्र तथा शांडिल्य-सूत्र कदाचित् नारदपंचरात्र- सेभी कुछ प्राचीन हों; परंतु नारद-सूत्रमे व्यास और शुक (ना. सू ८३) का उल्लेख है, इसलिए वह भारत और भागवतके बादका है; और शांडिल्यसूत्रमें भगवद्गीताके श्लोक ही उद्धृत किये गये हैं (शा सू. ९. १५ और ८३)। अतएव यह सूत्र यद्यपि नारद-सूत्र (ना. सू ८३) से प्राचीनभी हो; तथापि उसमे संदेह नहीं, कि यह गीता और महाभारतके अनन्तर का है। अतएव, भागवत-धर्मके मूल तथा प्राचीन स्वरूपका निर्णय अंतमे भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यानके आधारसेही करना पड़ता है। भागवतपुराण (भाग १. ३. २४) और नारद-पंचरात्र (ना पं. ४. ३ १५६-१५९; ४. ८ ८१) ग्रंथोमे बुद्धको विष्णुका अवतार कहा है। परंतु नारायणीयाख्यानमें वर्णित दशावतारोंमे बुद्धका समावेश नहीं किया गया है - पहला अवतार हंसका और आगे कृष्णके बाद एकदम कल्कि अवतार

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५४७ बतलाया है (महा. शा. ३३९. १००)। इससे यही सिद्ध होता है, कि नारा- यणीयाख्यान भागवतपुराणसे और नारद-पंचरात्रसे प्राचीन है। इस नारायणीया- ख्यानमे यह वर्णन है, कि नर तथा नारायण (जो परब्रह्महीके अवतार हैं) नामक दो ऋषियोंने नारायणीय अर्थात् भागवत धर्मको पहले पहल जारी किया और उनके कहनेसे जब नारद ऋषि श्वेतद्वीपको गये, तब वहाँ स्वयं भगवान्ने नारदको इस धर्मका प्रथम उपदेश किया। भगवान् जिस श्वेतद्वीपमें रहते हैं, वह क्षीर-समुद्रमें है; और क्षीर-समुद्र मेरुपर्वतकी उत्तरमे है; इत्यादि नारायणी- याख्यानकी बाते प्राचीन और पौराणिक ब्रह्मांडवर्णनके अनुसारही हैं; और इस विषयमें हमारे यहाँ किसीको कुछ कहनाभी नहीं है। परंतु वेवर नामक पश्चिमी संस्कृतज्ञ पंडितने इसी कथाका विपर्यास करके यह दीर्घ शंका की थी, कि भागवत धर्ममें वर्णित भक्ति-तत्त्व श्वेतद्वीपसे-अर्थात् हिंदुस्थानके बाहरके किसी अन्य देशसे-हिंदुस्थानमें लाया गया है; और भक्तिका यह तत्त्व इस समय ईसाई धर्मके अतिरिक्त और कहींभी प्रचलित नहीं था; इसलिए ईसाई देशोंसेही भक्तिकी कल्पना भागवत धर्मियोंको सूझी है! परंतु पाणिनीको वासुदेव-भक्तिका तत्त्व मालूम था; और बौद्ध तथा जैन धर्ममेंभी भागवतधर्म तथा भक्तिके उल्लेख पाये जाते हैं; एवं यह बातभी निर्विवाद है, कि पाणिनी और बुद्ध दोनों ईसाके पहले हुए थे। इसलिये अब पश्चिमी पंडितोंनेभी निश्चित किया है कि वेबर साहबकी उपर्युक्त शंका निराधार है। ऊपर यह बतला दिया गया है, कि भक्तिरूप धर्मका उदय हमारे यहाँ ज्ञान-प्रधान उपनिषदोंके अनंतर हुआ है। इससे यह बात निर्विवाद प्रकट होती है, कि ज्ञान-प्रधान उपनिषदोंके बाद तथा बुद्धके पहले वासुदेव- भक्तिसंबंधी भागवत धर्म उत्पन्न हुआ है। अब प्रश्न केवल इतनाही है, कि वह बुद्धके कितने शतक* पहले हुआ? अगले विवेचनमे यह बात ध्यानमे आ जाएगी, कि यद्यपि उक्त प्रश्नका पूर्णतया निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता; तथापि स्थूल-दृष्टिसे उस कालका अंदाज करना कुछ असंभव नहीं है। गीता (गी. ४. २) में यह कहा है, कि श्रीकृष्णने जिस भागवत धर्मका उपदेश अर्जुनको किया है, उसका पहले लोप हो गया था। भागवत धर्मके तत्त्वज्ञानमें


  • भक्तिमान् (पाली = भत्तिमा) शब्द थेरगाथा (श्लो. ३७०) में मिलता है; और एक जातकमेंभी भक्ति का उल्लेख किया गया है। इसके सिवा, प्रसिद्ध फ्रेंच पाली-पंडित सेनार्त (Senart) ने 'बौद्ध धर्मका मूल' इस विषयपर सन १९०९ में एक व्याख्यान दिया था, जिसमें स्पष्ट रूपसे यह प्रतिपादन किया है, कि भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है। "No one will claim to derive from Buddhism' Vishnuism or the Yoga. Assuredly, Buddhism is the borrower",... "To sum up, if there had not previously, existed a religion made up of the doctrines of Yoga, of Vishnuite legends, of devo- tion to Vishnu-Krishna, worshipped under the title of Bhagavata

५४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वरको वासुदेव, जीवको संकर्षण, मनको प्रद्युम्न तथा अहंकारको अनिरुद्ध कहा है। इनमेंसे वासुदेव तो स्वयं श्रीकृष्णहीका नाम है; संकर्षण उनके ज्येष्ठ भ्राता बलरामका नाम है; तथा प्रद्युम्न और अनिरुद्ध श्रीकृष्णजीके पुत्र और पौत्रके नाम हैं। इसके सिवा इस धर्मका जो दूसरा नाम 'सात्वत' भी है, वह उस यादव-जातिका नाम है, जिसमें श्रीकृष्णजीने जन्म लिया था। इससे यह बात प्रकट होती है, कि जिस कुल तथा जातिमें श्रीकृष्णजीने जन्म लिया था, उसमें यह धर्म प्रचलित हो गया था; और तभी उन्होंने अपने प्रिय मित्र अर्जुनको उसका उपदेश किया होगा - और यही बात पौराणिक कथाओंमेंभी कही गई है। यहभी कथा प्रचलित है, कि श्रीकृष्णजीके साथही सात्वत जातिकाभी अंत हो गया। इस कारण श्रीकृष्णके बाद मान्वत जातिमें इस धर्मका प्रसार होनाभी संभव नहीं था। भागवतधर्मके भिन्न भिन्न नामोंके विषयमें इस प्रकारकी ऐतिहासिक उपपत्ति बतलाई जा सकती है, कि जिस धर्मको श्रीकृष्णजीने प्रवृत्त किया था, वह उनके पहले कदाचित् नारायणीय या पांचरात्र नामोंमें न्यूनाधिक अंशोंमें प्रचलित रहा होगा; और आगे सात्वत जातिमें उसका प्रसार होनेपर उसे 'सात्वत' नाम प्राप्त हुआ होगा। तदनंतर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको नर-नारायणके अवतार मानकर लोग इस धर्मको 'भागवत धर्म' कहने लगे होंगे। इस विषयके संबंधमें यह माननेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि तीन या चार भिन्न भिन्न श्रीकृष्ण हो चुके हैं; और उनमेंसे हर एकने इस धर्मका प्रचार करते समय अपनी ओरसे कुछ-न-कुछ सुधार करनेका प्रयत्न किया है - वस्तुतः ऐसा माननेके लिए कोई प्रमाणभी नहीं है। मूल धर्ममें न्यूनाधिक परिवर्तन हो जानेके कारणही यह कल्पना उत्पन्न हो गई है। बुद्ध, ईसा तथा मुहम्मद तो अपने अपने धर्मके स्वयं एकही एक संस्थापक हो गये हैं; और आगे उनके धर्मोंमें भले-बुरे अनेक परिवर्तनभी हो गये हैं। परंतु इससे कोई यह नहीं मानता, कि बुद्ध, ईसा या मुहम्मद अनेक हो गये। इसी प्रकार यदि मूल भागवत धर्मको आगे चलकर भिन्न भिन्न स्वरूप प्राप्त हो गये या श्रीकृष्णजीके विषयमें आगे भिन्न भिन्न कल्पनाएँ रूढ हो गईं, तो यह कैसे माना जा सकता है, कि उतनेही भिन्न Buddhism would not have come to birth at all." मेसर्सका यह लेख पूनेसे प्रकाशित होनेवाले The Indian Interpreter नामक मिशनरी त्रैमासिक पत्र अक्तूबर १९०९ और जनवरी १९१० के अंकोंमें प्रसिद्ध हुआ है; और ऊपर दिये गये वाक्य जनवरीके अंकके १३३ तथा १३८ पृष्ठों में हैं। डॉ. बुल्हरनेभी कहा है - The ancient Bhagavta, Satvata or Pancharatra sect devoted to the worship of Narayana and his defied teacher Krishna-Devakiputra dates from a period long anterior to the rise of Jainas the 8th Century B. C." -- Indian Antiquary Vol. XXIII. (1894), P. 248. इस विषयका अधिक विवेचन आगे चलकर इसी परिशिष्ट प्रकरणके छठें भागमें किया गया है।

