श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 604, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूत, और इसीलिये परिवर्तित न होने योग्य, न हो गई होती, तो उसी नमूनेकी अन्य गीताओंकी रचना करनेकी कल्पना होनाभी संभव नहीं था। इसी प्रकार गीताके भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकारोंने एकही गीताके शब्दोंकी खींचातानी करके यह दिखलानेका जो प्रयत्न किया है, कि गीताका अर्थ हमारेही संप्रदायके अनुकूल है; उसकीभी कोई आवश्यकता नहीं थी। वर्तमान गीताके कुछ सिद्धान्तोंको परस्पर- विरोधी देख कुछ लोग यह शंका करते हैं, कि वर्तमान महाभारतकालीन गीतामेंभी आगे समय-समयपर कुछ परिवर्तन हुआ होगा। परन्तु हम पहलेही बतला चुके हैं, कि वास्तवमें यह विरोध नहीं है, किंतु यह भ्रम है; जो धर्म-प्रतिपादन करनेवाली पूर्वापार वैदिक पद्धतियोंके स्वरूपको ठीक तौरपर न समझनेसे हुआ है। सारांश, ऊपर किये गये विवेचनसे यह बात समझमें आ जायगी, कि भिन्न भिन्न प्राचीन वैदिक धर्मांगोंकी एकवाक्यता करके प्रवृत्तिमार्गका विशेष रीतिसे समर्थन करने- वाले भागवत-धर्मका उदय हो चुकनेपर लगभग पांच सौ वर्षके पश्चात् अर्थात् ईसाके लगभग ९०० वर्ष पहले, मूल भारत और मूल गीता, दोनों ग्रंथ निर्मित हुए जिनमें उस मूल भागवत धर्मकाही प्रतिपादन किया गया था; और भारतका महा- भारत होते समय यद्यपि इन मूल गीतामें तदर्थपोषक कुछ सुधार किये गये हो; तथापि उसके असली रूपमें उस समयभी कुछ परिवर्तन नहीं हुआ। एवं वर्तमान महाभारतमें जब गीता जोड़ी गई, तब (और उसके बादभी) उसमें कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ - और होनाभी असंभव था। मूल गीता या मूल भारतके स्वरूप एवं कालका यह निर्णय स्वभावतः स्थूल दृष्टिसे एवं अंदाजसे किया गया है। क्योंकि इस समय उसके लिये कोई विशेष साधन उपलब्ध नहीं है ! परंतु वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीताकी यह बात नहीं, क्योंकि उनके कालका निर्णय करनेके लिये बहुतेरे साधन उपलब्ध हैं। अतएव उसकी चर्चा स्वतन्त्र रीतिसे अगले भागमें की गई है। यहाँपर पाठकोंको स्मरण रखना चाहिये, कि वर्तमान गीता और वर्तमान महाभारत ये दोनोही ग्रंथ हैं, जिनके मूल स्वरूपमें कालान्तरमें परिवर्तन होता रहा; और जो इस समय गीता तथा महाभारतके रूपमें हमें उपलब्ध हैं ये उस समयके पहले मूल ग्रंथ नहीं हैं।
भाग ५ - वर्तमान गीताका काल
इस बातका विवेचन हो चुका, कि भगवद्गीता भागवत धर्मपर प्रधान ग्रंथ है; और स्थूलमानसे यह निश्चित किया गया, कि यह भागवत धर्म ईसवी सनके लगभग १४०० वर्ष पहले प्रादुर्भूत हुआ; एव उसके कुछ शतकोंके बाद मूल गीता बनी होगी, और यहभी बतलाया गया, कि मूल भागवत धर्मके निष्काम कर्म-प्रधान होनेपरभी आगे उसीका भक्ति-प्रधान स्वरूप हो कर अन्तमे विशिष्टाद्वैतकाभी उसमे समावेश हो गया। मूल गीता अथवा मूल भागवत धर्मके विषयमे इससे अधिक जान-