भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

कहते हैं। डागोबा शब्द संस्कृत 'धातुगर्भ' ( = पाली डागव ) का अपभ्रंश है; और 'धातु' शब्दका अर्थ "भीतर रक्खी हुई स्मारक वस्तु" है, सीलोन तथा ब्रह्मदेशमें ये डागोबा कई स्थानोंपर पाये जाते हैं। इससे प्रतीत होता है, कि बुद्धके वाद, परंतु अवतारोंमें उसकी गणना होनेके पहलेही महाभारत रचा गया होगा। महाभारतमें 'बुद्ध' तथा 'प्रतिबुद्ध' शब्द अनेक बार मिलते हैं ( मभा. शा १९४.५८; ३०७. ४७; ३४३.५२ ) । परंतु वहाँ केवल ज्ञानी, जाननेवाला अथवा स्थितप्रज्ञ पुरुष इतनाही अर्थ उन शब्दोंमें अभिप्रेत है। प्रतीत नहीं होता, कि ये शब्द बौद्ध धर्मसे लिये गये हों; किंतु यह माननेके लिये दृढ़ कारणभी हैं, कि बौद्धोंनेही ये शब्द वैदिक धर्मसे लिये होंगे। ( ७ ) कालनिर्णयकी दृष्टिसे यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, कि महाभारतमें नक्षत्रगणना अश्विनी आदिसे नहीं है, किंतु वह कृत्तिका आदिसे है ( मभा. अनु. ६४.८९ ) ; और मेष-वृषभ आदि राशियोंका कहींभी उल्लेख नहीं है। क्योंकि इस बातसे यह अनुमान सहजही किया जा सकता है, कि यूनानियोंके सहवाससे हिंदुस्तानमें मेष, वृषभ आदि राशियोंके आनेके पहले — अर्थात् सिकंदरके पहलेही — महाभारत ग्रंथ रचा गया होगा। परंतु इससेभी अधिक महत्त्वकी बात श्रवण आदि नक्षत्रगणनाके विषयकी है। अनुगीतामें ( मभा. अश्व. ४४.२ ; और आदि. ७१.३४ ) कहा है, कि विश्वामित्रने श्रवण आदिकी नक्षत्रगणना आरंभ की और टीकाकारने उसका यह अर्थ किया हैं, कि उस समय श्रवण नक्षत्रमें उत्तरायणका आरंभ होता था; इसके सिवा उसका कोई दूसरा ठीक ठीक अर्थभी नहीं हो सकता। वेदांगज्योतिषके समय उत्तरायणका आरंभ धनिष्ठा नक्षत्रसे हुआ करता था। धनिष्ठामें उदगयन होनेका काल ज्योतिर्गणितकी रीतिसे शकके पहले लगभग १५०० वर्ष आता है; और ज्योतिर्गणितकी रीतिसे उदगयनको एक नक्षत्र पीछे हटनेके लिये लगभग हजार वर्ष लग जाते हैं। इस हिसाबसे श्रवणके आरंभमें उदगयन होनेका काल शकके पहले लगभग ५०० वर्ष आता है। सारांश, गणितके द्वारा यह बतलाया जा सकता है, कि शकके पहले ५०० वर्ष वर्षके लगभग वर्तमान महाभारत बना होगा। परलोकवासी शंकर बाळकृष्ण दीक्षितने अपने 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र' की विशेषता यह है, कि इसके कारण वर्तमान महाभारतका काल शकके पहले ५०० वर्षसे अधिक पीछे हटायाही नहीं जा सकता। ( ८ ) रावबहादुर वैद्यने महाभारतपर जो टीकात्मक ग्रंथ अंग्रेजीमें लिखा है, उसमें यह बतलाया है, कि चंद्रगुप्तके दरबारमें ( सन ईसवीसे लगभग ३२० वर्ष पहले रहनेवाले मेगस्थनीज़ नामक ग्रीक वकीलको महाभारतकी कथाएं मालूम थीं। मेगस्थनीजका पूरा ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है; परंतु उसके अवतरण कई ग्रंथोंमें पाये जाते हैं। वे सब एकत्रित करके, पहले जर्मन भाषामें प्रकाशित किये गये; और फिर मेक्रींडलने उनका अंग्रेजी अनुवाद किया है। इस