भिन्न श्रीकृष्णभी हो गये ? हमारे मतानुसार ऐसा माननेके लिये कोई कारण नही है। कोईभी धर्म लीजिये, समयके हेरफेरमे उसका रूपान्तर हो जाना बिलकुल स्वाभाविक है, उसके लिये इस बातकी आवश्यकता नही, कि भिन्न भिन्न कृष्ण, बुद्ध या ईसा मसीह माने जावें।* कुछ लोग, और विशेषतः कुछ कुछ पश्चिमी तर्कज्ञानी - यह किया करते हैं, कि श्रीकृष्ण, यादव और पांडव, तथा भारतीय युद्ध आदि ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं हैं, ये सब कल्पित कथाएँ हैं; और कुछ लोगोंके मतमें तो महाभारत अध्यात्म विषयका एक बृहत् रूपकही है। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथोंके प्रमाणोंको देखकर किसीभी निष्पक्षपाती मनुष्यको यह मानना पड़ेगा, कि उक्त शंकाएँ बिलकुल निराधार हैं। यह बात निर्विवाद है, कि इन कथाओंके मूलमे इतिहासहीका आधार है। सारांश, हमारा मत यह है, कि श्रीकृष्ण चार-पाँच नहीं हुए, वे केवल एकही ऐतिहासिक पुरुष थे। अब श्रीकृष्णजीके अवतार-कालपर विचार करते समय ग ब. चिंतामणराव वैद्यने यह प्रतिपादन किया है, कि श्रीकृष्ण, यादव, पांडव तथा भारतीय युद्धका एकही काल - अर्थात् कलियुगका आरंभ-काल न होकर पुराणगणनाके अनुसार उस कालसे अबतक पाँच हजारसेभी अधिक वर्ष बीत चुके हैं। और यही श्रीकृष्णजीके अवतारका यथार्थ काल है।† परंतु पांडवोंसे लगाकर शक-काल तकके राजाओंकी पुराणोंमें वर्णित पीढ़ियोंसे इस कालका मेल नहीं दीख पड़ता। अतएव भागवत तथा विष्णु-पुराणमे जो यह वचन है, कि “परीक्षित राजाके जन्मसे नंदके अभिषेकतक १११५ अथवा १०१५ वर्ष होते हैं”


  • श्रीकृष्णके चरित्रमें पराक्रम, भक्ति और वेदान्तके अतिरिक्त गोपियोंकी रासक्रीड़ाका समावेश होता है; और ये बातें परस्पर-विरोधी हैं। इसलिये आजकल कुछ विद्वान् यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि महाभारतका कृष्ण भिन्न, गीताका भिन्न और गोकुलका कन्हैयाभी भिन्न है। डॉ. भांडारकरने अपने वैष्णव, शैव आदि पंथ संबंधी अंग्रेजी ग्रंथमे इसी मतको स्वीकार किया है। परंतु हमारे मतमें यह ठीक नही है। यह बात नही, कि गोपियोंकी कथामे जो शृंगार-वर्णन है, वह बादमे न आया हो। परंतु केवल उतनेहीके लिये यह माननेकी कोई आवश्यकता नही, कि श्रीकृष्ण नामके कई भिन्न भिन्न पुरुष हो गये; और इसके लिये कल्पनाके सिवा कोई अन्य आधारभी नहीं है। इसके सिवा, यहभी नहीं, कि गोपियोंकी कथाका प्रचार पहले भागवत-कालहीमें हुआ हो; किंतु शककालके आरंभमें यानी विक्रम संवत् १३६ के लगभग अश्वघोष-विरचित 'बुद्धचरित' (४. १४) में और भास कविकृत 'बालचरित' नाटक (३ २) मेभी गोपियोंका उल्लेख किया गया है। अतएव इस विषयमे हमें डॉ. भांडारकरके कथनसे चिंतामणराव वैद्यका मत अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। † रावबहादुर चिंतामणराव वैद्यका यह मत उनके महाभारतके टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथमें है। इसके सिवा इसी विषयपर आपने सन् १९१८ में डेक्कन कॉलिज एनिवर्सरीके समय जो व्याख्यान दिया था उसमेंभी इस बातका विवेचन किया था।

