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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६५ बहुत प्राचीन समय तक हटानी पड़नी है। परंतु, चाहे जो कुछ कहा जाय; यह निर्विवाद सिद्ध है, कि उसका काल महाभारतके बादका नहीं माना जा सकता। यह नहीं, कि यह बात केवल उपर्युक्त प्रमाणोंहीसे सिद्ध होती है, किंतु इसके विषयमें स्वतंत्र प्रमाणभी दीख पड़ते हैं। अब आगे उन स्वतंत्र प्रमाणोंकाही वर्णन किया जाता है। गीता-कालका निर्णय : ऊपर जो प्रमाण बतलाये गये हैं, उनमें गीताका स्पष्ट अर्थात् नामतः निर्देश नहीं किया गया है; वहाँ गीताके कालका निर्णय महाभारत- कालसे किया गया है। अब यहाँ क्रमशः वे प्रमाण दिये जाते हैं, जिनमें गीताका स्पष्ट रूपसे उल्लेख है। परंतु पहले यह बतला देना चाहिये, कि परलोकवासी तेलंगने गीताको आपस्तम्बके पहलेकी अर्थात् ईसासे कम-से-कम तीन सौ वर्षसे अधिक प्राचीन कहा है। डॉक्टर भांडारकरने अपने 'वैष्णव, शैव आदि पंथ' नामक अंग्रेजी ग्रंथमें प्रायः इसी कालको स्वीकार किया है। प्रोफेसर गार्वेके* मतानुसार तेलंगद्वारा निश्चित किया गया काल ठीक नहीं। उनका यह कथन है, कि मूल गीता ईसाके पहले दूसरी सदीमें हुई; और ईसाके बाद दूसरे शतकमें उसमें कुछ सुधार किये गये हैं। परंतु नीचे लिखे प्रमाणोंसे यह बात भली भाँति प्रकट हो जायगी, कि गार्वेका उक्त कथन ठीक नहीं है। (१) गीतापर जो टीकाएँ तथा भाष्य उपलब्ध हैं, उनमें शांकरभाष्य अत्यंत प्राचीन है। श्रीशंकराचार्यने महाभारतके सनत्सुजातीय प्रकरणपरभी भाष्य लिखा है; और उनके ग्रंथोंमें महाभारतके मनु-बृहस्पति-संवाद, शुकानुप्रश्न और अनु- गीतामेंसे बहुतेरे वचन अनेक स्थानोंपर प्रमाणार्थ लिये गये हैं। इससे यह बात प्रकट है, कि उनके समयमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ प्रमाणभूत माने जाते थे। प्रोफेसर काशीनाथ बापू पाठकने एक सांप्रदायिक श्लोकके आधारपर श्रीशंकरा- चार्यका जन्मकाल ८८५ विक्रमी संवत् (शक ७१०) निश्चित किया है। परंतु हमारे मतमें इस कालको औरभी सौ वर्ष पीछे हटाना चाहिये। क्योंकि महानुभव पंथके 'दर्शन-प्रकाश' नामक ग्रंथमें यह कहा है, कि 'युग्मपयोधिरामान्वितशाके' अर्थात् शक ६४२ में (विक्रमी संवत् ७७७) श्रीशंकराचार्यने गुहामें प्रवेश किया; और उस समय उनकी आयु ३२ वर्षकी थी, अतएव यह सिद्ध होता है, कि उनका जन्म शक ६१० में (संवत् ७४५) हुआ। हमारे मतमें यही समय, प्रोफेसर पाठक- द्वारा निश्चित किये हुए कालसे, कहीं अधिक सयुक्तिक प्रतीत होता है। परंतु, यहाँ- पर उसके विषयमें विस्तारपूर्वक विवेचन नहीं किया जा सकता। गीतापर जो शांकर- भाष्य है, उसमें पूर्व समयके अधिकांश टीकाकारोंका उल्लेख किया गया है; और

  • See Telang's Bhagavadgita, S. B. E. Vol. VIII, Intro. pp. 21 and 34; Dr. Bhandarkar's Vaishnavism, Shaivism and other Sects, P. 13; Dr. Garbe's Die Bhagavadgita, p. 64.

५६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उक्त भाष्यके आरंभहीमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि इन टीकाकारोंके मतोंका खंडन करके हमने नया भाष्य लिखा है। अतएव आचार्यका जन्मकाल चाहे शक ६१० लीजिये या ७१०; इसमे तो कुछभी संदेह नहीं, कि उस समयके कम-से-कम दो-तीन सौ वर्ष पहले अर्थात् शक ४०० के लगभग गीता प्रचलित थी। अब देखना चाहिये, कि इस कालकेभी और पहले कैसे और कितना जा सकते हैं। (२) परलोकवासी तेलंगने यह दिखलाया है, कि कालिदास और बाणभट्ट गीतासे परिचित थे। कालिदासकृत रघुवंशमें (१०.३१) विष्णुकी स्तुतिके विषयमें जो “अनवाप्तमवाप्तव्यं न ते किंचन विद्यते” यह श्लोक है, वह गीताके (३.२२) “नानवाप्तमवाप्तव्यं” श्लोकसे मिलता है; और बाणभट्टकी कादंबरीके “महाभारतमिवानन्तगीताकर्णनानन्दितनरं” इस एक श्लेष-प्रधान वाक्यमें गीताका स्पष्ट-रूपसे उल्लेख किया गया है। कालिदास और भारविका उल्लेख स्पष्टरूपसे संवत् ६९१ के (शक ५५६) एक शिलालेखमें पाया जाता है; और अब यहभी निश्चित हो चुका है, कि बाणभट्टभी संवत् ६६३ के (शक ५२८) लगभग हर्ष राजाके पास था। इस बातका विवेचन परलोकवासी पांडुरंग गोविंद- शास्त्री पारखीने बाणभट्टपर लिखे हुए अपने एक मराठी निबंधमें किया है। (३) जावा द्वीपमें जो महाभारत ग्रंथ यहाँसे गया है, उसके भीष्मपर्वमें एक गीता प्रकरण है, जिसमें गीताके भिन्न भिन्न अध्यायोंके लगभग सौ-सव्वा सौ श्लोक अक्षरशः मिलते हैं। सिर्फ १२, १५, १६ और १७-इन चार अध्यायोंके श्लोक उसमें नहीं हैं। इससे यह कहनेमें कोई आपत्ति नहीं दीख पड़ती, कि उस समयभी गीताका स्वरूप वर्तमान गीताके सदृशही था। क्योंकि कवि-भाषामें गीताका यह अनुवाद है; और उसमें जो संस्कृत श्लोक मिलते हैं, वे बीच-बीचमें उदाहरण तथा प्रतीकके तौरपर ले लिये गये हैं। इससे यह अनुमान करना युक्तिसंगत नहीं, कि उस समय गीतामें केवल उतनेही श्लोक थे। जब डॉक्टर नरहर गोपाल सरदेसाई जावा द्वीपको गये थे, तब उन्होंने इस बातकी खोज की है। इस विषयका वर्णन कल- कत्तेके 'मॉडर्न रिव्यू' नामक मासिक पत्रके जुलाई १९१४के अंकमें तथा उसके पूर्व पूनाके 'चित्रमय-जगत्' मासिकपत्रमेंभी प्रकाशित हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है; कि शक चार-पाँच सौके कम-से-कम दो सौ वर्ष पहले महाभारतके भीष्मपर्वमें गीता थी; और उसके श्लोकभी वर्तमान गीताके श्लोकोंके क्रमानुसारही थे। (४) विष्णुपुराण और पद्मपुराण आदि ग्रंथोंमें भगवद्गीताके नमूनेपर बनी हुई जो अन्य गीताएं दीख पडती हैं, अथवा उनके उल्लेख पाये जाते हैं, उनका वर्णन इस ग्रंथके पहले प्रकरणमे किया गया है। इससे यह बात स्पष्टतया विदित होती है, कि उस समय भगवद्गीता प्रमाण तथा पूजनीय मानी जाती थी, इसीलिये उसका उक्त प्रकारसे अनुकरण किया गया है, और यदि ऐसा न होता, तो उसका कोईभी अनुकरण न करता। अतएव सिद्ध है, कि इन पुराणोंमें जो अत्यंत प्राचीन

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६७ पुराण हैं, उनमेंभी भगवद्गीता कम-से-कम सौ-दो-सौ वर्ष अधिक प्राचीन अवश्य होगी। पुराण-कालका आरंभ-समय सन ईसवीके दूसरे शतकसे अधिक अर्वाचीन नहीं माना जा सकता, अतएव गीताका काल कम-से-कम शकारंभके कुछ थोड़ा पहलेही मानना पड़ता है। (५) ऊपर यह बतला चुके हैं, कि कालिदास और बाण गीतासे परिचित थे। कालिदाससे पुराने भास कविके नाटक हालहीमें प्रकाशित हुए हैं। उनमेंसे 'कर्णभार' नाटकमें बारहवाँ श्लोक इस प्रकार है :- हतोऽपि लभते स्वर्गं जित्वा तु लभते यशः । उभे बहुमते लोके नास्ति निष्फलता रणे ॥ यह श्लोक गीताके “हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्” (गीता २.३७) श्लोकके समाना- र्थक है; और जब कि भास कविके अन्य नाटकोंमें यह प्रकट होता है, कि वह महा- भारतसे पूर्णतया परिचित था; तब तो यही अनुमान किया जा सकता है, कि उप- र्युक्त श्लोक लिखने समय उसके मनमें गीताका उक्त श्लोक अवश्य आया होगा। अर्थात् यह सिद्ध होता है, कि भास कविके पहलेभी महाभारत और गीताका अस्तित्व था। पंडित गणपतिशास्त्रीने यह निश्चित किया है, कि भास कविका काल शक-के दो-तीन सौ वर्ष पहले रहा होगा। परंतु कुछ लोगोंका मत है, कि वह शकके सौ-दो सौ वर्ष बाद हुआ है। यदि हम दूसरे मतको सत्य माने, तोभी उपर्युक्त प्रमाणसे सिद्ध हो जाता है, कि भाससे कम-से-कम सौ-दोसौ वर्ष पहले अर्थात् शक-कालके आरंभमें महाभारत और गीता, दोनों ग्रंथ सर्वमान्य हो गये थे। (६) परंतु प्राचीन ग्रंथकारों-द्वारा गीताके श्लोक लिये जानेका औरभी अधिक दृढ़ प्रमाण, परलोकवासी त्र्यंबक गुरुनाथ कालेने गुरुकुलकी 'वैदिक मेग- जीन' नामक अंग्रेजी मासिक पुस्तक (पुस्तक ३, अंक ६-७, पृष्ठ ५०८-५३२, मार्गशीर्ष और पौष, संवत् १९७०) में प्रकाशित किया है। इसके पहले पश्चिमी संस्कृत पंडितोंका यह मत था, कि संस्कृत काव्य-पुराणोंकी अपेक्षा किन्हीं अधिक अथवा प्राचीन ग्रंथोंमें, उदाहरणार्थ सूत्र-ग्रंथोंमेंभी, गीताका उल्लेख नहीं पाया जाता; और इसलिये यह कहना पड़ता है, कि सूत्र-कालके बाद, अर्थात् अधिकसे अधिक सन् ईसवीके पहले, दूसरी सदीमें गीता बनी होगी। परंतु परलोकवासी कालेने प्रमाणोंसे सिद्ध कर दिया है, कि यह मत ठीक नहीं है। बौधायन-गृह्यशेष- सूत्रमें (२.२२.९) गीताका (९.२६) निम्नलिखित श्लोक 'तदाह भगवान्' कहकर स्पष्ट रूपसे लिया गया है :- देशाभावे द्रव्याभावे साधारणे कुर्यान्मनसा वार्चयेदिति । तदाह भगवान् - पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ इति

