भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 606

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६१ उपलब्ध हैं; और उनमेंसे कुछ प्रकाशितभी हो चुके हैं। यद्यपि अनुवाद कवि-भाषामें किया गया है, तथापि उसमें स्थान-स्थानपर महाभारतके मूल संस्कृत श्लोकही रखे गये हैं। उनमेंसे उद्योगपर्वके श्लोकोंकी जाँच हमने की है। वे सब श्लोक वर्तमान महाभारतकी कलकत्तेमें प्रकाशित पोथीके उद्योगपर्वके अध्यायोंमें- बीच-बीचमें क्रमशः - मिलते हैं। इससे सिद्ध होता है, कि लक्ष-श्लोकात्मक महाभारत संवत् ५३५के लगभग दो सौ वर्ष पहले हिंदुस्थानमें प्रमाणभूत माना जाता था। क्योंकि, यदि वह यहाँ प्रमाणभूत न हुआ होता, तो जावा तथा वाली द्वीपोंमें उसे न ले गये होते। तिब्बतकी भाषामेंभी महाभारतका अनुवाद हो चुका है; परंतु वह उसके बादका है।* (२) गुप्त राजाओंके समयका एक शिलालेख हालमें उपलब्ध हुआ है, कि जो चेदि संवत् १९७ अर्थात् विक्रम संवत् ५०२ में लिखा गया था। उसमें इस बातका स्पष्ट रीतिसे निर्देश किया गया है, कि उस समय महाभारत ग्रंथ एक लाख श्लोकोंका था; और इससे यह प्रकट हो जाता है, कि विक्रम संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य होगा।† (३) आजकल भास कविके जो नाटक-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, उनमेंसे अधिकांश महाभारतके आख्यानोंके आधारपर रचे गये हैं। इससे प्रकट है, कि उस समय महाभारत उपलब्ध था; और वह प्रमाणभी माना जाता था। भास कविकृत 'बालचरित' नाटकमें श्रीकृष्णजीकी शिशु-अवस्थाकी बातोंका तथा गोपियोंका उल्लेख पाया जाता है। अतएव यह कहना पड़ता है, कि हरिवंशभी उस समय अस्तित्वमें होगा। यह बात निर्विवाद है, कि भास कवि कालिदाससे पुराना है। भास कविकृत नाटकोंके संपादक पंडित गणपतिशास्त्रीने स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटककी प्रस्तावनामें लिखा है, कि भास चाणक्यसेभी प्राचीन है; क्योंकि भास कविके नाटकका एक श्लोक चाणक्यके अर्थशास्त्रमें पाया जाता है; और उसमें यह बतलाया है, कि वह किसी दूसरेका है। परंतु यह काल यद्यपि कुछ संदिग्ध माना जाय, तथापि हमारे मतसे यह बात निर्विवाद है, कि भासका समय सन ईसवीके दूसरे अथवा तीसरे शतकके औरभी इस ओरका नहीं माना जा सकता। (४) बौद्ध ग्रंथोंके द्वारा यह निश्चित किया गया है, कि शालिवाहन शकके आरंभमें अश्वघोष नामक एक बौद्ध कवि हो गया है, जिसने 'बुद्धचरित' और * जावा द्वीपके महाभारतका योग The Modern Review, July 1914 pp. 32-38 में दिया गया है; और तिब्बती भाषामें अनुवादित महाभारतका उल्लेख Rockhill's Life of the Buddha, p. 228 note 1 में किया है। † यह शिलालेख Inscriptionum Indicarum नामक पुस्तकके तृतीय खंडके पृष्ठ १३८ में पूर्णतया दिया हुआ है, और स्वर्गवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितने उसका उल्लेख अपने 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र' में (पृ. १०८) किया है। गी. र. ३६