५५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (भाग. १२. २. २६; विष्णु. ४. २४. ३२)। उसीके आधारपर विद्वानोंने अब यह निश्चित किया है, कि ईसाई सनके लगभग १४०० वर्ष पहले भारतीय युद्ध और पांडव हुए होंगे। अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार-कालभी यही है, और इस कालको स्वीकारकर लेनेपर यह बात सिद्ध होती है, कि श्रीकृष्णने भागवत धर्मको, ईसासे लगभग १४०० वर्ष पहले, अथवा बुद्धसे ८०० वर्ष पहले-प्रचलित किया होगा। इसपर कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं, कि श्रीकृष्ण तथा पांडवोंके ऐति- हासिक पुरुष होनेमें कोई संदेह नहीं, परंतु श्रीकृष्णके जीवन-चरित्रमें उनके अनेक रूपान्तर दीख पड़ते हैं-जैसे श्रीकृष्ण नामक एक क्षत्रिय योद्धाको पहले महापुरुषका पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुका पद मिला और धीरे धीरे अन्तमें पूर्ण परब्रह्मका रूप ब्राह्मणोंने प्राप्त हो गया-इन सब अवस्थाओंमें आरंभसे अंततक बहुत-सा काल बीत चुका होगा, इसीलिये भागवत-धर्मके उदयका तथा भारतीय युद्धका एक-ही काल नहीं माना जा सकता। परंतु यह आक्षेप निरर्थक है। "किसे देव मानना चाहिये; और किसे नहीं मानना चाहिये" इस विषयपर आधुनिक तर्कज्ञोंकी समझमें तथा दो-चार हज़ार वर्ष पहलेके लोगोंकी समझ (गीता १०. ४१) में बड़ा अंतर हो गया है। श्रीकृष्णके पहलेही बने हुए उपनिषदोंमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है (बृ. ४ ४. ६); और मैत्र्युपनिषदमें यह साफ़ साफ़ कह दिया है, कि रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण ये सब ब्रह्मही हैं (मैत्र्यु. ७. ३)। फिर श्रीकृष्णको परब्रह्मत्व प्राप्त होनेके लिये अधिक समय लगनेका कारण क्या है? इतिहासकी ओर देखनेसे विश्वसनीय बौद्ध ग्रंथोंमेंभी यह बात दीख पड़ती है, कि स्वयं अपनेको 'ब्रह्मभूत' (सेलसुत्त १४; थेरगाथा ८३१) कहलाता था, उसके जीवनकालहीमें उसे देवके सदृश सन्मान दिया जाता था और उसके स्वर्गस्थ होनेके बाद शीघ्र ही उसे 'देवाधिदेव' वा अथवा वैदिक धर्मके परमात्माका स्वरूप प्राप्त हो गया था, और उसकी पूजाभी हो गई थी। यही बात ईसा मसीहकीभी है। यह बात सच है कि बुद्ध तथा ईसाके समान श्रीकृष्ण संन्यासी नहीं थे, और न भागवत धर्मही निर्वाण-प्रधान है। परंतु केवल इसी आधारपर, बौद्ध तथा ईसाई धर्मके मूल पुरुषोंके समान, भागवत धर्मप्रवर्तक श्रीकृष्णकोभी पहलेहीसे ब्रह्म अथवा देवका स्वरूप प्राप्त होनेमें किसी बाधाके उपस्थित होनेका कारण दीख नहीं पड़ता। इस प्रकार श्रीकृष्णका समय निश्चित कर लेनेपर, उसी कालको भागवत धर्मका उदयकाल माननाभी प्रशस्त तथा सयुक्तिक है, परंतु सामान्यतः पश्चिमी पंडित ऐसा करनेमें जो हिचकिचाते हैं, उसका कारण कुछ औरही है। इन पंडितोंमेंसे अधिकांशका अबतक यही मत है कि खुद ऋग्वेदकाही काल ईसाके पहले लगभग १२०० वर्ष या बहुत हुआ तो २००० वर्षोंसे अधिक प्राचीन नहीं है। अतएव उन्हें अपनी दृष्टिसे यह कहना असम्भव प्रतीत होता है कि भक्ति-प्रधान भागवत धर्म

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५१ ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रचलित हुआ होगा; क्योंकि वैदिक धर्मसाहित्यमें यह क्रम निर्विवाद सिद्ध है, कि ऋग्वेदके बाद यज्ञयाग आदि कर्म-प्रतिपादक यजुर्वेद और ब्राह्मण-ग्रंथ बने। तदनंतर ज्ञान-प्रधान उपनिषद् और सांख्यशास्त्र निर्मित हुए; और अंतमें भक्ति-प्रधान ग्रंथ रचे गये; और केवल भागवत धर्मके ग्रंथोंका अवलोकन करनेसेभी स्पष्ट प्रतीत होता है, कि औपनिषदिक ज्ञान, सांख्यशास्त्र, चित्त-निरोधरूपी योग आदि धर्मांग भागवत धर्मके उदयके पहलेही प्रचलित हो चुके थे। समय की मनमानी खींचातानी करनेपरभी यही मानना पड़ता है, कि ऋग्वेदके बाद और भागवत धर्मके उदयके पहले, उक्त भिन्न भिन्न धर्मांगोंका प्रादुर्भाव तथा वृद्धि होनेके लिये, बीचमें कम-से-कम दस-बारह शतक अवश्य बीत गये होंगे। परंतु यदि माना जाए, कि भागवत धर्मको श्रीकृष्णने अपनेही समयमें – अर्थात् ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले – प्रवृत्त किया होगा; तो उक्त भिन्न भिन्न धर्मांगोंकी वृद्धिके लिये उक्त पश्चिमी पंडितोंके मतानुसार कुछभी उचित कालावकाश नहीं रह जाता। क्योंकि, ये पंडित लोग ऋग्वेद-कालहीको ईसासे पहले १५०० तथा २००० वर्षसे अधिक प्राचीन नहीं मानते, ऐसी अवस्थामें यह मानना पड़ता है, कि सौ या अधिकसे अधिक पांच-छः सौ वर्षके बादही भागवत धर्मका उदय हो गया। इसलिये उपर्युक्त कथनानुसार कुछ निरर्थक कारण बतला कर वे लोग श्रीकृष्ण और भागवत धर्मकी समकालीनताको नहीं मानते; और यह कहनेके लियेभी उद्यत हो गये हैं, कि भागवत धर्मका उदय बुद्धके बाद हुआ होगा। परंतु जैन तथा बौद्ध ग्रंथोंमेंही भागवत धर्मके जो उल्लेख पाये जाते हैं, उनसे तो यही बात स्पष्ट विदित होती है कि भागवत धर्म बुद्धसे प्राचीन है। अतएव डॉ. बुल्हरने* कहा है, कि 'भागवत धर्मका उदय-काल बौद्ध-कालके आगे हटानेके बदले, हमारे 'ओरायन' ग्रंथके प्रतिपादनके अनुसार ऋग्वेदादि ग्रंथोंका कालही पीछे हटाया जाना चाहिये। पश्चिमी पंडितोंने अटकलपच्चू अनुमानोंसे वैदिक ग्रंथोंके जो काल निश्चित किये हैं, वे भ्रममूलक हैं; अतः वैदिक-कालकी पूर्वमर्यादा ईसाके पहले ४५०० वर्षसे कम नहीं ली जा सकती, इत्यादि बातोंको हमने अपने 'ओरायन' ग्रंथमें वेदोंके उदगयन-स्थिति-दर्शक वाक्योंके आधारपर सिद्ध कर दिया है, और यही अनुमान अब अधिकांश पश्चिमी पंडितोंकोभी ग्राह्य है। इस प्रकार ऋग्वेद-कालको पीछे हटानेसे वैदिक धर्मके सब अंगोंकी वृद्धि होनेके लिये उचित कालावकाश मिल जाता है; और भागवत-धर्मोदय-कालको संकुचित करनेका प्रयोजनही नहीं रह जाता! परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने अपने (मराठी) "भारतीय ज्योतिःशास्त्र के इतिहास" में

  • डॉ. बुल्हरने Indian Antiquary, September 1894 (Vol. XXIII, pp. 238--244) में हमारे 'ओरायन' ग्रंथकी जो समालोचना की है, उसे देखो।

