श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारी निदान वर्तमान समयमें तो मालूम नही है; और यही दशा पचास वर्ष पहले वर्तमान गीता तथा वर्तमान महाभारतकीभी थी। परंतु डॉक्टर भांडारकर, परलोक- वासी काशीनाथपंत तेलंग, परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षित तथा रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य प्रभृति विद्वानोंके उद्योगसे वर्तमान गीता एवं वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेके लिये यथेष्ट साधन उपलब्ध हो गये हैं; और अभी हालहीमें स्वर्गवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने दो-एक प्रमाण औरभी बतलाये हैं। इन सबकों एकत्रित कर तथा हमारे मतसे उनमें जिन बातोंका मिलाना ठीक जंचा, उनकोभी मिलाकर परिशिष्टका यह भाग संक्षेपमें लिखा गया है। इस परिशिष्ट-प्रकरणमें आरंभहीमें हमने यह बात प्रमाणसहित दिखला दी है, कि वर्तमान महाभारत तथा वर्तमान गीता, दोनों ग्रंथ एक-ही व्यक्ति द्वारा रचे गये हैं। यदि दोनों ग्रंथोंको एकही व्यक्तिद्वारा रचे गये अर्थात् एककालीन मान लें, तो महाभारतके कालसे गीताका कालभी सहजही निश्चित हो जाता है। अतएव इस भागमें पहलेही ये प्रमाण दिये गये हैं, जो वर्तमान महाभारतका काल निश्चित करनेमें अत्यंत प्रधान माने जाते हैं; और उनके बाद स्वतंत्र रीतिसे वे प्रमाणभी दिये गये हैं, जो वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेमें उपयोगी हैं। ऐसा करनेका उद्देश्य यह है, कि महाभारतका कालनिर्णय करनेके जो प्रमाण हैं वे यदि किसीको संदिग्ध प्रतीत हों, तो उससे गीताके कालका निर्णय करनेमें कोई बाधा न होने पाये। महाभारत-काल-निर्णय : महाभारत ग्रंथ बहुत बड़ा है; और उसीमें लिखा है, कि वह लक्ष श्लोकात्मक है। परंतु रावबहादुर वैद्यने महाभारतके अपने टीकात्मक अंग्रेजी ग्रंथके पहले परिशिष्टमें यह बतलाया है,* कि जो महाभारत ग्रंथ इस समय उपलब्ध है, उसमें उपरोक्त लाख श्लोकोंकी संख्यामे कुछ न्यूनाधिकता हो गई है; और यदि उनमें हरिवंशके श्लोक मिला दिये जावें, तोभी योगफल एक लाख नहीं होता। तथापि यह माना जा सकता है, कि भारतका महाभारत होनेपर जो वृहत् ग्रंथ तैयार हुआ, वह प्रायः वर्तमान यथरीमा होगा। ऊपर बतला चुके हैं, कि इस महाभारतमें यास्कके निरुक्त तथा मनुसंहिताका और भगवद्गीतामें तो ब्रह्मसूत्रों- काभी उल्लेख पाया जाता है। अब इसके अतिरिक्त, महाभारतके काल-निर्णय करनेके लिये जो प्रमाण पाये जाते हैं, वे ये हैं - (१) अठारह पर्वोंका यह ग्रंथ तथा हरिवंश, ये दोनों संवत् ५३५ और ६३५के बीच जावा और बाली द्वीपोंमें गये थे; तथा वहाँकी प्राचीन 'कवि' नामक भाषामें उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवादके ये आठ पर्व - आदि, विराट्, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासी, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण - बाली द्वीपमें इस समय
- The Mahabharata : A Criticism, p, 185 रा. ब. वैद्यके महाभारतके जिस टीकात्मक ग्रंथका हमने आगे कहीं कहीं उल्लेख किया है, वह यही पुस्तक है।