श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुस्तकमें (पृ. २००-२०५) कहा है, कि उसमें वर्णित हेरेक्लीजही श्रीकृष्ण हैं; और मेगस्थनीजके समय शौरसेनीय लोग - जो मथुराके निवासी थे - उसीकी पूजा किया करते थे। उसमें यहभी लिखा है, कि हेरेक्लीज अपने मूलपुरुष डायोनिसससे पंद्रहवाँ था। इसी प्रकार महाभारतमेंभी (सभा. अनु. १४७. २५-३३) कहा है, कि श्रीकृष्ण दक्षप्रजापतिसे पंद्रहवें पुरुष हैं। और मेगस्थनीजने कर्णप्रावरण, एकपाद, ललाटाक्ष आदि अद्भुत लोगोंका (पृ. ७४) अथवा सोनेकी ऊपर निकालनेवाली चींटियोंका (पिपीलिकाओं) (पृ. ९४) वर्णन किया है, वहभी महाभारतहीमें (सभा. सभा. ५१, ५२) पाया जाता है। इन बातोंसे और अन्य बातोंसे प्रकट हो जाता है, कि मेगस्थनीजके समय न केवल महाभारत ग्रंथही न प्रचलित था, किंतु श्रीकृष्ण-चरित्र तथा श्रीकृष्ण-पूजाकाभी प्रचार हो गया था। यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि उपर्युक्त प्रमाण परम्परसापेक्ष अर्थात् एक दूसरेपर अवलंबित नहीं हैं, किंतु वे स्वतंत्र हैं, तो यह बात निस्संदेह प्रतीत होगी, कि वर्तमान महाभारत शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें जरूर था। इसके बाद कदाचित् किसीने उसमें कुछ नये श्लोक मिला दिये होंगे; अथवा उसमेंसे कुछ निकालभी डाले होंगे। परंतु इस समय कुछ विशिष्ट श्लोकोंके विषयमें कोई प्रश्न नहीं है - प्रश्न तो समूचे ग्रंथकेही विषयमें है; और यह बात सिद्ध है, कि यह समस्त ग्रंथ शककालके कम-से-कम पाँच शतक पहलेही रचा गया है। इस प्रकरणके आरंभहीमें हमने यह सिद्ध कर दिया है, कि गीता समस्त महाभारत ग्रंथकाही एक भाग है - वह कुछ उसमें पीछे नहीं मिलाई गई है। अतएव गीताकाभी वही काल मानना पड़ता है, जो कि महाभारतका है। संभव है, कि मूल गीता इसके पहलेकी हो; क्योंकि जैसे इसी प्रकरणके चौथे भागमें बतलाया गया है; उसकी परंपरा
- See M'Crindle's Ancient India-Megasthenes and Arrian, pp. 202-205 मेगस्थनीजका यह कथन एक वर्तमान खोजके कारण विचित्रतापूर्वक दृढ़ हो गया है। बम्बई सरकारके Archaeological Department की १९१४ ईसवी की Progress Report हालहीमें प्रकाशित हुई है। उसमें एक शिलालेख है, जो ग्वालियर रियासतके भेलसा शहरके पास बेसनगर गांवमें खाम्बबाबा नामक एक गरुड़ध्वज-स्तंभपर मिला है। इस लेखमें यह कहा है, कि हेलिओडोरस नामक एक हिंदू बने हुए यवन अर्थात् ग्रीकने इस स्तंभके सामने वासुदेवका मंदिर बनवाया था; और यह यवन वहांके भागभद्र नामक राजाके दरबारमें तक्षशिलाके ऐंटि- आल्किडस नामक ग्रीक राजाके एलचीकी हैसियतसे रहता था। ऐंटिआल्किडसके सिक्कोंसे अब यह सिद्ध किया गया है, कि वह ईसाके पहले १४० वें वर्षमें राज्य करता था। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है, कि उस समय वासुदेवभक्ति प्रचलित थी; केवल उतनीही नहीं; किंतु यवन लोगभी वासुदेवके मंदिर बनवाने लगे थे। यह पहलेही बतला चुके हैं; कि मेगस्थनीजहीको नहीं; किंतु पाणिनीकोभी वासुदेवभक्ति मालूम थी।