५५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह बतलाया है, कि ऋग्वेदके बाद ब्राह्मण आदि ग्रंथोंमें कृत्तिका प्रभृति नक्षत्रोंकी गणना है, इसलिये उनका काल ईसासे लगभग २५०० वर्ष पहले निश्चित करना पड़ता है। परन्तु हमारे देखनेमें यह अभीतक नहीं आया है कि उदगयन- स्थितिसे ग्रंथोंके कालका निर्णय करनेकी इस रीतिका प्रयोग उपनिषदोंके विषयमें किया गया हो। रामतापनीसरीखे भक्तिप्रधान तथा योगतत्त्वसरीखे योग-प्रधान उपनिषदोंकी भाषा और रचना प्राचीन नहीं दीख पड़ती, केवल इसी आधार- पर कई लोगों ने यह अनुमान किया है, कि सभी उपनिषद् प्राचीनतामें बुद्धकी अपेक्षा चार-पांच सौ वर्षसे अधिक नहीं हैं। परन्तु काल-निर्णयकी उपर्युक्त रीतिसे देखा जाए, तो यह समझ भ्रममूलक प्रतीत होगी। यह सच है, कि ज्योतिषकी रीतिसे सभी उपनिषदोंका काल निश्चित नहीं किया जा सकता; तथापि मुख्य मुख्य उपनिषदोंका काल निश्चित करनेके लिए इस रीतिका बहुत अच्छा उपयोग किया जा सकता है। भाषाकी दृष्टिसे देखा जाए, तो प्रो. मैक्समुलरका यह कथन है, कि मैत्र्युपनिषद् पाणिनीसेभी प्राचीन है * क्योंकि इस उपनिषदमें ऐसी कई छांदस शब्द-संधियोंका प्रयोग किया गया है, जो सिर्फ मैत्रायणी-संहितामेंही पायी जाती है; और जिनका प्रचार पाणिनीके समय बंद हो गया था। परंतु मैत्रायण्युपनिषद् कुछ सबसे पहला अर्थात् अति-प्राचीन उपनिषद् नहीं है। उसमें न केवल ब्रह्मज्ञान और सांख्यका मेलकर दिया है, किन्तु कई स्थानोंपर छांदोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य उपनिषदोंके वाक्य अथवा श्लोक भी उसमें प्रमाणार्थ उद्धृत किये गये हैं। हां, यह सच है, कि मैत्र्युप- निषदमें स्पष्ट रूपसे उक्त उपनिषदोंके नाम नहीं दिये गये हैं। परन्तु इन वाक्योंके पहले ऐसे परवाक्य-दर्शक पद रखे गये हैं, कि ' एवं ह्याह ' या ' उक्तं च ' ( = ऐसा कहा है ), इसलिये इस विषयमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि ये वाक्य दूसरे ग्रंथोंसे लिये गये हैं - स्वयं मैत्र्युपनिषत्कारके नहीं हैं, और अन्य उपनिषदोंको देखनेसे सहजही मालूम हो जाता है, कि ये वचन कहांसे उद्धृत किये हैं। अब इस मैत्र्युपनिषद्में कालरूपी अथवा संवत्सररूपी ब्रह्मका विवेचन करते समय यह वर्णन पाया जाता है कि " मघा नक्षत्रके आरंभसे क्रमशः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्रके आधे भागपर पहुँचनेतक ( मघाद्यं श्रविष्ठार्धमन्तं ) दक्षिणायन होता है, और सार्प अर्थात् आश्लेषा नक्षत्रसे विपरीत क्रमपूर्वक, अर्थात् आश्लेषा, पुष्य आदि क्रमसे, पीछे गिनते हुए धनिष्ठा नक्षत्रके आधे भागतक उत्तरायण होता है " ( मैत्र्यु ६. १४)। इसमें संदेह नहीं, कि उदगयन-स्थितिदर्शक ये वचन तत्कालीन उदगयन-स्थितिको लक्ष्य करकेही कहे गये हैं; और फिर उससे इस उप-

  • See Sacred Books of the East Series, Vol. XV, Intro, pp. xlviii--lii.

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५३ निषदका काल-निर्णयभी गणितकी रीतिसे सहजही किया जा सकता है। परंतु दीख पड़ता है, किसीनेभी इसका इस दृष्टिसे विचार नहीं किया है। मैत्र्युपनिषदमें वर्णित यह उदगयन-स्थिति वेदांगज्योतिषमें कही गई उदगयन-स्थितिके पहलेकी है। क्योंकि वेदांगज्योतिषमें यह बात स्पष्ट रूपसे दी गई है, कि उदगयनका आरंभ धनिष्ठा नक्षत्रके आरंभसे होता है, और मैत्र्युपनिषदमें उसका आरंभ 'धनिष्ठार्ध'से किया गया है। इस विषयमें मतभेद है, कि मैत्र्युपनिषदके 'श्रविष्ठा- र्धम्' शब्दमें जो 'अर्धम्' पद है, उसका अर्थ 'ठीक आधा' करना चाहिये; अथवा "धनिष्ठा और शततारकाके बीच किसी स्थानपर" करना चाहिये ? परंतु चाहे जो कहा जाए; इसमें तो कुछभी संदेह नहीं, कि वेदांगज्योतिषके पहलेकी उदगयन- स्थितिका वर्णन मैत्र्युपनिषदमें किया है; और वही उस समयकी स्थिति होनी चाहिये। अतएव यह कहना चाहिये, कि वेदांगज्योतिष-कालका उदगयन, मैत्र्युप- निषत्कालीन उदगयनकी अपेक्षा लगभग आधे नक्षत्रसे पीछे हट आया था। ज्योति- र्गणितसे यह सिद्ध होता है, कि वेदांगज्योतिषमें कही गई उदगयन-स्थिति ईसवी सनके लगभग १५०० या १४०० वर्ष पहलेकी है, * और आधे नक्षत्रसे उदगयनके पीछे हटनेमें लगभग ४८० वर्ष लग जाते हैं, इसलिये गणितसे यह बात निष्पन्न होती है, कि मैत्र्युपनिषद् ईसाके पहले १८८० से १६८० वर्षके बीच कभी-न-कभी बना होगा। और कुछ नहीं तो यह उपनिषद् निस्सन्देह वेदांगज्योतिषके पहलेका है। अब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि छांदोग्यादि जिन उपनिषदोंके अवतरण मैत्र्युपनिषदमें दिये गये हैं, वे उससेभी प्राचीन हैं। सारांश, इन सब ग्रंथोंके कालका निर्णय इस प्रकार हो चुका है, कि ऋग्वेद सन ईस्वीसे लगभग ४५०० वर्ष पहलेका है; यज्ञयाग आदि विषयक ब्राह्मण-ग्रंथ सन ईस्वीसे लगभग २५०० वर्ष पहलेके हैं; और छांदोग्य आदि ज्ञान-प्रधान उपनिषद् सन ईस्वीसे लगभग १६०० वर्ष पुराने हैं। अब यथार्थमें वे बातें अवशिष्ट नहीं रह जातीं, जिनके कारण पश्चिमी पंडित लोग भागवत धर्मके उदय-कालको आगेकी ओर हटा लानेका यत्न किया करते हैं; और श्रीकृष्ण तथा भागवत धर्मको गाय और बछड़ेकी नैसर्गिक जोड़ीके समान, एकही काल-रज्जुसे बांधनेमें कोई भयभी नहीं दीख पड़ता; एवं फिर बौद्ध ग्रंथकारों द्वारा वर्णित अथवा अन्य ऐतिहासिक स्थितियोंसेभी ठीक ठीक मेल हो जाता है। इसी समय वैदिक-कालकी समाप्ति हुई और सूत्र तथा स्मृति-कालका आरंभ हुआ है।

  • वेदांगज्योतिषका कालविषयक विवेचन हमारे Orion (ओरायन) नामक अंग्रेजी ग्रंथमें तथा पं. बा. शंकर बालकृष्ण दीक्षितके 'भारतीय ज्योति शास्त्रचा इतिहास' मराठी ग्रंथमें (पृ ८३-९४ तथा १२७-१३९) किया गया है। उससे इस बातकाभी विचार किया गया है, उदगयनसे वैदिक ग्रंथोंका कौन-सा काल निश्चित किया जा सकता है।