५६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और आगे चलकर कहा है, कि भक्तिसे नम्र होकर इन मंत्रोंको पढ़ना चाहिये - “भक्तिनम्रः एतान्मन्त्रानधीयीत ।” इसी गृह्यशेष-सूत्रके तीसरे प्रश्नके अंतमें यह भी कहा है, कि “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर-मंत्रका जप करनेसे अश्वमेधका फल मिलता है। इससे यह बात पूर्णतया सिद्ध होती है, कि बौधायनके पहले गीता प्रचलित थी; और वासुदेव-पूजाभी सर्वमान्य समझी जाती थी। इसके- सिवा बौधायनके पितृमेध-सूत्रके तृतीय प्रश्नके आरंभहीमें यह वाक्य है :- जातस्य वै मनुष्यस्य ध्रुवं मरणमिति विजानीयात्तस्माज्जाते न प्रहृष्येन्मृते च न विषीदेत् । इससे सहजही दीख पड़ता है, कि वह गीताके “जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥” इस श्लोकसे सूझ पड़ा होगा; और उसमें उपर्युक्त 'पत्रं पुष्पं' श्लोकका योग कर देनेसे तो कुछ शंकाही नहीं रह जाती। ऊपर बतला चुके हैं, स्वयं महाभारतका एक श्लोक बौधायन- सूत्रोंमें पाया जाता है। बुल्हर साहबने निश्चित किया है* कि बौधायनका काल आपस्तंबके सौ-दोसौ वर्ष पहले होगा; और आपस्तंबका काल ईसाके पहले तीन सौ वर्षसे कम हो नहीं सकता। परंतु हमारे मतानुसार उसे कुछ इस ओर हटाना चाहिये। क्योंकि महाभारतमें मेष-वृषभ आदि राशियाँ नहीं हैं और ‘काल- माधव’में तो बौधायनका “मीनमेषयोर्मेषवृषभोर्वा वसंतः” यह वचन दिया गया है; यही वचन परलोकवासी शंकर बालकृष्ण दीक्षितके ‘भारतीय ज्योतिषशास्त्र’ मेंभी (पृष्ठ १०२) लिया गया है। इससेभी यही निश्चित अनुमान किया जाता है, कि महाभारत बौधायनके पहलेका है, तथा शकारंभके कम-से-कम चार सौ वर्ष पहले बौधायनका समय होना चाहिये; और पाँच सौ वर्ष पहले महाभारत तथा गीताका अस्तित्व था। परलोकवासी कालेने बौधायनका काल ईसाके सात-आठ सौ वर्ष पहलेका निश्चित किया है; किंतु वह ठीक नहीं है। जान पड़ता है, कि बौधायनका राशिविषयक वचन उनके ध्यानमें न आया होगा। (७) उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह बात किसीकोभी स्पष्ट रूपसे विदित हो जायगी, कि वर्तमान गीता शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहले अस्तित्वमें थी; बौधायन तथा आश्वलायनभी उससे परिचित थे; और उस समयसे श्रीशंकराचार्यके समय- तक उसकी परंपरा अविच्छिन्न रूपसे दिखलाई जा सकती है। परंतु अब तक जिन प्रमाणोंका उल्लेख किया गया है, वे सब वैदिक धर्मके ग्रंथोंसे लिये गये हैं। अब आगे चलकर जो प्रमाण दिया जायगा, वह वैदिक धर्म-ग्रंथोंसे भिन्न अर्थात् बौद्ध साहित्यका है। इससे गीताकी उपर्युक्त प्राचीनता स्वतंत्र रीतिसे औरभी अधिक दृढ़ तथा

  • See Sacred Books of the East Series, Vol. II, Intro. p. xliii and also the same Series, Vol. XIV, Intro. p. xliii.

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५६९

निःसंदिग्ध हो जाती है। बौद्ध धर्मके पहलेही भागवत धर्मका उदय हो गया था, इस विषयमें बुल्हर और प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित सेनार्तके मतोंका उल्लेख पहले हो चुका है; तथा प्रस्तुत प्रकरणके अगले भागमें इन बातोंका विवेचन स्वतंत्र रीतिसे किया जायगा, कि बौद्ध धर्मकी वृद्धि कैसे हुई? तथा हिंदू धर्मसे उसका क्या संबंध है? यहाँ केवल गीता-कालके संबंधमेंही आवश्यक उल्लेख संक्षिप्त रूपमें किया जायगा। भागवत धर्म बौद्ध धर्मके पहलेका है, तथापि केवल इतना कह देनेसेही इस बातका निश्चय नहीं किया जा सकता, कि गीताभी बुद्धके पहले थी। क्योंकि यह कहनेके लिये कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, कि भागवत धर्मके साथही गीता-ग्रंथकाभी उदय हुआ। अतएव यह देखना आवश्यक है कि बौद्ध ग्रंथकारोंने गीता-ग्रंथका स्पष्ट उल्लेख कहीं किया है या नहीं? प्राचीन बौद्ध ग्रंथोंमें यह स्पष्ट रूपसे लिखा है, कि बुद्धके समय चार वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास, निघंटु आदि वैदिक धर्मग्रंथ प्रचलित हो चुके थे; अतएव इसमें संदेह नहीं, कि बुद्धके पहलेही वैदिक धर्म पूर्णावस्थामें पहुँच चुका था। इसके बाद बुद्धने जो नया पंथ चलाया, वह अध्यात्मकी दृष्टिसे अनात्मवादी था; परंतु जैसे अगले भागमें बतलाया जायगा आचरण-दृष्टिसे उसमें उपनिषदोंके संन्यास-मार्गहीका अनुकरण किया गया था। परंतु अशोकके समय बौद्ध धर्मकी यह दशा बदल गई थी; बौद्ध भिक्षुओंने जंगलमें रहना छोड़ दिया था – धर्म प्रसारार्थ तथा परोपकारके काम करनेके लिये वे लोग पूर्वकी ओर चीनमें और पश्चिमकी ओर अलेक्जेंड्रिया तथा ग्रीसतक चले गये थे। बौद्ध धर्मके इतिहासमें यह एक अत्यंत महत्त्वका प्रश्न है, कि जंगलोंमें रहना छोड़कर लोकसंग्रहके काम करनेके लिये बौद्ध यति कैसे प्रवृत्त हो गये? बौद्ध धर्मके प्राचीन ग्रंथोंपर दृष्टि डालिये। सुत्तनिपातके खग्गविसाणसुत्तमें कहा है, कि जिस भिक्षुने पूर्ण अर्हतावस्था प्राप्त कर ली है, वह कोईभी काम न करे; केवल गेंडेके सदृश्य जंगलमें निवास किया करे; और महावग्गमें (५. १. २७) बुद्धके प्रमुख शिष्य सोनकोलीविसकी कथामें कहा है, कि जो भिक्षु निर्वाणपदतक पहुँच चुका है, उसके लिये न तो कोई कामही अवशिष्ट रह जाता है; और न किया हुआ कर्मही भोगना पड़ता है – “कतस्स पटिचयो नत्थि करणीयं न विज्जति।” यह शुद्ध संन्यास-मार्ग है, और हमारे औपनिषदिक संन्यास-मार्गसे इसका पूर्णतया मेल मिलता है। यह “करणीयं न विज्जति” वाक्य, गीताके “तस्य कार्यं न विद्यते” इस वाक्यसे केवल समानार्थकही नहीं है, किंतु शब्दशःभी एकही है। परंतु जब बौद्ध भिक्षुओंका यह मूल संन्यास-प्रधान आचार बदल गया और जब वे परोपकारके काम करने लगे, तब नये तथा पुराने मतमें झगड़ा हो गया; पुराने लोग अपनेको ‘थेरवाद’ (वृद्धपंथ) कहने लगे; और नवीन मत-वादी लोग अपने पंथका ‘महायान’ नाम रख करके पुराने पंथको ‘हीनयान’ (अर्थात् हीन पंथके) नामसे संबोधित करने लगे। अश्वघोष महायान पंथका था; और वह इस मतको मानता था, कि बौद्ध

