भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

५६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सौंदरानंद' नामक दो बौद्ध धर्मीय संस्कृत महाकाव्य लिखे थे । अब ये ग्रंथ छापकर प्रकाशित किये गये हैं। इन दोनोंमेंभी भारतीय कथाओंका उल्लेख है। इनके सिवा 'वज्रसूचिकोपनिषद्'पर अश्वघोषका व्याख्यानरूपी एक और ग्रंथ है; अथवा यह कहना चाहिये, कि यह 'वज्रसूचिकोपनिषद्' उसीका रचा हुआ है। इस ग्रंथको प्रोफ़ेसर वेबरने सन १८६० में, जर्मनीमें प्रकाशित किया है। उसमें हरिवंशके श्राद्ध माहात्म्यमेंमें “सप्तव्याधा दशार्णेषु” (हरि. २४.२०, २१) इत्यादि श्लोक, तथा स्वयं महाभारतके कुछ अन्य श्लोक (उदाहरणार्थ, मभा. शां. २६१.१७); पाये जाते हैं। इससे प्रकट होता है, कि शक संवत्से पहले हरिवंशको मिलाकर वर्तमान लक्ष श्लोकात्मक महाभारत प्रचलित था। (५) आश्वलायन गृह्यसूत्रोंमें (३.४.४) भारत तथा महाभारतका पृथक् पृथक् उल्लेख किया गया है; और बौधायन धर्मसूत्रमें एक स्थान (२.२. २६) पर महाभारतमें वर्णित ययाति उपाख्यानका एक श्लोक मिलता है, (मभा. आ. ७८.१०)। वुल्हर साहबका कथन है, कि केवल एकही श्लोकके आधारपर यह अनुमान दृढ़ नहीं हो सकता, कि महाभारत बौधायनके पहले था।* परंतु यह शंका ठीक नहीं; क्योंकि बौधायनके गुह्य शेष-सूत्रमें विष्णुसहस्रनामका स्पष्ट उल्लेख है। (बौ. गृ शे १.२२.८) : और आगे चलकर इसी सूत्रमें (२.२२.९) गीताका “पत्रं पुष्पं फलं तोयं” श्लोकभी (गीता ९.२६) मिलता है। बौधायन सूत्रमें पाये जानेवाले इन उल्लेखोंको पहले पहल परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने प्रकाशित किया था।† और इन सब उल्लेखोंसे यही कहना पड़ता है, कि बुल्हर साहबकी शंका निर्मूल है; आश्वलायन तथा बौधायन और दोनोंभी महाभारतसे, परिचित थे। बुल्हरहीने अन्य प्रमाणोंसे निश्चित किया है, कि बौधायन सन् ईसवीके लगभग ४०० वर्ष पहले हुआ होगा। (६) स्वयं महाभारतमें जहाँ विष्णुके अवतारोंका वर्णन किया गया है, वहाँ बुद्धका नामतक नहीं; और नारायणीयोपाख्यानमें (मभा शा ३३९.१००) जहाँ दस अवतारोंके नाम दिये हैं, वहाँ हंसको प्रथम अवतार कहकर तथा कृष्णके बाद एकदम कल्कि को लाकर पूरे दस गिना दिये हैं। परंतु वनपर्वमें कलियुगकी भविष्यत् स्थितिका वर्णन करते समय कहा है, कि “एडूकचिन्हा पृथिवी न देवगृह- भूषिता” (मभा. वन १९०. ६८) पृथ्वीपर देवालयोंके बदले एडूक होंगे। बुद्धके बाल तथा दाँत प्रभृति किसी स्मारक वस्तुको जमीनमें गाड़कर उसपर जो खंभ, मीनार या इमारत बनाई जाती थी, उसे एडूक कहते थे, और आजकल उसे 'डागोबा'

  • See ‘Sacred Books of the East Series’ Vol. XIV., Intro. p. xli. † परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेका पूरा लेख The Vedic Magazine and Gurukula Samachar, Vol. VII, Nos. 6-7, pp. 528-532, में प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखकका नाम प्रोफेसर काळे लिखा है; पर वह अशुद्ध है।