५५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त कालगणनासे यह बात स्पष्टतया विदित हो जाती है, कि भागवत धर्मका उदय ईसाके लगभग १४०० वर्ष पहले, अर्थात् बुद्धके लगभग सात-आठ सौ वर्ष पहले, हुआ है। यह काल बहुत प्राचीन है, तथापि यह ऊपर बतला चुके हैं कि ब्राह्मण-ग्रंथोंमें वर्णित कर्ममार्ग इससेभी अधिक प्राचीन है; और उपनिषदों तथा सांख्यशास्त्रमें वर्णित ज्ञानभी भागवत धर्मके उदयके पहले ही प्रचलित होकर सर्वमान्य हो गया था। ऐसी अवस्था में हमारे मनमें, यह कल्पना करना सर्वथा अनुचित है, कि उक्त ज्ञान तथा धर्मांगोंकी कुछ चिंता न करके श्रीकृष्णसरीखे ज्ञानी और चतुर पुरुषने अपना धर्म प्रवृत्त किया होगा; अथवा उनके प्रवृत्त करने परभी यह धर्म तत्कालीन राजर्षियों तथा ब्रह्मर्षियोंको मान्य हुआ होगा; और लोगोंमें उसका प्रसार हुआ होगा। ईसाने अपने भक्ति-प्रधान धर्मका उपदेश पहले पहल जिन यहूदी लोगोंको किया था, उनमें उस समय धार्मिक तत्त्वज्ञानका प्रसार नहीं हुआ था, इसलिये अपने धर्मका मेल तत्त्वज्ञानके साथ कर देनेकी उसे कोई आवश्यकता नहीं थी। केवल यह बतला देनेमें ईसाका धर्मोपदेश-संबंधी काम पूरा हो सकता था, कि पुरानी बाइबिलमें जिस कर्ममय धर्मका वर्णन किया गया है, हमारा यह भक्ति-मार्गभी उसीके लिये हुआ है; और उसने प्रयत्नभी केवल इतनाही किया है। परंतु ईसाई धर्मकी इन बातोंसे भागवत धर्मके इतिहासकी तुलना करने समय यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि जिन लोगोंमें तथा जिस समय भागवत धर्मका प्रचार किया गया, उस समयके वे लोग केवल कर्म-मार्गीही नहीं, किंतु ब्रह्मज्ञान तथा कपिल-सांख्यशास्त्रसेभी परिचित हो गये थे; और इन तीनों धर्मांगोंकी एकवाक्यता (मेल) करनाभी सीख चुके थे। ऐसे लोगोंसे यह कहना किसी प्रकार उचित नहीं हुआ होता, कि "तुम अपने कर्मकांड या औपनिषदिक और सांख्यज्ञानको छोड़ दो; और केवल श्रद्धापूर्वक भागवत धर्मको स्वीकार कर लो।" ब्राह्मण आदि वैदिक ग्रंथोंमें वर्णित और उस समयमें प्रचलित यज्ञयाग आदि कर्मोंका फल क्या है? क्या उपनिषदोंका या सांख्यशास्त्रका ज्ञान वृथा है? भक्ति और चित्त-निरोधरूपी योगका मेल कैसे हो सकता है? - इत्यादि उस समय स्वभावतः उपस्थित होनेवाले प्रश्नोंका जबतक ठीक ठीक उत्तर न दिया जाता, तब भागवत धर्मका प्रचार होनाभी संभव नहीं था। अतएव न्यायकी दृष्टिसे अब यही कहना पड़ेगा, कि भागवत धर्ममें आरम्भहीमें इन सब विषयोंकी चर्चा करना अत्यंत आवश्यक था, और महाभारतार्न्तगत नारायणीयोपाख्यानके देखनेसेभी यह सिद्धान्त दृढ़ हो जाता है। इस आख्यानमें भागवत धर्मके साथ औप- निषदिक ब्रह्मज्ञानका और सांख्य-प्रतिपादित क्षराक्षर-विचारका मेल कर दिया गया है, और यहभी कहा है, कि "चार वेद और सांख्य तथा योग, इन पांचोंका उसमें (भागवत धर्ममें) समावेश होता है, इसलिये उसे पांचरात्र-धर्म नाम प्राप्त हुआ है (मभा. शा. ३३९. १०३); और "वेदारण्यकसहित (अर्थात् उपनिषदोंकोभी

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५५ लेकर) ये सब (शास्त्र) परस्पर एक दूसरेके अंग हैं (मभा. शां. ३४८. ८२)। 'पाञ्चरात्र' शब्दकी यह निरुक्ति व्याकरणकी दृष्टिसे चाहे शुद्ध न हो, तथापि उससे यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि सब प्रकारके ज्ञानकी एकवाक्यता भागवत धर्ममें आरम्भहीसेकी गई थी। परंतु भक्तिके साथ अन्य सब धर्मांगोंकी एकवाक्यता करनाही भागवत धर्मकी प्रधान विशेषता नहीं है। यह नहीं, कि भक्तिके धर्मतत्त्वको पहले भागवत धर्महीने प्रवृत्त किया हो। ऊपर दिये हुए मैत्र्युपनिषदके (मैत्र्यु. ३. ३) वाक्यों से यह बात प्रकट है, कि रुद्रकी या विष्णुकी किसी न किसी स्वरूपकी भक्ति, भागवत धर्मका उदय होनेके पहलेही जारी हो चुकी थी; और यह भावनाभी पहलेही उत्पन्न हो चुकी थी, कि उपास्य कुछभी हो; वह ब्रह्महीका प्रतीक अथवा एक प्रकारका रूप है। यह सच है, कि रुद्र आदि उपास्योंके बदले भागवत धर्ममें वासुदेव उपास्य माना गया है; परंतु गीता तथा नारायणीयोपाख्यानमेंभी यह कहा है, कि भक्ति चाहे जिसकी की जाय; वह एक भगवान्‌हीके प्रति पहुँचती है; रुद्र और भगवान् भिन्न भिन्न नहीं हैं, (गीता ९. २३; मभा. शा. ३४१. २०-२६)। अतएव केवल वासुदेवभक्तिही भागवत धर्मका मुख्य लक्षण नहीं मानी जा सकती। जिस सात्वत-जातिमें भागवत धर्म प्रादुर्भूत हुआ, उस जातिके सात्यकि आदि पुरुष, परम भगवद्भक्त भीष्म और अर्जुन, तथा स्वयं श्रीकृष्णभी बड़े पराक्रमी एवं दूसरोंसे पराक्रमके कार्य करानेवाले हो गये हैं। अतएव अन्य भगवद्भक्तोंकोभी उचित था, कि वे इसी आदर्शको अपने सम्मुख रखें; और तत्कालीन प्रचलित चातुर्वर्ण्यके अनुसार युद्ध आदि सब व्यावहारिक कर्म करें - बस, यही मूल भागवत धर्मका मुख्य विषय था। यह बात नहीं, कि भक्तिके तत्त्वको स्वीकार करके वैराग्ययुक्त बुद्धिसे संसारका त्याग करनेवाले पुरुष उस समय बिलकुल ही न होंगे। परंतु, यह सात्वतोंके या श्रीकृष्णके भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व नहीं है। श्रीकृष्णजीके उपदेशका सार यही है, कि भक्तिसे परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर भगवद्भक्तको परमेश्वरके समान जगत्‌के धारण-पोषणके लिये सदा यत्न करते रहना चाहिये। उपनिषत्कालमें जनक आदिकोंनेभी यह निश्चित कर दिया था, कि ब्रह्मज्ञानी पुरुषके लियेभी निष्काम कर्म करना कोई अनुचित बात नहीं। परंतु उस समय उसमें भक्तिका समावेश नहीं किया गया था; और इसके सिवा ज्ञानोत्तर कर्म करना अथवा न करना हर एककी इच्छापर अवलंबित था - अर्थात् वैकल्पिक समझा जाता था (वे. सू. ३. ४. १५)। वैदिक धर्मके इतिहासमें भागवत धर्मने जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्मार्त-धर्मसे विभिन्न कार्य किया, वह यह है कि उस (भागवत धर्म) ने कुछ कदम आगे बढ़कर केवल निवृत्तिकी अपेक्षा निष्काम कर्म-प्रधान प्रवृत्ति-मार्ग (नैष्कर्म्य) को अधिक श्रेयस्कर ठहराया; और केवल ज्ञानसेही नहीं, किंतु भक्तिसेभी कर्मका उचित मेल कर दिया। इस धर्मके मूल प्रवर्तक नर और नारायण ऋषिभी इसी प्रकार सब