५७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यति लोग परोपकारके काम किया करें । अतएव 'सौंदरानंद' (सौ. १८. ५४) काव्यके अंतमें, जब नंद अर्हतावस्थामें पहुँच गया, तब उसे बुद्धने जो उपदेश दिया, है, उसमें पहले यह कहा है :- अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतः न तेऽस्ति किंचित्करणीयम्वपि । "तेरा कर्तव्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गई, अब तेरे लिये तिलभरभी कर्तव्य नहीं रहा ।" और आगे स्पष्ट-रूपसे यह उपदेश किया है, कि :- विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन्परकार्यमप्यथो ॥ "अतएव अब तू अपना कार्य छोड़, बुद्धिको स्थिर करके परकार्य किया कर" (सौ. १८ ५७) । प्राचीन धर्म-ग्रंथोंमें पाये जानेवाले बुद्धके कर्मत्यागविषयक उपदेशमें तथा कर्मयोगविषयक इस उपदेशमें कि जिसे 'सौंदरानंद' काव्यमें अश्व घोषने बुद्धके मुखसे कहलाया है, अत्यंत भिन्नता है। और, अश्वघोषकी इन दलीलोंमें तथा गीताके तीसरे अध्यायमें जो युक्ति-प्रयुक्तियाँ हैं, उनमें - "तस्य कार्यं न विद्यते... तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" तेरे लिये कुछ रह नहीं गया है, इसलिये जो कर्म प्राप्त हों, उनको निष्काम बुद्धिसे किया कर (गीता ३. १७, १९) न केवल अर्थदृष्टिसेही, किंतु शब्दशःभी समानता है। अतएव इससे यह अनुमान होता है, कि ये दलीलें अश्वघोषको गीताहीसे मिली हैं। इसका कारण ऊपर बतलाही चुके हैं, कि अश्वघोषसेभी पहले महाभारत था। परंतु इसे केवल अनुमानही न समझिये। बौद्ध धर्मानुयायी तारानाथने बौद्ध धर्मविषयक इतिहाससंबंधी जो ग्रंथ तिब्बती भाषामें लिखा है, उसमे लिखा है, कि बौद्धोंके पूर्वकालीन संन्यास-मार्गमें महायान पंथने जो कर्मयोगविषयक सुधार किया था. उसे महायान-पंथके मुख्य पुरस्कर्ता नागार्जुनके गुरु राहुलभद्रने 'ज्ञानी श्रीकृष्ण और गणेश'से जाना था। इस ग्रंथका अनुवाद रूसी भाषामें जर्मन भाषामें किया गया है- अंग्रेजीमें अभीतक नहीं हुआ है। डॉ. केर्नने १८९६ ईसवीमें बौद्ध धर्मपर एक पुस्तक लिखी थी।* यहाँ उसीसे हमने यह अवतरण लिया है। डॉक्टर केर्नकाभी यही मत है, कि यहाँपर श्रीकृष्णके नामसे भगवद्गीताहीका उल्लेख किया गया है। महायान- पंथके बौद्ध ग्रंथोमेसे 'सद्धर्मपुंडरीक' नामक ग्रंथमेभी भगवद्गीताके श्लोकोंके किया समान कुछ श्लोक हैं। परंतु इन बातोंका और अन्य बातोंका विवेचन अगले भागमें जायगा। यहाँपर केवल यही बतलाना है, कि बौद्ध-ग्रंथकारोंकेही मतानुसार मूल बौद्ध-धर्मके संन्यास-प्रधान होने परभी उसमे भक्ति-प्रधान तथा कर्म-प्रधान महायान-पंथकी उत्पत्ति भगवद्गीताके कारणही हुई है; और अश्वघोषके काव्यमे

  • See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism (Grundriss, III.
  1. P. 122 महायान ग्रंथके 'अमिताभसूत्र' नामक मुख्य ग्रंथका अनुवाद चीनी भाषामें सन १४८ के लगभग किया गया था।

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७१ गीताकी जो ऊपर समता बतलाई गई है, उसमे इस अनुमानको औरभी दृढ़ता प्राप्त हो जाती है। पश्चिमी पंडितोंका निश्चय है, कि महायान-पंथका पहला पुरस्कर्ता नागार्जुन शकके लगभग सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले हुआ होगा; और यह तो स्पष्टही है, कि इस पंथका बीजारोपण अशोकके राजशासनके समयमें हुआ होगा। बौद्ध ग्रंथोंसे तथा स्वयं बौद्ध ग्रंथकारोंके लिखे हुए उस धर्मके इतिहाससे यह बात स्वतंत्र रीतिसे सिद्ध हो जाती है, कि भगवद्गीता महायान बौद्ध-पंथके जन्मसे पहले - अशोकसेभी पहले - याने सन ईसवीसे लगभग ३०० वर्ष पहलेही अस्तित्वमें थी। इन सब प्रमाणोंपर विचार करनेसे इसमें कुछभी शंका नही रह जाती, कि वर्तमान भगवद्गीता शालिवाहन शकके लगभग पाँच सौ वर्ष पहलेही अस्तित्वमें थी। डॉक्टर भांडारकर, परलोकवासी तेलंग, रावबहादुर चिंतामणराव वैद्य और पर- लोकवासी दीक्षितका मतभी इसमे बहुत-कुछ मिलता-जुलता है; और उसीको यहाँ ग्राह्य मानना चाहिये। हाँ, प्रोफेसर गार्वेका मत भिन्न है। उन्होंने उसके प्रमाणमें गीताके चौथे अध्यायवाले संप्रदाय-परंपराके श्लोकोंमेंसे 'योगो नष्टः' - योगका नाश हो गया - इस वाक्यको लेकर योग शब्दका अर्थ 'पातंजल योग' किया है। परंतु हमने प्रमाणसहित पहलेही बतला दिया है, कि वहाँ योग शब्दका अर्थ 'पातंजल- योग' नहीं - 'कर्मयोग' है। इसलिये प्रो गार्वेका मत भ्रममूलक अतएव अग्राह्य है। यह बात निर्विवाद है, कि वर्तमान गीताका काल शालिवाहन शकके पाँच सौ वर्ष पहलेकी अपेक्षा और कम नहीं माना जा सकता। पिछले भागमें यह बतलाही चुके हैं कि मूल गीता इससेभी कुछ सदियोंसे पहलेकी होनी चाहिये। भाग ६ - गीता और बौद्ध ग्रंथ वर्तमान गीताका काल निश्चित करनेके लिये पिछले भागमें जिन बौद्ध ग्रंथोंके प्रमाण दिये गये हैं, उनका पूरा पूरा महत्त्व समझनेके लिये गीता और बौद्ध ग्रंथ या बौद्ध धर्मकी साधारण समानता तथा विभिन्नता परभी यहाँ विचार करना आवश्यक है। पहले कई बार बतला चुके हैं, कि गीता-धर्मकी विशेषता यह है, कि गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ प्रवृत्तिमार्गावलंबी रहता है। परंतु इस विशेष गुणको थोड़ी देरके लिये अलग रख दें; और उक्त पुरुषके केवल मानसिक तथा नैतिक गुणोंहीका विचार करें, तो गीतामें स्थितप्रज्ञके (गीता २. ५५-७२), ब्रह्मनिष्ठ पुरुषके (४. १९-२३; ५. १८-२८) और भक्तियोगी पुरुषके (१२. १३- १९) जो लक्षण बतलाये हैं, उनमें और निर्वाणपदके अधिकारी अर्हतोंके अर्थात् पूर्णावस्थाको पहुंचे हुए बौद्ध भिक्षुओंके जो लक्षण भिन्न भिन्न बौद्ध ग्रंथोंमें दिये हुए हैं, उनमें विलक्षण समता दीख पड़ती है (धम्मपद श्लोक ३६०-४२३ और सुत्त- निपातोंमेंसे मुनिसुत्त तथा धम्मिकसुत्त देखो)। इतनाही नही; किंतु इन वर्णनोंके

५७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जल्दसामने दीख पड़ता है, कि स्थितप्रज्ञ अथवा भक्तिमान् पुरुषके समानही सच्चा भिक्षुभी 'शान्त', 'निष्काम', 'निर्मम', 'निराशी' (निर्लिप्सित), 'समदुःखसुख', 'निग्गब्भ', 'अनिकेतन' या 'अनिवेशन अथवा 'समाननिन्दा-स्तुति', और 'मान- अपमान तथा लाभ-अलाभको समान माननेवाला' रहता है (धम्मपद ८०, ८१ ९; मुत्तनि. मुनिसुत्त १. ३. १४; द्वयतानुपस्सनसुत्त २१-२३; और विनयपिटक चुल्लवग्ग. ७. ४. ३)। द्वयतानुपस्सनसुत्तके ७०वें श्लोकका यह विचार - ज्ञानी पुरुषके लिये जो प्रकाश है, वही अज्ञानीको अंधकार है - गीताके (गीता २. ६९) "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी" इस श्लोकान्तर्गत विचारके सदृश है। और मुनिसुत्तके १० वें श्लोकका यह वर्णन - "अरोसनेय्यो न रोमेति" अर्थात् न तो स्वयं कष्ट पाता है और न दूसरोंकोभी कष्ट देता है - गीताके "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) इस वर्णनके समान है। इसी प्रकार सेल्लसुत्तके ये विचार, कि "जो कोई जन्म लेता है वह मरता है" और "प्राणियोंका आदि तथा अन्त अव्यक्त है, इसलिये उसका शोक करना वृथा है" (सेल्लसुत्त १. ९, गी. २. २७, २८), कुछ शब्दोंके हेरफेरसे गीताकेही विचार हैं। गीताके दसवे अध्यायमें अथवा अनुगीतामें (मभा अश्व. ४३, ४४) "ज्योतिष्मानांमें सूर्य, नक्षत्रोंमें चंद्र, और वेद-मंत्रोंमें गायत्री" आदि जो वर्णन है, वही सेल्लसुत्तके २१ वे और २२ वे श्लोकोंमें तथा महावग्गमें (६. ३५. ८) ज्यों- का-त्यों आया है। इसके सिवा शब्दसादृश्यके तथा अर्थसमानताके छोटे-मोटे उदाहरण परलोकवासी तेलंगने गीताके अपने अंग्रेजी अनुवादकी टिप्पणियोंमें दे दिये हैं। तथापि प्रश्न होते हैं, कि यह सदृशता हुई कैसे? ये विचार असलमें बौद्ध धर्मके हैं या वैदिक धर्मके? और इनसे अनुमान क्या निकलता है? किंतु इन प्रश्नोंको हल करनेके लिये उस समय जो साधन उपलब्ध थे वे अपूर्ण थे। यही कारण है, जो उपर्युक्त चमत्कारिक शब्दसादृश्य और अर्थ-सादृश्य दिखला देनेके सिवा परलोकवासी तेलंगने इस विषयमें और कोई विशेष बात नहीं लिखी। परंतु अब बौद्ध धर्मकी जो अधिक बातें उपलब्ध हो गई हैं, उनके उक्त प्रश्न हल किये जा सकते हैं इसलिये यहाँ पर बौद्ध धर्मकी उन बातोंका संक्षिप्त वर्णन किया जाता है। परलोकवासी तेलंगकृत गीताका अंग्रेजी अनुवाद जिस 'प्राच्यधर्म-ग्रंथमाला' में प्रकाशित हुआ था, उसीमें आगे चलकर पश्चिमी विद्वानोंने बौद्ध धर्म-ग्रंथोंके अंग्रेजी अनुवाद प्रसिद्ध किये हैं। ये बातें प्रायः उन्हींमें एकत्रित की गई हैं; और प्रमाणमें बौद्ध ग्रंथोंके जो स्थल बतलाये गये हैं, उनका मिलनाभी इसी मालाके अनुवादोंमें मिलेगा। कुछ स्थानोंपर पाली शब्दों तथा वाक्योंके अवतरण मूल पाली ग्रंथोंसेही उद्धृत किये गये हैं। अब यह बात निर्विवाद सिद्ध हो चुकी है, कि जैन धर्मके समान बौद्ध धर्मभी अपने वैदिक धर्म-रूप पिताकाही पुत्र है, जो जितनी चाहिये उतनी संपत्तिका हिस्सा

