भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 610

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६५ बहुत प्राचीन समय तक हटानी पड़नी है। परंतु, चाहे जो कुछ कहा जाय; यह निर्विवाद सिद्ध है, कि उसका काल महाभारतके बादका नहीं माना जा सकता। यह नहीं, कि यह बात केवल उपर्युक्त प्रमाणोंहीसे सिद्ध होती है, किंतु इसके विषयमें स्वतंत्र प्रमाणभी दीख पड़ते हैं। अब आगे उन स्वतंत्र प्रमाणोंकाही वर्णन किया जाता है। गीता-कालका निर्णय : ऊपर जो प्रमाण बतलाये गये हैं, उनमें गीताका स्पष्ट अर्थात् नामतः निर्देश नहीं किया गया है; वहाँ गीताके कालका निर्णय महाभारत- कालसे किया गया है। अब यहाँ क्रमशः वे प्रमाण दिये जाते हैं, जिनमें गीताका स्पष्ट रूपसे उल्लेख है। परंतु पहले यह बतला देना चाहिये, कि परलोकवासी तेलंगने गीताको आपस्तम्बके पहलेकी अर्थात् ईसासे कम-से-कम तीन सौ वर्षसे अधिक प्राचीन कहा है। डॉक्टर भांडारकरने अपने 'वैष्णव, शैव आदि पंथ' नामक अंग्रेजी ग्रंथमें प्रायः इसी कालको स्वीकार किया है। प्रोफेसर गार्वेके* मतानुसार तेलंगद्वारा निश्चित किया गया काल ठीक नहीं। उनका यह कथन है, कि मूल गीता ईसाके पहले दूसरी सदीमें हुई; और ईसाके बाद दूसरे शतकमें उसमें कुछ सुधार किये गये हैं। परंतु नीचे लिखे प्रमाणोंसे यह बात भली भाँति प्रकट हो जायगी, कि गार्वेका उक्त कथन ठीक नहीं है। (१) गीतापर जो टीकाएँ तथा भाष्य उपलब्ध हैं, उनमें शांकरभाष्य अत्यंत प्राचीन है। श्रीशंकराचार्यने महाभारतके सनत्सुजातीय प्रकरणपरभी भाष्य लिखा है; और उनके ग्रंथोंमें महाभारतके मनु-बृहस्पति-संवाद, शुकानुप्रश्न और अनु- गीतामेंसे बहुतेरे वचन अनेक स्थानोंपर प्रमाणार्थ लिये गये हैं। इससे यह बात प्रकट है, कि उनके समयमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ प्रमाणभूत माने जाते थे। प्रोफेसर काशीनाथ बापू पाठकने एक सांप्रदायिक श्लोकके आधारपर श्रीशंकरा- चार्यका जन्मकाल ८८५ विक्रमी संवत् (शक ७१०) निश्चित किया है। परंतु हमारे मतमें इस कालको औरभी सौ वर्ष पीछे हटाना चाहिये। क्योंकि महानुभव पंथके 'दर्शन-प्रकाश' नामक ग्रंथमें यह कहा है, कि 'युग्मपयोधिरामान्वितशाके' अर्थात् शक ६४२ में (विक्रमी संवत् ७७७) श्रीशंकराचार्यने गुहामें प्रवेश किया; और उस समय उनकी आयु ३२ वर्षकी थी, अतएव यह सिद्ध होता है, कि उनका जन्म शक ६१० में (संवत् ७४५) हुआ। हमारे मतमें यही समय, प्रोफेसर पाठक- द्वारा निश्चित किये हुए कालसे, कहीं अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। परंतु, यहाँ- पर उसके विषयमें विस्तारपूर्वक विवेचन नहीं किया जा सकता। गीतापर जो शांकर- भाष्य है, उसमें पूर्व समयके अधिकांश टीकाकारोंका उल्लेख किया गया है; और

  • See Telang's Bhagavadgita, S. B. E. Vol. VIII, Intro. pp. 21 and 34; Dr. Bhandarkar's Vaishnavism, Shaivism and other Sects, P. 13; Dr. Garbe's Die Bhagavadgita, p. 64.