५५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र काम निष्काम बुद्धिसे किया करने थे; और महाभारत (मभा. उद्यो. ४८. २१, २२) में कहा है कि सब योगोंको उनके समान कर्म करनाही उचित है। नारायणीय आख्यानमें तो भागवत धर्मका लक्षण स्पष्ट बतलाया है, कि "प्रवृत्ति- लक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः" (मभा. शां. ३४७. ८१) - नारायणीय अथवा भागवत धर्म प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान है। नारायणीय या मूल भागवत धर्मका जो निष्काम प्रवृत्ति-तत्त्व है, उसीका नाम नैष्कर्म्य है, और यही मूल भागवत धर्मका मुख्य तत्त्व है। परंतु, भागवत-पुराणसे यह बात दीख पड़ती है; कि आगे कालांतरमें यह तत्त्व मंद होने लगा और इस धर्ममें तो वैराग्य-प्रधान वासुदेव-भक्ति श्रेष्ठ मानी जाने लगी। नारद-पंचरात्रमें भक्तिके साथ साथ मंत्रतंत्रोंकाभी समावेश भागवत धर्ममें कर दिया गया है। तथापि, भागवतहीमे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि ये सब इस धर्मके मूल स्वरूप नहीं हैं। क्योंकि, भागवत (भाग. १. ३. ८; ११. ४. ४६) मेंही यह कहा है, कि जहाँ नारायणीय अथवा सात्वत-धर्मके विषयमें कुछ कहनेका मौका आया है, वहाँ सात्वत-धर्म या नारायण ऋषिका धर्म (अर्थात् भागवत धर्म) 'नैष्कर्म्यलक्षण' है; और आगे यहभी कहा है, कि इस नैष्कर्म्य-धर्ममें भक्तिको उचित महत्त्व नहीं दिया गया था, इसलिये भक्ति-प्रधान भागवत-पुराण कहना पड़ा (भाग. १. ५. १२)। इससे यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि मूल भागवत धर्म नैष्कर्म्य-प्रधान अर्थात् निष्काम कर्म-प्रधान था; किंतु आगे समयके हेरफेरसे उसका स्वरूप बदलकर वह भक्ति-प्रधान हो गया। गीतारहस्यमें ऐसी ऐतिहासिक बातोंका विवेचन पहलेही हो चुका है, कि ज्ञान तथा भक्तिसे पराक्रमका सदैव संबंध रखनेवाले मूल भागवत धर्ममें और आश्रम-व्यवस्थारूपी स्मार्त-मार्गमें क्या भेद है? केवल संन्यास-प्रधान जैन और बौद्ध धर्मके प्रसारसे भागवत धर्मके कर्मयोगकी अवनति होकर उसे दूसराही स्वरूप अर्थात् वैराग्ययुक्त भक्ति-स्वरूप कैसे प्राप्त हुआ? और बौद्ध धर्मका ह्रास होनेके बाद जो वैदिक संप्रदाय प्रवृत्त हुए; उनमेंसे कुछने तो अंतमें भगवद्गीताहीको संन्यास-प्रधान, कुछने केवल भक्ति- प्रधान तथा कुछने विशिष्टाद्वैत-प्रधान स्वरूप कैसे दे दिया। उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचनसे यह बात समझमें आ जाएगी, कि वैदिक धर्मके सनातन प्रवाहमें भागवत धर्मका उदय कब हुआ? और पहले उसके प्रवृत्ति-प्रधान या कर्म-प्रधान रहनेपरभी आगे चलकर भक्ति-प्रधान स्वरूप एवं अंतमें रामानुजा- चार्यके समय विशिष्टाद्वैती स्वरूप कैसे प्राप्त हो गया। भागवत धर्मके इन भिन्न भिन्न स्वरूपोंमेंसे जो मूलारंभका अर्थात निष्काम कर्म-प्रधान स्वरूप है, वही गीता-धर्मका स्वरूप है। अब यहाँपर संक्षेपमें यह बतलाया जाएगा, कि उक्त प्रकारकी मूल गीताके कालके विषयमें क्या अनुमान किया जा सकता है? श्रीकृष्ण तथा भारतीय युद्धका काल यद्यपि एकही है, अर्थात सन ईसवीके पहले लगभग १४०० वर्ष है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता, कि भागवत धर्मके ये दोनों प्रधान ग्रंथ - मूल गीता तथा

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५५७ मूल भारत — उसी समय रचे गये होंगे । किसीभी धर्म-ग्रंथका उदय होनेपर तुरंतही उस धर्मपर ग्रंथ रचे नहीं जाते; और भारत तथा गीताके विषयमेंभी यही न्याय पर्याप्त होता है । वर्तमान महाभारतके आरंभमें यह कथा है, कि जब भारतीय युद्ध समाप्त हो चुका; और जब पांडवोंका पोता ( पौत्र ) जनमेजय सर्प-सत्र कर रहा था, तब वहाँ वैशंपायनने जनमेजयको पहले पहल गीतासहित भारत सुनाया था; और आगे जब वही सौतीने शौनकको सुनाया, तभीसे भारत प्रचलित हुआ । यह बात प्रकट है, कि सौती आदि पौराणिकोंके मुखसे निकलकर आगे भारतको काव्यमय ग्रंथका स्थायी स्वरूप प्राप्त होनेमें कुछ समय अवश्य बीत गया होगा । परंतु इस कालका निर्णय करनेके लिये अब कोई साधन उपलब्ध नहीं है । ऐसी अवस्थामें यदि यह मान लिया जाए, कि भारतीय युद्धके लगभग पांच सौ वर्षके भीतरही आर्ष महाकाव्यात्मक मूल भारत निर्मित हुआ होगा, तो कुछ विशेष साहसकी बात नहीं होगी । क्योंकि बौद्ध धर्मके ग्रंथ, बुद्धकी मृत्युके बाद, इससेभी जल्दी तैयार हुए हैं । • अब आर्ष महाकाव्यमें नायकका केवल पराक्रम बतला देनेसेही काम नहीं चलता; किंतु उसमें यहभी बतलाना पड़ता है, कि नायक जो कुछ करता है, वह उचित है या अनुचित ! इतनाही क्यों ? संस्कृतके अतिरिक्त अन्य साहित्योंमें जो उक्त प्रकारके महाकाव्य हैं, उनसेभी यही ज्ञात होता है, कि नायकके कार्योंके गुण-दोषोंका विवेचन करना आर्ष महाकाव्यका एक प्रधान भाग होता है । अर्वाचीन दृष्टिसे देखा जाए, तो कहना पड़ेगा, कि नायकोंके कार्योंका समर्थन केवल नीतिशास्त्रके आधारपर करना चाहिये । किंतु प्राचीन समयमें धर्म तथा नीतिमे पृथक् भेद नहीं माना जाता था, अतएव उक्त समर्थनके लिए धर्म-दृष्टिके सिवा अन्य मार्ग नहीं था। फिर यह बतला- नेकी आवश्यकता नही, कि जो भागवत धर्म भारतके नायकोको ग्राह्य हुआ था अथवा जो उन्हीके द्वारा प्रवृत्त किया गया था, उसी भागवत धर्मके आधारपर उनके कार्योंका समर्थन करनाभी आवश्यक था । इसके सिवा दूसरा कारण यहभी है, कि भागवत धर्मके अतिरिक्त तत्कालीन प्रचलित अन्य वैदिक धर्मपंथ न्यूनाधिक रीतिमे अथवा सर्वथा निवृत्ति-प्रधान थे, इसलिये उनमें वर्णित-धर्मतत्त्वोंके आधारपर भारतके नायकोंकी वीरताका पूर्णतया समर्थन करना संभव नहीं था । अतएव कर्मयोग-प्रधान भागवत धर्मका निरूपण महाकाव्यात्मक मूल भारतहीमें करना आवश्यक था । यही मूल गीता है, और यदि भागवत धर्मके मूल स्वरूपका उपपत्तिसहित प्रतिपादन करनेवाला सबसे पहला ग्रंथ यह न भी हो; तो यह स्थूल अनुमान किया जा सकता है, कि यह आदि-ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है; और इसका काल ईसासे लगभग ९०० वर्ष पहले है । इस प्रकार गीता यदि भागवत धर्म-प्रधान पहला ग्रंथ न हो, तोभी वह मुख्य ग्रंथोंमेंसे एक अवश्य है, इसलिये इस बातका दिग्दर्शन करना आवश्यक था, कि उसमें प्रतिपादित निष्काम कर्मयोग तत्कालीन प्रचलित अन्य धर्म-पंथोंसे — अर्थात् कर्मकांडसे, औपनिषदिक ज्ञानसे, सांख्यसे, चित्तनिरोधरूपी योगसे तथा भक्तिसेभी —