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७३ लेकर किसी कारणसे विभक्त हो गया है; अर्थात् वह कोई पराया नहीं है, किंतु उसके पहले यहाँपर जो ब्राह्मण-धर्म था, उसीकी यही उपजी हुई यह एक शाखा है। लंकाके महावंस या दीपवंस आदि प्राचीन पाली भाषाके ग्रंथोंमें बुद्धके पश्चा- द्वर्ती राजाओं तथा बौद्ध आचार्योंकी परंपराका जो वर्णन है, उसका हिसाब लगा कर देखनेसे ज्ञात होता है, कि गौतमबुद्धने अस्सी वर्षकी आयु पाकर ईसवी सनसे ५४३ वर्ष पहले अपना शरीर छोड़ा। परंतु इसमें कुछ बातें असंबद्ध हैं। इसलिये प्रोफेसर मेक्समूलरने इस गणनापर सूक्ष्म विचार करके बुद्धका यथार्थ निर्वाण- काल इसवी सनसे ४७३ वर्ष पहले बतलाया है; और डॉक्टर बुल्हरभी अशोकके शिलालेखोंमें इसी कालका सिद्ध होना प्रमाणित करते हैं। तथापि प्रोफेसर व्हिसडे- विड्स् या डॉ. केर्नके समान कुछ खोज करनेवाले इस कालको उक्त कालसे ३५ या १०० वर्ष औरभी आगे हटाना चाहते हैं। प्रोफेसर गायगरने हालहीमें इन सब मतोंकी जाँच करके बुद्धका यथार्थ निर्वाण-काल ईसवी सनसे ४८३ वर्ष पहले माना है।* इनमेंसे कोईभी काल क्यों न स्वीकार कर लिया जाय, यह निर्विवाद है, कि बुद्धका जन्म होनेके पहलेही वैदिक धर्म पूर्ण अवस्थामें पहुंच चुका था; और न केवल उप- निषदही किंतु धर्म-सूत्रोंके समान ग्रंथभी उससे पहलेही तैयार हो चुके थे। क्योंकि, पाली भाषाके प्राचीन बौद्ध धर्म-ग्रंथोंहीमें लिखा है, कि - "चारो वेद, वेदांग, व्याकरण, ज्योतिष, इतिहास और निघंटु" आदि विषयोंमें प्रवीण कुछ सत्वशील ब्राह्मण गृहस्थों तथा जटिल तपस्वियोंसे स्वयं गौतमबुद्धने वाद करके उनको अपने धर्मकी दीक्षा दी (सुत्तनिपातोंमेंसे सेल्लसुत्तके सेल्लका वर्णन तथा वत्थुगाथा ३०-४५ देखो)। कठ आदि उपनिषदोंमें (कठ १. १८; मुंड. १. २. १०) अथवा उन्हींको लक्ष्य करके गीतामें (२. ४०-४५; ९. २०-२१) जिस प्रकार यज्ञयाग आदि श्रौतकर्मोंकी गौणताका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार तथा कुछ अंशोंमें उन्हीं शब्दोंके द्वारा तेविज्जसुत्तोंमें (त्रैविद्य-सूत्रों) बुद्धनेभी अपने मतानुसार 'यज्ञयागादि'को निरुपयोगी तथा त्याज्य बतलाया है; और इस बातका निरूपण किया है, कि ब्राह्मण जिसे ('ब्रह्मसहव्यत्यता'=ब्रह्मसायुज्यता) कहते हैं, वह अवस्था कैसे प्राप्त होती है। इससे यह बात स्पष्ट विदित होती है, कि ब्राह्मण-धर्मके कर्मकांड तथा ज्ञानकांड - अथवा गार्हस्थ्य-धर्म और संन्यास-धर्म, अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति - इन दोनों शाखाओके पूर्णतया रूढ हो जानेपर उनमें सुधार करनेके लिये बौद्ध धर्म उत्पन्न हुआ है। सुधारके विषयमें सामान्य नियम यह है, कि उसमें

  • बुद्ध-निर्वाणकालविषयक वर्णन प्रो. मेक्समूलरने अपने 'धम्मपद'के अंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनामें (S. B. E. Vol. X. Intro. pp. xxxv-xlv) किया है; और उसकी परीक्षा डॉ. गायगरने सन् १९१२ में प्रकाशित अपने 'महावंश'के अनु- वादकी प्रस्तावनामें की है (The Mahavamsa by Dr. Geiger, Pali Text Society, Intro. p. xxii f).

पहलेकी कुछ बातें स्थिर रह जाती हैं; और कुछ बदल जाती हैं। अतएव इस न्यायके अनुसार अब इस बातका विचार करना चाहिये, कि बौद्ध धर्ममें वैदिक धर्मकी किन किन बातोंको स्थिर रख लिया है; और किनको छोड़ दिया है। यह विचार गार्हस्थ्य धर्म और संन्यास इन दोनोंकी पृथक् पृथक् दृष्टियोंसे, करना चाहिये। परंतु बौद्ध धर्म मूलमें संन्यास-मार्गीय अथवा केवल निवृत्ति-प्रधान है, इसलिये पहले दोनोंके संन्यास-धर्मका विचार करके अनंतर दोनोंके गार्हस्थ्य धर्मके तारतम्यपर विचार किया जायगा। वैदिक संन्यास-धर्मपर दृष्टि डालनेसे दीख पड़ता है, कि कर्ममय सृष्टिके सब व्यवहार तृष्णामूलक अतएव दुःखमय हैं; उसमें अर्थात् जन्म-मरणके भवचक्रसे आत्माका सर्वथा छुटकारा होनेके लिये मन निष्काम और विरक्त करना चाहिये तथा उसको दृश्यसृष्टिके मूलमें रहनेवाले आत्मस्वरूपी नित्य परब्रह्ममें स्थिर करके सांसारिक कर्मोंका सर्वथा त्याग करना उचित है, इस आत्मनिष्ठ स्थितिहीमें सदा निमग्न रहना संन्यास-धर्मका मुख्य तत्त्व है। दृश्य-सृष्टि नामरूपात्मक तथा नाशवान्‌ है; और कर्मविपाकके कारणही उसका अखंडित व्यापार जारी है। कम्मना वत्तती लोको कम्मना वत्तती पजा ( प्रजा ) । कम्मनिबंधना सत्ता ( सत्त्वानि ) रथस्साऽणीव यायतो ॥ “कर्महीसे लोग और प्रजाभी जारी हैं। जिस प्रकार चलती हुई गाड़ी रथकी कीलसे नियंत्रित रहती है, उसी प्रकार प्राणिमात्र कर्मसे बंधा हुआ है” ( सुत्तनि. वासेठसुत्त ६१ )। वैदिक धर्मके ज्ञानकांडका उक्त तत्त्व, अथवा जन्म-मरणका चक्कर, या ब्रह्मा, इंद्र, महेश्वर, यम आदि अनेक देवता और उनके भिन्न भिन्न स्वर्ग-पाताल आदि लोकोंका ब्राह्मण-धर्ममें वर्णित अस्तित्वभी बुद्धको मान्य था; और इसी कारण नामरूप, कर्मविपाक, अविद्या, उपादान और प्रकृति वगैरह वेदान्त या सांख्य- शास्त्रके शब्द तथा ब्रह्मादि वैदिक देवताओंकी कथाएँभी ( बुद्धकी श्रेष्ठताको स्थिर रखकर ) कुछ हेरफेरसे बौद्ध ग्रंथोंमें पाई जाती हैं। यद्यपि बुद्धको वैदिक धर्मके कर्म सृष्टिविषयक ये सिद्धान्त मान्य थे, कि दृश्य सृष्टि नाशवान् और अनित्य है; एवं उसके व्यवहार कर्मविपाकके कारण जारी हैं; तथापि वैदिक धर्म अर्थात् उपनिषत्कारोंका यह सिद्धान्त उन्हें मान्य न था, कि नामरूपात्मक नाशवान् सृष्टिके मूलमें नामरूपसे व्यतिरिक्त आत्मस्वरूपी परब्रह्मके समान एक नित्य और सर्वव्यापक वस्तु है - इन दोनों धर्मोंमें जो विशेष भिन्नता है, वह यही है। गौतम- बुद्धने यह बात स्पष्ट रूपसे कह दी है, कि आत्मा या ब्रह्म यथार्थमें कुछ नहीं है - केवल भ्रम है, इसलिये आत्म-अनात्मके विचारमें या ब्रह्म-चिंतनके पचड़ेमें पड़कर किसीकोभी अपना समय न खोना चाहिये ( मघ्घामवमुत्त ९-१३ )। दीघनि- कायके ब्रह्मजालसुत्तोमेंभी यही बात स्पष्ट होती है, कि आत्माविषयक कोईभी

