भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 956 में से

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पृष्ठ 603

५५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अविरुद्ध है; इतनाही नहीं, किंतु यही इस ग्रंथका मुख्य प्रयोजनभी कहा जा सकता है। नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछेसे बने हैं, इसलिये उनका प्रतिपादन मूल गीतामें नहीं आ सकता और यही कारण है, कि कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वेदान्त विषय गीतामें पीछेसे मिला दिया गया है। परंतु नियमबद्ध वेदान्त और मीमांसाशास्त्र पीछे भलेही बने हों; किंतु इसमें कोई संदेह नहीं, कि इन शास्त्रोंके प्रतिपाद्य विषय बहुत प्राचीन हैं, और इस बातका उल्लेख हम ऊपर करही आये हैं। अतएव मूल गीतामें इन विषयोंका प्रवेश होना काल-दृष्टिसे किसी प्रकार विपरीत नही कहा जा सकता। तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि जब मूल भारतका महाभारत बनाया गया होगा, तब मूल गीतामे कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ होगा। किसीभी धर्म-पंथको लीजिये: उसके इतिहासमे तो यही बात प्रकट होती है, कि उसमें समय-समयपर मतभेद होकर अनेक उपपंथ निर्माण हो जाया करते है। यही बात भागवत धर्मके विषयमेंभी कही जा सकती है। नारायणीयाख्यानमें (मभा. शा. ३४८. ५३ ) यह बात स्पष्ट रूप कह दी गई है, कि भागवत धर्मको कुछ लोग तो चतुर्व्यूह - अर्थात् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, इस प्रकार चार व्यूहोका मानते हैं; और कुछ लोग त्रिव्यूह, द्विव्यूह या एकव्यूहही मानते है। आगे चलकर, ऐसेही औरभी अनेक मतभेद उपस्थित हुए होंगे। इसी प्रकार औपनिषदिक और सांख्यज्ञानकीभी वृद्धि हो रही थी। अतएव इस बातकी सावधानी रखना अस्वाभाविक या मूल गीताके हेतुके विरुद्धभी नहीं था, कि मूल गीतामें जो कुछ विभिन्नता हो, वह दूर हो जावे; और बढ़ते हुए पिंडब्रह्मांडज्ञानसे भागवत धर्मका पूर्णतया मेल हो जावे। हमने पहले 'गीता और ब्रह्मसूत्र' शीर्षक लेखमें यह बतला दिया है, कि इसी कारणमे वर्तमान गीतामें ब्रह्मसूत्रोंका उल्लेख पाया जाता है। इसके सिवा, उक्त प्रकारके अन्य परिवर्तनभी मूल गीतामें हो गये होंगे। परंतु मूल गीता-ग्रंथमें ऐसे अनेक परि- वर्तनोंका होनाभी संभव नही था। वर्तमान समयमें गीताकी जो प्रामाणिकता है, उससे प्रतीत नहीं होता, कि वह उसे वर्तमान महाभारतके बाद मिली होगी। ऊपर कह चुके हैं, कि ब्रह्मसूत्रोंमेही 'स्मृति' शब्दसे गीताको प्रमाण माना है। मूल भारतका महाभारत होते समय यदि मूल गीतामेंभी बहुतसे परिवर्तन हो गये होते, तो इस प्रामाणिकतामें निस्सन्देह कुछ बाधा आ गई होती। परंतु वैसे नहीं हुआ; और गीता- ग्रंथकी प्रामाणिकता कही अधिक बढ़ गई है। अतएव यही अनुमान करना पड़ता है, कि मूल गीतामें जो कुछ परिवर्तन हुए होंगे, वे महत्त्वके न थे; किंतु ऐसे थे, जिनमें मूल ग्रंथके अर्थकी पुष्टि हो गई है। भिन्न भिन्न पुराणोंमें वर्तमान भगवद्गीताके नमूनेकी जो अनेक गीताएँ कही गई हैं; उनमें यह बात स्पष्ट विदित हो जाती है, कि उक्त प्रकारसे मूल गीताको जो स्वरूप एक बार प्राप्त हो गया था, वही अबतक बना हुआ है; उसके बाद उसमें कुछभी परिवर्तन नहीं हुआ। क्योकि, इन सब पुराणों- मेंसे अत्यंत प्राचीन पुराणोंके कुछ काल पहलेही यदि वर्तमान गीता पूर्णतया प्रमाण-

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