५५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अविरुद्ध है; इतनाही नहीं, किंतु यही इस ग्रंथका मुख्य प्रयोजनभी कहा जा सकता है। नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछेसे बने हैं, इसलिये उनका प्रतिपादन मूल गीतामें नहीं आ सकता और यही कारण है, कि कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वेदान्त विषय गीतामें पीछेसे मिला दिया गया है। परंतु नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछे भलेही बने हों; किंतु इसमें कोई संदेह नहीं, कि इन शास्त्रोंके प्रतिपाद्य विषय बहुत प्राचीन हैं, और इस बातका उल्लेख हम ऊपर करही आये हैं। अतएव मूल गीतामें इन विषयोंका प्रवेश होना काल-दृष्टिसे किसी प्रकार विपरीत नही कहा जा सकता। तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि जब मूल भारतका महाभारत बनाया गया होगा, तब मूल गीतामे कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ होगा। किसीभी धर्म-पंथको लीजिये: उसके इतिहासमे तो यही बात प्रकट होती है, कि उसमें समय-समयपर मतभेद होकर अनेक उपपंथ निर्माण हो जाया करते है। यही बात भागवत धर्मके विषयमेंभी कही जा सकती है। नारायणीयाख्यानमें (मभा. शा. ३४८. ५३ ) यह बात स्पष्ट रूप कह दी गई है, कि भागवत धर्मको कुछ लोग तो चतुर्व्यूह - अर्थात् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, इस प्रकार चार व्यूहोका मानते हैं; और कुछ लोग त्रिव्यूह, द्विव्यूह या एकव्यूहही मानते है। आगे चलकर, ऐसेही औरभी अनेक मतभेद उपस्थित हुए होंगे। इसी प्रकार औपनिषदिक और सांख्यज्ञानकीभी वृद्धि हो रही थी। अतएव इस बातकी सावधानी रखना अस्वाभाविक या मूल गीताके हेतुके विरुद्धभी नहीं था, कि मूल गीतामें जो कुछ विभिन्नता हो, वह दूर हो जावे; और बढ़ते हुए पिंडब्रह्मांडज्ञानसे भागवत धर्मका पूर्णतया मेल हो जावे। हमने पहले 'गीता और ब्रह्मसूत्र' शीर्षक लेखमें यह बतला दिया है, कि इसी कारणमे वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख पाया जाता है। इसके सिवा, उक्त प्रकारके अन्य परिवर्तनभी मूल गीतामें हो गये होंगे। परंतु मूल गीता-ग्रंथमें ऐसे अनेक परि- वर्तनोंका होनाभी संभव नही था। वर्तमान समयमें गीताकी जो प्रामाणिकता है, उससे प्रतीत नहीं होता, कि वह उसे वर्तमान महाभारतके बाद मिली होगी। ऊपर कह चुके हैं, कि ब्रह्मसूत्रोंमेही 'स्मृति' शब्दसे गीताको प्रमाण माना है। मूल भारतका महाभारत होते समय यदि मूल गीतामेंभी बहुतसे परिवर्तन हो गये होते, तो इस प्रामाणिकतामें निस्सन्देह कुछ बाधा आ गई होती। परंतु वैसे नहीं हुआ; और गीता- ग्रंथकी प्रामाणिकता कही अधिक बढ़ गई है। अतएव यही अनुमान करना पड़ता है, कि मूल गीतामें जो कुछ परिवर्तन हुए होंगे, वे महत्त्वके न थे; किंतु ऐसे थे, जिनमें मूल ग्रंथके अर्थकी पुष्टि हो गई है। भिन्न भिन्न पुराणोंमें वर्तमान भगवद्गीताके नमूनेकी जो अनेक गीताएँ कही गई हैं; उनमें यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि उक्त प्रकारसे मूल गीताको जो स्वरूप एक बार प्राप्त हो गया था, वही अबतक बना हुआ है; उसके बाद उसमें कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ। क्योकि, इन सब पुराणों- मेंसे अत्यंत प्राचीन पुराणोंके कुछ काल पहलेही यदि वर्तमान गीता पूर्णतया प्रमाण-

भूत, और इसीलिये परिवर्तित न होने योग्य, न हो गई होती, तो उसी नमूनेकी अन्य गीताओंकी रचना करनेकी कल्पना होनाभी संभव नहीं था। इसी प्रकार गीताके भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकारोंने एकही गीताके शब्दोंकी खींचातानी करके यह दिखलानेका जो प्रयत्न किया है, कि गीताका अर्थ हमारेही संप्रदायके अनुकूल है; उसकीभी कोई आवश्यकता नहीं थी। वर्तमान गीताके कुछ सिद्धान्तोंको परस्पर- विरोधी देख कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वर्तमान महाभारतकालीन गीतामेंभी आगे समय-समयपर कुछ परिवर्तन हुआ होगा। परन्तु हम पहलेही बतला चुके हैं, कि वास्तवमें यह विरोध नहीं है, किंतु यह भ्रम है; जो धर्म-प्रतिपादन करनेवाली पूर्वापार वैदिक पद्धतियोंके स्वरूपको ठीक तौरपर न समझनेसे हुआ है। सारांश, ऊपर किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि भिन्न भिन्न प्राचीन वैदिक धर्मांगोंकी एकवाक्यता करके प्रवृत्तिमार्गका विशेष रीतिसे समर्थन करने- वाले भागवत-धर्मका उदय हो चुकनेपर लगभग पांच सौ वर्षके पश्चात् अर्थात् ईसाके लगभग ९०० वर्ष पहले, मूल भारत और मूल गीता, दोनों ग्रंथ निर्मित हुए जिनमें उस मूल भागवत धर्मकाही प्रतिपादन किया गया था; और भारतका महा- भारत होते समय यद्यपि इन मूल गीतामें तदर्थपोषक कुछ सुधार किये गये हो; तथापि उसके असली रूपमें उस समयभी कुछ परिवर्तन नहीं हुआ। एवं वर्तमान महाभारतमें जब गीता जोड़ी गई, तब (और उसके बादभी) उसमें कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ - और होनाभी असंभव था। मूल गीता या मूल भारतके स्वरूप एवं कालका यह निर्णय स्वभावतः स्थूल दृष्टिसे एवं अंदाजसे किया गया है। क्योंकि इस समय उसके लिये कोई विशेष साधन उपलब्ध नहीं है ! परंतु वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीताकी यह बात नहीं, क्योंकि उनके कालका निर्णय करनेके लिये बहुतेरे साधन उपलब्ध हैं। अतएव उसकी चर्चा स्वतन्त्र रीतिसे अगले भागमें की गई है। यहाँपर पाठकोंको स्मरण रखना चाहिये, कि वर्तमान गीता और वर्तमान महाभारत ये दोनोही ग्रंथ हैं, जिनके मूल स्वरूपमें कालान्तरमें परिवर्तन होता रहा; और जो इस समय गीता तथा महाभारतके रूपमें हमें उपलब्ध हैं ये उस समयके पहले मूल ग्रंथ नहीं हैं।