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७७ कल्पना बुद्धको मान्य न थी।* इन सुत्तोंके अंतमें कहा है, कि आत्मा और ब्रह्म एक है या दो, फिर ऐसेही भेद बतलाते हुए आत्माकी भिन्न भिन्न ६२ प्रकारकी कल्पनाएं बतलाकर कहा है, कि ये सभी मिथ्या 'दृष्टि' हैं; और मिलिंदप्रश्नमेंभी (मि. प्र २. ३, ६, २. ७. १५) बौद्ध धर्मके अनुयायी नागसेनने यूनानी मिलिंदसे (मिनांदर) साफ़ साफ़ कह दिया है, कि "आत्मा तो कोई यथार्थ वस्तु नहीं है।" यदि मान लें, कि आत्मा और उसी प्रकार ब्रह्मभी, दोनों भ्रमही हैं, यथार्थ नहीं हैं, तो वस्तुतः धर्मकी नींवही गिर जाती है। क्योंकि, फिर सभी अनित्य वस्तुएंही बच रहती हैं; और नित्य-सुख या उसका अनुभव करनेवाला कोईभी नहीं रह जाता। यही कारण है, जो श्रीशंकराचार्यने तर्कदृष्टिसेभी इस मतको अग्राह्य निश्चित किया है; परंतु अभी हमें केवल यही देखना है, कि असली बुद्ध धर्म क्या है ? इसलिये इस वादको यहीं छोड़कर देखेंगे, कि बुद्धने आगे अपने धर्मकी क्या उपपत्ति बतलाई है। यद्यपि बुद्धको आत्माका अस्तित्व मान्य न था; तथापि इन बातोंसे वे पूर्णतया सहमत थे, कि (१) कर्मविपाकके कारण नाम-रूपात्मक देहको (आत्माको नहीं) नाशवान् जगत्के प्रपंचमें बार बार जन्म लेना पड़ता है; और (२) पुनर्जन्मका यह चक्कर या मार्ग संसारीही दुःखमय है, इससे छुटकारा पा कर स्थिर शांति या सुखको प्राप्त कर लेना अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार इन दो बातों-अर्थात् सांसारिक दुःखके अस्तित्व और उसके निवारण करनेकी आवश्यकताको मान लेनेसे वैदिक धर्मका यह प्रश्न फिरभी ज्यों-का-त्यों बनाही रहता है, कि दुःखनिवारण करके अत्यंत सुख प्राप्तकर लेनेका मार्ग कौन-सा है? और उसका कुछ-न-कुछ ठीक ठीक उत्तर देना आवश्यक हो जाता है। उपनिषत्कारोंने कहा है, कि यज्ञयाग आदि कर्मोंके द्वारा संसारचक्रसे छुटकारा हो नहीं सकता; और बुद्धने इससेभी कहीं आगे बढ़कर इन सब कर्मोंका हिंसात्मक अतएव सर्वथा त्याज्य और निषिद्ध बतलाया है। इसी प्रकार यदि स्वयं 'ब्रह्म' हीको एक बड़ा भारी भ्रम मानें, तो दुःख- निवारणार्थ जो ब्रह्मज्ञान-मार्ग है, वहभी भ्रांतिकारक या असंभव निर्णीत होता है। फिर दुःखमय भवचक्रसे छूटनेका मार्ग कौन-सा है? बुद्धने इसका यह उत्तर दिया है, कि किसी रोगको दूर करनेके लिये उस रोगका मूल कारण ढूंढ कर उसीको हटानेका प्रयत्न जिस प्रकार चतुर वैद्य किया करता है, उसी प्रकार सांसारिक दुःखके रोगको दूर करनेके लिये (३) उसके कारणको जानकर, (४) उसी कारणको दूर करनेवाले मार्गका अवलंब बुद्धिमान् पुरुषको करना चाहिये। इन कारणोंका विचार करनेसे दीख पड़ता है, कि तृष्णा या कामनाही इस जगत्के सब दुःखोंकी जड़ है; और एक नामरूपात्मक शरीरका नाश हो जानेपर बचे हुए इस वासनात्मक


* ब्रह्मजालसुत्तका अंग्रेजीमें अनुवाद नहीं है; परंतु उसका संक्षिप्त विवेचन ऱ्हिस्डेव्हिड्सने S. B. E. Vol. XXVI. Intro. pp. xxiii-xxv में किया है।

५७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बीजहीसे अन्यान्य नाम-रूपात्मक शरीर पुनः पुनः उत्पन्न हुआ करते हैं। और फिर बुद्धने निश्चित किया है, कि पुनर्जन्मके दुःखमय संसारसे पिंड छुड़ानेके लिये इंद्रिय- निग्रहसे, ध्यानसे तथा वैराग्यसे तृष्णाका पूर्णतया क्षय करके संन्यासी या भिक्षु बन जानाही एकमेव यथार्थ मार्ग है; और इसी वैराग्ययुक्त संन्याससे अचल शांति एवं सुख प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है, कि यज्ञयाग आदिकी, तथा आत्म-अनात्म विचारकी झंझटमें न पड़कर, निम्न चार दृश्य बातोंपरही बौद्ध धर्मकी रचना की गई है। वे चार बातें ये हैं : सांसारिक दुःखका अस्तित्व, उसका कारण, उसके निरोध या निवारण करनेकी आवश्यकता, और उसे समूल नष्ट करनेके लिये वैराग्यरूप-साधन; अथवा बौद्धकी परिभाषाके अनुसार क्रमशः दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग। अपने धर्मके इन्हीं चार मूल तत्त्वोंको बुद्धने 'आर्यसत्य' नाम दिया है। उपनिषदके आत्मज्ञानके बदले चार आर्यसत्योंकी दृश्य नींवके ऊपर यद्यपि इस प्रकार बौद्ध धर्म खड़ा किया गया है, तथापि अचल शांति या सुख पानेके लिये तृष्णा अथवा वासनाका क्षय करके मनको निष्काम करनेके जिस मार्गका (चौथा सत्य) उपदेश बुद्धने किया है, वह मार्ग, और मोक्ष-प्राप्तिके लिये उपनिषदोंमें वर्णित मार्ग, दोनों वस्तुतः एकही हैं, इसलिये यह बात स्पष्ट है, कि दोनोंका अंतिम दृश्य-साध्य मनकी निर्विषय स्थिति ही है। परंतु इन दोनों धर्मोंमें भेद यह है, कि ब्रह्म तथा आत्माको एक माननेवाले उपनिषत्कारोंने मनकी इस निष्काम अवस्थाको 'आत्मनिष्ठा', 'ब्रह्म- संस्था', 'ब्रह्मभूतता', 'ब्रह्मनिर्वाण' (गीता ५. १७-२५; छां. २. २३. १), अर्थात् ब्रह्ममें आत्माका लय होना आदि अंतिम आधारदर्शक नाम दिये हैं, और बुद्धने उसे केवल 'निर्वाण' अर्थात् 'विराम पाना', या "दीपकके बुझ जानेके समान वासनाका नाश होना" यह केवल क्रियादर्शक नाम दिया है। क्योंकि, ब्रह्म या आत्माको भ्रम कह देनेपर यह प्रश्नही नहीं रह जाता, कि "विराम कौन पाता है और किसमें पाता है?" (सुत्तनिपातमेंसे रत्नसुत्त १४ और वंगीससुत्त १२, १३), एवं बुद्धने तो यह स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि चतुर मनुष्यको इस गूढ प्रश्नका विचारभी न करना चाहिये (मव्वासवमुत्त ८-९३; मिलिन्दप्रश्न ४. २. ४, ५)। यह स्थिति प्राप्त होनेपर, पुनर्जन्म नहीं होता, इसलिये एक शरीरके नष्ट होनेपर फिर दूसरे शरीरको पानेकी सामान्य क्रियाके लिये प्रयुक्त होनेवाले 'मरण' शब्दका उपयोग बौद्ध धर्मके अनुयायी 'निर्वाण' के लिये किया नहीं जा सकता। निर्वाण तो 'मृत्युकी मृत्यु', अथवा उपनिषदोंके वर्णनानुसार "मृत्युको पारकर जानेका मार्ग" है- निरी मौत नहीं है। बृहदारण्यक उपनिषदमें (४. ४. ७) यह जो दृष्टान्त दिया है, कि जिस प्रकार सर्पको अपनी केंचली छोड़ देनेपर उसकी कुछ परवाह नहीं रहती, उसी प्रकार जब कोई मनुष्य उक्त स्थितिमें पहुँच जाता है, तब उसेभी अपने शरीरकी कुछ चिंता नहीं रह जाती; और उसी दृष्टान्तका आधार असली भिक्षुका वर्णन करते समय सुत्तनिपातके उरगसुत्तके प्रत्येक श्लोकमें लिया गया है। वैदिक धर्मका

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७७ यह तत्त्वभी (कौषी. ब्रा. ३. १), कि “आत्मनिष्ठ पुरुष पाप-पुण्यसे सदैव अलिप्त रहता है” (बृ. ४. ४. २३); “इसलिये उसे मातृवध तथा पितृवधसरीखे पातकोंकाभी दोष नहीं लगता”, धम्मपदमें शब्दशः ज्यों-का-त्यों बतला गया है (धम्म. २९४, २९५; मिलिन्दप्रश्न ४. ५. ७)। सारांश, यद्यपि ब्रह्म तथा आत्माका अस्तित्व बुद्धको मान्य नहीं था, तथापि मनको शांत, विरक्त तथा निष्काम करना प्रभृति मोक्ष-प्राप्तिके जिन साधनोंका उपनिषदोंमें वर्णन है, वेही साधन बुद्धके मतसे निर्वाण-प्राप्तिके लियेभी आवश्यक हैं; इसीलिये बौद्ध यति तथा वैदिक संन्यासियोंके वर्णन मानसिक स्थितिकी दृष्टिसे एकहीसे होते हैं; और इसी कारण पाप-पुण्यकी जिम्मेदारीके संबंधमें तथा जन्म-मरणके चक्करसे छुटकारा पानेके विषयमें वैदिक संन्यास-धर्मके जो सिद्धान्त हैं, वेही बौद्ध धर्ममें स्थिर रखे गये हैं। परंतु वैदिक धर्म गौतमबुद्धसे पहलेका है, अतएव इस विषयमें कोई शंका नहीं, कि ये विचार असलमें वैदिक धर्मकेही हैं। वैदिक तथा बौद्ध संन्यास-धर्मोंकी विभिन्नताका वर्णन हो चुका। अब देखना चाहिये, कि गार्हस्थ्य-धर्मके विषयमें बुद्धने क्या कहा है। आत्म-अनात्म-विचारके तत्त्वज्ञानको महत्त्व न देकर सांसारिक दुःखोंके अस्तित्व आदि दृश्य आधारपरही यद्यपि बौद्ध धर्म खड़ा किया गया है; तथापि स्मरण रखना चाहिये, कि कोंटसरीखे आधुनिक पश्चिमी पंडितोंके निरे आधिभौतिक धर्मके अनुसार — अथवा गीता- धर्मके अनुसारभी बौद्ध धर्म मूलमें प्रवृत्ति-प्रधान नहीं है। यह सच है कि, बुद्धको उपनिषदोंके आत्मज्ञानकी ‘तात्त्विक दृष्टि’ मान्य नहीं है। परंतु बृहदारण्यक उपनिषद्मे (बृ. ४. ४. ६) वर्णित याज्ञवल्क्यका यह सिद्धान्त कि, “संसारको बिलकुल छोड़ करके मनको निर्विषय तथा निष्काम करनाही इस जगतमें मनुष्यका केवल एक परम कर्तव्य है”, बौद्ध धर्ममेंभी सर्वथा स्थिर रखा गया है, इसीलिये बौद्ध धर्म मूलमें केवल संन्यास-प्रधान हो गया है। यद्यपि बुद्धके समग्र उपदेशोंका तात्पर्य यह है, कि संसारका त्याग कियेबिना, केवल गृहस्थाश्रममेही बने रहनेसे, परम सुख अर्हन्तावस्था कभी प्राप्त हो नहीं सकती; तथापि यह न समझ लेना चाहिये कि उसमें गार्हस्थ्यवृत्तिका बिलकुल विवेचनही नहीं है। जो मनुष्य बिना भिक्षु बने बुद्ध, उसके धर्म, और बौद्ध भिक्षुओंके संघ अर्थात् मेले या मंडलियों, इन तीनोंपर विश्वास रखे; और “बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” इस संकल्पके उच्चारण द्वारा उक्त तीनोंकी शरणमे जाय, उसको बौद्ध-ग्रंथोंमें उपासक कहा है। येही लोग बौद्ध धर्मावलंबी गृहस्थ हैं। प्रसंग-प्रसंगपर स्वयं बुद्धनेभी कुछ स्थानोंपर उपदेश किया है, कि उन उपासकोंको अपना गार्हस्थ्य-व्यवहार कैसा रखना चाहिये (महापरिनिव्वाणसुत्त १. २४)। वैदिक गार्हस्थ्य-धर्ममेंसे हिंसात्मक श्रौत यज्ञयाग और चारों वर्णोंका भेद बुद्धको ग्राह्य नहीं था। इन बातोंको छोड़ देनेसे स्मार्त पंचमहायज्ञ, दान आदि परोपकार धर्म और नीतिपूर्वक आचरण गी. र. ३७

५७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

करनाही गृहस्थका कर्तव्य रह जाता है; तथा गृहस्थोंके धर्मका वर्णन करते समय केवल इन्ही बातोंका उल्लेख बौद्ध-ग्रंथोंमें पाया जाता है। बुद्धका मत है, कि प्रत्येक गृहस्थ अर्थात् उपासकको पंचमहायज्ञ करनाही चाहिये। उनका स्पष्ट कथन है, कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सर्वभूतानुकंपा और (आत्मा मान्य न हो, तथापि) आत्मौपम्य-दृष्टि, शौच या मनकी पवित्रता, तथा विशेष करके सत्पात्रों याने बौद्ध- भिक्षुओंको एवं बौद्ध भिक्षु-संघको अन्न-वस्त्र आदिका दान देना प्रभृति नीति- धर्मोकाभी पालन बौद्ध उपासकोंको करना चाहिये। बौद्ध धर्ममें इसीको 'शील' कहा है; और दोनोंकी तुलना करनेसे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि पंचमहायज्ञके समान ये नीति-धर्मभी ब्राह्मण-धर्मके धर्म-सूत्रों अथवा प्राचीन स्मृति-ग्रंथोंसे (मनु. ६. ९२; १०. ६३) बुद्धने लिये हैं।* और तो क्या, इस आचारके विषयमें प्राचीन ब्राह्मणोंकी स्तुति स्वयं बुद्धनेही ब्राह्मणधम्मिकसुत्तोंमें की है; तथा मनुस्मृतिके कुछ श्लोक तो धम्मपदमें अक्षरशः पाये जाते हैं (मनु. २. १२१; ५. ४५; धम्मपद १०९, १३१) बौद्ध धर्ममें वैदिक ग्रंथोंमें न केवल पंचमहायज्ञ और नीति-धर्मही लिये गये हैं; किंतु वैदिक धर्ममें पहले कुछ उपनिषत्कारों-द्वारा प्रतिपादित इस मतकोभी बुद्धने स्वीकार किया है, कि गृहस्थाश्रममें पूर्ण मोक्ष-प्राप्ति कभीभी नहीं होती। उदाहरणार्थ, सुत्तनिपातके धम्मिकसुत्तमें भिक्षुके साथ उपासककी तुलना करके बुद्धने साफ़ साफ़ कह दिया है, कि गृहस्थको उत्तम शीलके द्वारा बहुत हुआ तो 'स्वयंप्रकाश' देवलोककी प्राप्ति हो जावेगी; परंतु जन्म-मरणके चक्करसे पूर्णतया छुटकारा पानेके लिये संसार तथा लड़के-बच्चे, स्त्री आदिको छोड़ करके अंतमें उसको भिक्षु-धर्मही स्वीकार करना चाहिये (धम्मिकसुत्त १७, २९; बृ. ४. ४. ६; महा. वन. २. ६३)। तेविज्जसुत्तमें (ते. सु. १. ३५. ३. ५) यह वर्णन है, कि कर्म-मार्गीय वैदिक ब्राह्मणोंमें वाद करते समय अपने उक्त संन्यास-प्रधान मतको सिद्ध करनेके लिये बुद्ध ऐसी युक्तियाँ पेश करते थे, कि "यदि तुम्हारे ब्रह्मके बाल-बच्चे-स्त्री तथा क्रोध- लोभ नहीं हैं, तो स्त्री-पुत्रोंमें रहकर तथा यज्ञ-याग आदि काम्य कर्मोंके द्वारा तुम्हें ब्रह्मकी प्राप्ति होगीही कैसे ?" और यहभी प्रसिद्ध है, कि स्वयं बुद्धने युवावस्थामेंही अपनी स्त्री, अपने पुत्र तथा राजपाटकोभी त्याग दिया था, एवं भिक्षु-धर्म स्वीकार- कर लेनेपर छः वर्षके बाद उन्हें बुद्धावस्था प्राप्त हुई थी। बुद्धके समकालीन, परंतु उनसे पहलेही समाधिस्थ हो जानेवाले, महावीर नामक अंतिम जैन तीर्थंकरकाभी ऐसाही उपदेश है। परंतु वह बुद्धके समान अनात्मवादी नहीं था; और इन दोनों धर्मोंमें महत्त्वका भेद यह है, कि वस्त्रप्रावरण आदि ऐहिक सुखोंका त्याग और अहिंसाव्रत प्रभृति धर्मोंका पालन बौद्ध भिक्षुओंकी अपेक्षा जैन यति अधिक दृढ़तासे किया करते थे; एवं अबभी करते रहते हैं। खानेहीकी नियतसे जो प्राणी न मारे

  • See Dr. Kern's Manual of Buddhism (Grundriss III. 8) p. 68.

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५७९ गये हों, उनका ‘पवत्त’ (सं. प्रवृत्त) अर्थात् “तैयार किया हुआ मांस” (हाथी, सिंह, आदि कुछ प्राणियोंको छोड़कर) बुद्ध स्वयं खाया करते थे; ‘पवत्त’ मांस तथा मछलियाँ खानेकी आज्ञा बौद्ध भिक्षुओंकोभी दी गई है; एवं बिना वस्त्रोंके नंग-धड़ंग घूमना बौद्ध-भिक्षु-धर्मके नियमानुसार अपराध है; (महावग्ग. ६. ३१. १४; ८. २८. १)। सारांश, यद्यपि बुद्धका निश्चित उपदेश था, कि अनात्मवादी भिक्षु बनो; तथापि काया-क्लेशमय उग्र तपसे बुद्ध सहमत नहीं थे (महावग्ग. ५. १. १६; गीता ६. १६); बौद्ध भिक्षुओंके विहारों अर्थात् उनके रहनेके मठोंकी सारी व्यवस्थाभी ऐसी रखी जाती थी, कि जिससे उनको कोई विशेष शारीरिक कष्ट न सहना पड़े; और प्राणायाम आदि योगाभ्यास सरलतापूर्वक हो सके। तथापि बौद्ध धर्ममें यह तत्त्व पूर्णतया स्थिर है, कि अर्हतावस्था या निर्वाणसुखकी प्राप्तिके लिये गृहस्थाश्रमको त्यागनाही चाहिये, इसलिये यह कहनेमें कोई प्रत्यवाय नहीं, कि बौद्ध धर्म संन्यास-प्रधान धर्म है। यद्यपि बुद्धका निश्चित मत था, कि ब्रह्मज्ञान अथवा आत्म-अनात्म-विचार भ्रमका एक बड़ा-सा जाल है; तथापि इस दृश्य कारणके लिये, अर्थात् दुःखमय संसार- चक्रसे छूटकर निरंतर शांति तथा सुख प्राप्तिके लिये, उपनिषदोंमें वर्णित संन्यास- मार्गवालोंके इसी साधनको उन्होंने मान लिया था, कि वैराग्यसे मनको निर्विषय रखना चाहिये; और जब यह सिद्ध हो गया, कि चातुर्वर्ण्य भेद या हिंसात्मक यज्ञ- यागको छोड़कर बौद्ध धर्ममें वैदिक गार्हस्थ्य-धर्मके नीतिनियमही कुछ हेरफेर करके लिये गये हैं, तब यदि उपनिषद् तथा मनुस्मृति आदि ग्रंथोंमें वैदिक संन्यासियोंके जो वर्णन हैं, वे वर्णन, एवं बौद्ध भिक्षुओं या अर्हंतोंके वर्णन, अथवा अहिंसा आदि नीति-धर्म, दोनों धर्मोंमें एकहीसे - और कई स्थानोंपर शब्दशः एकहीसे - दीख पड़ें, तो आश्चर्यकी बात नहीं है। ये सब बातें मूल वैदिक धर्महीकी हैं। परंतु बौद्धोंने केवल इतनीही बातें वैदिक धर्मसे नहीं ली हैं; प्रत्युत बौद्ध धर्मके दशरथ-जातकके समान जातक-ग्रंथभी प्राचीन वैदिक पुराण-इतिहासकी कथाओंके, बुद्ध धर्मके अनुकूल तैयार किये हुए, रूपांतर हैं। न केवल बौद्धोंनेही, किंतु जैनोंनेभी अपने अभिनव- पुराणोंमें वैदिक कथाओंके ऐसेही रूपांतर कर लिये हैं। सेल* साहबने तो यह लिखा है, कि ईसाके अनंतर प्रचलित हुए मुहंमदी धर्ममें ईसाके चरित्रका इसी प्रकार विपर्यास कर लिया गया है। वर्तमान समयकी खोजसे यह सिद्ध हो चुका है, कि पुरानी बाइबलमें सृष्टिकी उत्पत्ति, प्रलय तथा नूह आदिकी जो कथाएँ हैं, वे सब प्राचीन खाल्दी जातिकी धर्म-कथाओके रूपांतर हैं, कि जिनका वर्णन यहूदी लोगोंका किया हुआ है। उपनिषद्, प्राचीन धर्म-सूत्र, तथा मनुस्मृतिके वर्णन कथाएँ अथवा

  • See Sele's Koran, “To the Reader” (Preface), p. x. and the Preliminary Discourse, See IV. p. 58. (Chandos Classics Edition.)