भाग ५ - वर्तमान गीताका काल

इस बातका विवेचन हो चुका, कि भगवद्गीता भागवत धर्मपर प्रधान ग्रंथ है; और स्थूलमानसे यह निश्चित किया गया, कि यह भागवत धर्म ईसवी सनके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रादुर्भूत हुआ; एव उसके कुछ शतकोंके बाद मूल गीता बनी होगी, और यहभी बतलाया गया, कि मूल भागवत धर्मके निष्काम कर्म-प्रधान होनेपरभी आगे उसीका भक्ति-प्रधान स्वरूप हो कर अन्तमे विशिष्टाद्वैतकाभी उसमे समावेश हो गया। मूल गीता अथवा मूल भागवत धर्मके विषयमे इससे अधिक जान-

१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारी निदान वर्तमान समयमें तो मालूम नही है; और यही दशा पचास वर्ष पहले वर्तमान गीता तथा वर्तमान महाभारतकीभी थी। परंतु डॉक्टर भांडारकर, परलोक- वासी काशीनाथपंत तेलंग, परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षित तथा रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य प्रभृति विद्वानोंके उद्योगसे वर्तमान गीता एवं वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेके लिये यथेष्ट साधन उपलब्ध हो गये हैं; और अभी हालहीमें स्वर्गवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने दो-एक प्रमाण औरभी बतलाये हैं। इन सबकों एकत्रित कर तथा हमारे मतसे उनमें जिन बातोंका मिलाना ठीक जंचा, उनकोभी मिलाकर परिशिष्टका यह भाग संक्षेपमें लिखा गया है। इस परिशिष्ट-प्रकरणमें आरंभहीमें हमने यह बात प्रमाणसहित दिखला दी है, कि वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीता, दोनों ग्रंथ एक-ही व्यक्ति द्वारा रचे गये हैं। यदि दोनों ग्रंथोंको एकही व्यक्तिद्वारा रचे गये अर्थात् एककालीन मान लें, तो महाभारतके कालसे गीताका कालभी सहजही निश्चित हो जाता है। अतएव इस भागमें पहलेही ये प्रमाण दिये गये हैं, जो वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेमें अत्यंत प्रधान माने जाते हैं; और उनके बाद स्वतंत्र रीतिसे वे प्रमाणभी दिये गये हैं, जो वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेमें उपयोगी हैं। ऐसा करनेका उद्देश्य यह है, कि महाभारतका कालनिर्णय करनेके जो प्रमाण हैं वे यदि किसीको संदिग्ध प्रतीत हों, तो उससे गीताके कालका निर्णय करनेमें कोई बाधा न होने पाये। महाभारत-काल-निर्णय : महाभारत ग्रंथ बहुत बड़ा है; और उसीमें लिखा है, कि वह लक्ष श्लोकात्मक है। परंतु रावबहादुर वैद्यने महाभारतके अपने टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथके पहले परिशिष्टमें यह बतलाया है,* कि जो महाभारत ग्रंथ इस समय उपलब्ध है, उसमें उपरोक्त लाख श्लोकोंकी संख्यामे कुछ न्यूनाधिकता हो गई है; और यदि उनमें हरिवंशके श्लोक मिला दिये जावें, तोभी योगफल एक लाख नहीं होता। तथापि यह माना जा सकता है, कि भारतका महाभारत होनेपर जो वृहत् ग्रंथ तैयार हुआ, वह प्रायः वर्तमान यथरीमा होगा। ऊपर बतला चुके हैं, कि इस महाभारतमें यास्कके निरुक्त तथा मनुसंहिताका और भगवद्गीतामें तो ब्रह्मसूत्रों- काभी उल्लेख पाया जाता है। अब इसके अतिरिक्त, महाभारतके काल-निर्णय करनेके लिये जो प्रमाण पाये जाते हैं, वे ये हैं - (१) अठारह पर्वोंका यह ग्रंथ तथा हरिवंश, ये दोनों संवत् ५३५ और ६३५के बीच जावा और बाली द्वीपोंमें गये थे; तथा वहाँकी प्राचीन 'कवि' नामक भाषामें उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवादके ये आठ पर्व - आदि, विराट्, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासी, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण - बाली द्वीपमें इस समय

  • The Mahabharata : A Criticism, p, 185 रा. ब. वैद्यके महाभारतके जिस टीकात्मक ग्रंथका हमने आगे कहीं कहीं उल्लेख किया है, वह यही पुस्तक है।

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६१ उपलब्ध हैं; और उनमेंसे कुछ प्रकाशितभी हो चुके हैं। यद्यपि अनुवाद कवि-भाषामें किया गया है, तथापि उसमें स्थान-स्थानपर महाभारतके मूल संस्कृत श्लोकही रखे गये हैं। उनमेंसे उद्योगपर्वके श्लोकोंकी जाँच हमने की है। वे सब श्लोक वर्तमान महाभारतकी कलकत्तेमें प्रकाशित पोथीके उद्योगपर्वके अध्यायोंमें- बीच-बीचमें क्रमशः - मिलते हैं। इससे सिद्ध होता है, कि लक्ष-श्लोकात्मक महाभारत संवत् ५३५के लगभग दो सौ वर्ष पहले हिंदुस्थानमें प्रमाणभूत माना जाता था। क्योंकि, यदि वह यहाँ प्रमाणभूत न हुआ होता, तो जावा तथा वाली द्वीपोंमें उसे न ले गये होते। तिब्बतकी भाषामेंभी महाभारतका अनुवाद हो चुका है; परंतु वह उसके बादका है।* (२) गुप्त राजाओंके समयका एक शिलालेख हालमें उपलब्ध हुआ है, कि जो चेदि संवत् १९७ अर्थात् विक्रम संवत् ५०२ में लिखा गया था। उसमें इस बातका स्पष्ट रीतिसे निर्देश किया गया है, कि उस समय महाभारत ग्रंथ एक लाख श्लोकोंका था; और इससे यह प्रकट हो जाता है, कि विक्रम संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य होगा।† (३) आजकल भास कविके जो नाटक-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, उनमेंसे अधिकांश महाभारतके आख्यानोंके आधारपर रचे गये हैं। इससे प्रकट है, कि उस समय महाभारत उपलब्ध था; और वह प्रमाणभी माना जाता था। भास कविकृत 'बालचरित' नाटकमें श्रीकृष्णजीकी शिशु-अवस्थाकी बातोंका तथा गोपियोंका उल्लेख पाया जाता है। अतएव यह कहना पड़ता है, कि हरिवंशभी उस समय अस्तित्वमें होगा। यह बात निर्विवाद है, कि भास कवि कालिदाससे पुराना है। भास कविकृत नाटकोंके संपादक पंडित गणपतिशास्त्रीने स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटककी प्रस्तावनामें लिखा है, कि भास चाणक्यसेभी प्राचीन है; क्योंकि भास कविके नाटकका एक श्लोक चाणक्यके अर्थशास्त्रमें पाया जाता है; और उसमें यह बतलाया है, कि वह किसी दूसरेका है। परंतु यह काल यद्यपि कुछ संदिग्ध माना जाय, तथापि हमारे मतसे यह बात निर्विवाद है, कि भासका समय सन ईसवीके दूसरे अथवा तीसरे शतकके औरभी इस ओरका नहीं माना जा सकता। (४) बौद्ध ग्रंथोंके द्वारा यह निश्चित किया गया है, कि शालिवाहन शकके आरंभमें अश्वघोष नामक एक बौद्ध कवि हो गया है, जिसने 'बुद्धचरित' और * जावा द्वीपके महाभारतका योग The Modern Review, July 1914 pp. 32-38 में दिया गया है; और तिब्बती भाषामें अनुवादित महाभारतका उल्लेख Rockhill's Life of the Buddha, p. 228 note 1 में किया है। † यह शिलालेख Inscriptionum Indicarum नामक पुस्तकके तृतीय खंडके पृष्ठ १३८ में पूर्णतया दिया हुआ है, और स्वर्गवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने उसका उल्लेख अपने 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र' में (पृ. १०८) किया है। गी. र. ३६