५८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विचार जब बौद्ध ग्रंथोंमें इस प्रकार - कई बार तो बिलकुल शब्दशः - लिये गये हैं, तब यह अनुमान सहजही हो जाता है, कि ये असलमें महाभारतकेही हैं। बौद्ध-ग्रंथ- प्रणेताओंने इन्हें वहींसे उद्धृत कर लिया होगा। वैदिक धर्म-ग्रंथोंके जो भाव और श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें पाये जाते हैं, उनके कुछ उदाहरण ये हैं :- "जैसे बैरकी वृद्धि होती है; और बैरसे बैर शांत नहीं होता" (मभा. उद्यो. ७१. ५९, ६३), "दूसरेके क्रोधको शांतिसे जीतना चाहिये" आदि विदुरनीति ( मभा. उद्योग. ३८. ७३ ) तथा जनकका यह वचन कि "यदि मेरी एक भुजामें चंदन लगाया जाय और दूसरी काटकर अलगकर दी जाय, तोभी मुझे दोनो बातें समानही है" ( मभा. शां. ३२०. ३६); इनके अतिरिक्त महाभारतके औरभी बहुतसे श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें शब्दशः पाये जाते हैं (धम्मपद ५, २२३; मिलिंदप्रश्न ७. ३. ५) । इसमें कोई संदेह नहीं, कि उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा मनुस्मृति आदि वैदिक ग्रंथ बुद्धकी अपेक्षा प्राचीन हैं, इसलिये उनके जो विचार तथा श्लोक बौद्ध-ग्रंथोंमें पाये जाते हैं, उनके विषयमें विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है, कि उन्हें बौद्ध-ग्रंथकारोंने उपर्युक्त वैदिक ग्रंथोंहीसे लिया है; किंतु यह बात महाभारतके विषयमें नहीं कही जा सकती । महाभारतमेंही बौद्ध डागोबाओंका जो उल्लेख है, उससे स्पष्ट होता है, कि महा- भारतका अंतिम संस्करण बुद्धके बाद रचा गया है। अतएव केवल श्लोकके सादृश्यके आधारपर यह निश्चय नहीं किया जा सकता, कि वर्तमान महाभारत बौद्ध-ग्रंथोंके पहलेहीका है; और गीता महाभारतकाही एक भाग है, इसलिये यही न्याय गीताकोभी उपयुक्त हो सकेगा । इसके सिवा, यह पहलेही कहा जा चुका है, कि गीतामेंही ब्रह्म- सूत्रोंका उल्लेख है; और ब्रह्म-सूत्रोंमें है बौद्ध धर्मका खंडन। अतएव स्थितप्रज्ञके वर्णन प्रभृतिकी (वैदिक और बौद्ध) दोनोंकी समताको छोड़ देते हैं, और यहाँ अब इस बातका विचार करते हैं, कि उक्त शंकाको दूर करने एवं गीताको निर्विवाद रूपसे बौद्ध- ग्रंथोंसे पुरानी सिद्ध करनेके लिये बौद्ध-ग्रंथोंमें कोई अन्य साधन मिलता है या नहीं । ऊपर कह चुके हैं, कि बौद्ध धर्मका मूल स्वरूप शुद्ध निरात्मवादी और निवृत्ति- प्रधान है। परंतु उसका यह स्वरूप बहुत दिनोंतक टिक न सका। भिक्षुओंके आचरणके विषयमें मतभेद हो गया; और बुद्धकी मृत्युके पश्चात् उसमें अनेक उपपंथोंका निर्माणही नहीं होने लगा, किंतु धार्मिक तत्त्वज्ञानके विषयमेभी इसी प्रकारका मतभेद उपस्थित हो गया । आजकल कई लोग तो यहभी कहने लगे हैं, कि "आत्मा नहीं है" इस कथनके द्वारा बुद्धको मनसे यही बतलाना है, कि "अचिन्त्य आत्मज्ञानके शुष्क- वादमें मत पड़ों; वैराग्य तथा अभ्यासके द्वारा मनको निष्काम करनेका प्रयत्न पहले करो; आत्मा हो चाहे न हो; मनके निग्रह करनेका कार्य मुख्य है; और उसे सिद्ध करनेका प्रयत्न पहले करना चाहिये।" उनके कहनेका यह मतलब नहीं है, कि ब्रह्म या आत्मा बिलकुल हैही नहीं। क्योंकि तेविज्जसुत्तमें स्वयं बुद्धनेही 'ब्रह्मसहव्यताय' स्थितिका उल्लेख किया है; और सेल्लसुत्त तथा थेरगाथामेंभी उन्होंने कहा है, कि

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८१ में ब्रह्मभूत हूं (सेल्लसुत्त १६; थेरगाथा ८३१)। परंतु मूल हेतु चाहे जो हो; यह निर्विवाद है, कि ऐसे अनेक प्रकारके मत, वाद तथा आग्रही पंथ तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे आगे निर्मित हो गये; जो कहते थे, कि “आत्मा या ब्रह्ममेसे कोईभी नित्य वस्तु जगतके मूलमें नहीं है; जो कुछ दीख पड़ता है, वह क्षणिक या शून्य है; अथवा जो कुछ दीख पड़ता है, वह ज्ञान है; ज्ञानके अतिरिक्त – जगतमें कुछभी नहीं है”, इत्यादि (वे. सू. शां. भा. २. २. १८–२६)। इस निरीश्वर या अनात्मवादी बौद्ध मतकोही क्षणिकवाद, शून्यवाद और विज्ञानवाद कहते हैं। परंतु यहाँपर इन सब पंथोंके विचार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है। हमारा प्रश्न ऐतिहासिक है। अतएव उसका निर्णय करनेके लिये 'महायान' नामक पंथका वर्णन, जितना आवश्यक है उतनाही, यहाँपर किया जाता है। बुद्धके मूल उपदेशमें आत्मा या ब्रह्मका (अर्थात् परमात्मा या परमेश्वर) अस्तित्वही अग्राह्य अथवा गौण माना गया है, इसलिये स्वयं बुद्ध अपने जीवन-कालमेंसेही भक्तिके द्वारा परमेश्वरकी प्राप्ति करनेके मार्गका उपदेश किया जाना संभव नहीं था; और जबतक बुद्धकी भव्य मूर्ति एवं चरित्रक्रम लोगोंके सामने प्रत्यक्ष रीतिसे उपस्थित था, तबतक उस मार्गकी कुछ आवश्यकताही नहीं थी। परंतु आगे यह आवश्यक हो गया, कि यह धर्म सामान्य जनोंको प्रिय हो; और उसका अधिक प्रचारभी होवे। अतः घरदार छोड़, भिक्षु बन करके मनो- निग्रहसे बैठे-बिठाये निर्वाण पाने – यह न समझकर कि किसमें ? – के इस निरीश्वर निवृत्ति-मार्गकी अपेक्षा किसी सरल और प्रत्यक्ष मार्गकी आवश्यकता हुई। बहुत संभव है, कि साधारण बुद्ध-भक्तोंने तत्कालीन प्रचलित वैदिक भक्ति-मार्गका अनुकरण करके, बुद्धकी उपासनाका आरंभ पहले पहल स्वयं कर दिया हो; अतएव बुद्धके निर्वाण पानेके पश्चात् शीघ्रही बौद्ध पंडितोंने बुद्धहीको “स्वयंभू तथा अनादि, अनंत पुरुषोत्तम"का रूप दे दिया, और वे कहने लगे, कि बुद्धका निर्वाण होना तो उन्हींकी लीला है, “असली बुद्धका कभी नाश नहीं होता – वह तो सदैव अचल रहता है।" इसी प्रकार बौद्ध-ग्रंथोंमें यह प्रतिपादन किया जाने लगा, कि असली बुद्ध “सारे जगतका पिता है; और जनसमूह उनकी संतान है", इसलिये वहभी सभीको “समान है, न वह किसीसे प्रेमही करता है और न किसीसे द्वेषभी करता है।” “धर्मकी व्यवस्था बिगड़नेपर 'धर्मकृत्य'के लिये वही समय-समयपर बुद्धके रूपमें प्रकट हुआ करता है", और इसी देवाधिदेव बुद्धकी "भक्ति करनेसे, उनके ग्रंथोंकी पूजा करनेसे और उसके डागोबाके संमुख कीर्तन करनेसे" अथवा "उसे भक्तिपूर्वक दो-चार कमल या एक फूल समर्पण कर देनेभीसे मनुष्यको सद्गति प्राप्त होती है (सद्धर्मपुंडरीक २. ७७–९८; ५. २२; १५. ५–२२; मिलिंदप्रश्न ३. ७. ७)।* मिलिंदप्रश्नमें

  • प्राच्यधर्म-पुस्तकमालाके २१वें खंडमें 'सद्धर्मपुंडरीक' ग्रंथका अनुवाद प्रकाशित हुआ है। यह मूल ग्रंथ संस्कृत भाषाका है। अब मूल संस्कृत ग्रंथभी प्रकाशित हो चुका है।

५८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (मि. प्र. ३. ७ २) यहभी कहा है, कि "किसी मनुष्यकी सारी उम्र दुराचरणोंमे क्यों न बीत गई हो; परंतु मृत्युके समय यदि वह बुद्धकी शरणमें जावे, तो उसे स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी"; और सद्धर्मपुंडरीकके दूसरे तथा तीसरे अध्यायोंमें इस बातका विस्तृत वर्णन है, कि सब लोगोंका "अधिकार, स्वभाव तथा ज्ञान एकही प्रकारका नहीं होता; इसलिये अनात्मपर निवृत्ति-प्रधान-मार्गके अतिरिक्त भक्तिके इस मार्गको (यान) बुद्धनेही दया करके अपनी-"उपायचातुरीमे निर्मित किया है।" स्वयं बुद्धके बतलाये हुए इस धर्म-तत्त्वको एकदम छोड़ देना कभीभी संभव नहीं था, कि निर्वाणपदकी प्राप्ति होनेके लिये भिक्षु-धर्महीको स्वीकार करना चाहिये; क्योंकि यदि ऐसा किया जाता, तो मानो बुद्धके मूल उपदेशपरही हरताल पोता जाता। परंतु यह कहना कुछ अनुचित नहीं था, कि भिक्षु हो गया तो क्या हुआ; उसे जंगलमें 'गैंडे'के समान अकेले तथा उदासीन न बने रहना चाहिये; किंतु धर्मप्रसार आदि लोकहित तथा परोपकारके काम 'निरिस्सित' बुद्धिमे करते जानाही बौद्ध भिक्षुओंका कर्तव्य है;† इसी मतका प्रतिपादन महायान-पंथके सद्धर्मपुंडरीक आदि ग्रंथोंमें किया गया है; और नागसेनने मिलिंदसे कहा है, कि "गृहस्थाश्रममें रहते हुए निर्वाण- पदको पा लेना बिल्कुल अशक्य नहीं है - और इसके कितनेही उदाहरणभी है" (मि. प्र. ६. २. ४)। यह बात किसीकेभी ध्यानमें सहजही आ जायगी, कि ये विचार अनात्मवादी तथा केवल संन्यास-प्रधान मूल बौद्ध धर्मके नहीं हैं, अथवा शून्यवाद या विज्ञान-वादको स्वीकार करकेभी इनकी उपपत्ति नहीं जानी जा सकती; और पहले पहल अधिकांश बौद्ध धर्मवालोंको स्वयं मालूम पड़ता था, कि ये विचार बुद्धके मूल उपदेशसे विरुद्ध हैं। परंतु फिर यही नया मतही स्वभावमे अधिकाधिक लोकप्रिय होने लगा; और बुद्धके मूल उपदेशके अनुसार आचरण करनेवालेको 'हीनयान' (हल्का मार्ग) तथा इस नये पंथको 'महायान' (बड़ा मार्ग) नाम प्राप्त हो गया।* चीन, तिब्बत और जापान आदि देशोंमें आजकल जो बौद्ध धर्म प्रचलित † सुत्तनिपातमे खग्गविसाणसुत्तके ४१ वे श्लोकका ध्रुवपद "एको चरे खग्गविसाणकप्पो" है। उसका यह अर्थ है, कि खग्गविसाण याने गेंडा और उसीके समान बौद्ध भिक्षुको जंगलमें अकेले रहना चाहिये।

  • हीनयान और महायान-पंथोंका भेद बतलाते हुए डॉक्टर केर्नने कहा है, कि:- "Not the Arhat, who has shaken off all human feeling, but the generous self-sacrificing, active Bodhisattva is the ideal of the Mahayanists, and this attractive side of the creep has, more per- haps than anything else, contributed to their wide conquests, whereas S. Buddhism has not been able to make converts except where the soil had been prepared by Hindusism and Mahayanism"-Manual of Indian Buddhism, p. 69. Southern Buddhism अर्थात् हीनयान है। महायान-पंथमे भक्तिकाभी समावेश हो चुका था। "Mahayanism lays

गीताकी बहिरंगपरीक्षा ५८३ है, वह महायान-पंथका है; और बुद्धके निर्वाणके पश्चात् महायान-पंथी भिक्षुसंघके दीर्घोद्योगके कारणही बौद्ध धर्मका इतनी शीघ्रतासे फैलाव हो गया । डॉक्टर केर्नकी राय है, कि बौद्ध धर्ममें इस सुधारकी उत्पत्ति शालिवाहन शकके लगभग तीन सौ वर्ष पहले हुई होगी ।† क्योंकि बौद्ध-ग्रंथोंमें इसका उल्लेख है, कि शक राजा कनिष्कके शासन-कालमें बौद्ध-भिक्षुओंकी जो एक महापरिषद् हुई थी, उसमें महायान-पंथके भिक्षु उपस्थित थे । इस महायान-पंथके 'अमितायुसुत्त' नामक प्रधान सूत्र-ग्रंथका वह अनुवाद अभी उपलब्ध है, जो कि चीनी भाषामें सन् १४८ इसवीके लगभग किया गया था । परंतु हमारे मतानुसार यह काल इससेभी प्राचीन होना चाहिये । क्योंकि, सन ईसवीसे लगभग २३० वर्ष पहले प्रसिद्ध किये गये अशोकके शिलालेखों में संन्यास-प्रधान निरीश्वर बौद्ध धर्मका विशेष रीतिसे कोई उल्लेख नहीं मिलता; उनमें सर्वत्र प्राणिमात्रपर दया करनेवाले प्रवृत्ति-प्रधान बौद्ध धर्महीका उपदेश किया गया है । तब यह स्पष्ट है, कि पहलेही बौद्ध धर्मको महायान- पंथके प्रवृत्ति-प्रधान स्वरूपका प्राप्त होना आरंभ हो गया था । बौद्ध यति नागार्जुन इस पंथका मुख्य पुरस्कर्ता था, न कि मूल उत्पादक । ब्रह्म या परमात्माके अस्तित्वको न मानकर, उपनिषदोंके मतानुसार, केवल मनको निर्विषय करनेवाले निवृत्ति-मार्गके स्वीकारकर्ता मूल निरीश्वरवादी बुद्ध धर्महीमेंसे यह कब संभव था, कि आगे क्रमशः स्वाभाविक रीतिसे भक्ति-प्रधान प्रवृत्ति-मार्ग निकल पड़ेगा; इसलिये बुद्धका निर्वाण हो जानेपर बौद्ध धर्मको शीघ्रही जो यह कर्म-प्रधान भक्ति-स्वरूप प्राप्त हो गया, उससे प्रकट होता है, कि इसके लिये बौद्ध धर्मके बाहरका तत्कालीन कोई न कोई अन्य कारण निमित्त हुआ होगा; और इस कारणको ढूँढ़ते समय भगवद्गीतापर दृष्टि पहुँचेबिना नहीं रहती । क्योंकि, जैसे हमने गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणमें स्पष्टीकरण कर दिया है, हिंदुस्थानमें तत्कालीन प्रचलित धर्मोंमेंसे जैन तथा उपनिषद्-धर्म पूर्णतया निवृत्ति-प्रधानही थे; और वैदिक धर्मके पाशुपत अथवा शैव आदि पंथ यद्यपि भक्ति-प्रधान थे तो सही; पर प्रवृत्ति-मार्ग और भक्तिका मेल भगवद्गीताके अतिरिक्त अन्यत्र कहींभी नहीं पाया जाता था । गीतामें भगवानने अपने लिये पुरुषोत्तम नामका उपयोग किया है; और a great stress on devotion in this respect as in many others harmonising with the current of feeling in India which led to the growing importance of Bhakti." Ibid, p. 124. † See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism, pp. 6, 69 and 119. ( मिलिंद मिनँडेर नामी यूनानी राजा ) सन् ईसवीसे लगभग १४० या १५० वर्ष पहले हिंदुस्थानकी वायव्यकी ओर, बॅक्ट्रिया देशमें राज्य करता था । मिलिंदप्रश्नमें इस बातका उल्लेख है, कि नागसेनने इसे बौद्ध धर्मकी दीक्षा दी थी । बौद्ध धर्म फैलानेके ऐसे काम महायान-पंथके लोगही किया करते थे, इसलिये स्पष्टही है. कि तब महायान-पंथ प्रादुर्भूत हो चुका था ।

५८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ये विचार भगवद्गीतामेंही आये हैं, कि "मैं पुरुषोत्तमही सब लोगोंका 'पिता' और 'पितामह' हूँ (गीता ९. ७) ; सबको 'सम' हूँ, मुझे न तो कोई द्वेष्यही है और न कोई प्रिय (गीता ९. २९) ; मैं यद्यपि अज और अव्यय हूँ, तथापि धर्म-संरक्षणार्थ समय-समयपर अवतार लेता हूँ (४. ६-८) ; मनुष्य कितनाही दुराचारी क्यों न हो, पर मेरा भजन करनेसे वह साधुही हो जाता है (९. ३०) : अथवा मुझे भक्ति- पूर्वक एक-आध फूल, फल, पत्ता या थोड़ासा पानी अर्पण कर देनेसेभी मैं उसे बड़ेही संतोषपूर्वक ग्रहण करता हूँ (गीता ९. २६) ; और अज्ञ लोगोंके लिये भक्ति एक सुलभ मार्ग है" (गीता १२. ५) ; इत्यादि । इसी प्रकार इस तत्त्वका विस्तृत प्रतिपादन गीताके अतिरिक्त कहींभी नहीं किया गया है, कि ब्रह्मनिष्ठ पुरुष लोक- संग्रहके लिये प्रवृत्त-धर्महीको स्वीकार करें। अतएव यह अनुमान करना पड़ता है, कि जिस प्रकार मूल बुद्ध धर्ममें वासनाका क्षय करनेका निरा निवृत्ति-प्रधान-मार्ग उपनिषदोंसे लिया गया है, उसी प्रकार जब महायान-पंथ निकाला तब उसमें प्रवृत्ति- प्रधान भक्ति-तत्त्वभी भगवद्गीताहीसे लिया गया होगा । परंतु यह बात केवल अनुमानोंपरही अवलंबित नहीं है। तिब्बती भाषामें बौद्ध धर्मके इतिहासपर बौद्ध- धर्मी तारानाथ-लिखित जो ग्रंथ है, उसमें स्पष्ट लिखा है, कि महायान-पंथके मुख्य पुरस्कर्ताका अर्थात् "नागार्जुनका गुरु राहुलभद्र नामक बौद्ध पहले ब्राह्मण था; और इस ब्राह्मणको (महायान-पंथकी) कल्पना सूझ पड़नेके लिये ज्ञानी श्रीकृष्ण तथा गणेश कारण हुए।" इसके सिवा, एक दूसरे तिब्बती ग्रंथमेंभी यही उल्लेख पाया जाता है।* यह सच है, कि तारानाथका ग्रंथ बहुत प्राचीन नहीं है; परंतु यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि उसका वर्णन प्राचीन ग्रंथोंके आधारको छोड़ कर नहीं किया गया है। क्योंकि, यह संभव नहीं है, कि कोईभी बौद्ध ग्रंथकार स्वयं अपने धर्मपंथके तत्त्वोंको बतलाते समय, बिना किसी कारणके, परधर्मियोंका इस प्रकार उल्लेख कर दे । इसलिये स्वयं बौद्ध ग्रंथकारोंहीके द्वारा इस विषयमें श्रीकृष्णके नामका उल्लेख किया जाना बड़े महत्त्वका है। क्योंकि, भगवद्गीताके अतिरिक्त श्रीकृष्णोक्त दूसरा प्रवृत्ति-प्रधान भक्ति-ग्रंथ वैदिक धर्ममें हैही नहीं, अतएव इससे

  • See Dr. Kern's Manual of Indian Buddhism, p. 122. "He (Nagarjuna) was a pupil of the Brahmana Rahula- bhadra, who himself was a Mahayanist. This Brahmana was much indebted to the sage Krishna and still more to Ganesha. This quassi-historical notice, reduced to its less allegorical expression means that Mahayanism is much indebted to the Bhagavadgita and more even to Shivaism." जान पड़ता है, कि डॉ. केर्न 'गणेश' शब्दसे शैव पंथ समझते हैं। डॉ. केर्नने प्राच्यधर्म-पुस्तक-मालामें 'सद्धर्मपुंडरीक' ग्रंथका अनुवाद किया है; और उसकी प्रस्तावनामें इसी मतका प्रतिपादन किया है। (S. B. E. Vol. XXI, Intro. pp. xxv-xxviii ).