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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 956 में से

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पृष्ठ 621

५७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बीजहीसे अन्यान्य नाम-रूपात्मक शरीर पुनः पुनः उत्पन्न हुआ करते हैं। और फिर बुद्धने निश्चित किया है, कि पुनर्जन्मके दुःखमय संसारसे पिंड छुड़ानेके लिये इंद्रिय- निग्रहसे, ध्यानसे तथा वैराग्यसे तृष्णाका पूर्णतया क्षय करके संन्यासी या भिक्षु बन जानाही एकमेव यथार्थ मार्ग है; और इसी वैराग्ययुक्त संन्याससे अचल शांति एवं सुख प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है, कि यज्ञयाग आदिकी, तथा आत्म-अनात्म विचारकी झंझटमें न पड़कर, निम्न चार दृश्य बातोंपरही बौद्ध धर्मकी रचना की गई है। वे चार बातें ये हैं : सांसारिक दुःखका अस्तित्व, उसका कारण, उसके निरोध या निवारण करनेकी आवश्यकता, और उसे समूल नष्ट करनेके लिये वैराग्यरूप-साधन; अथवा बौद्धकी परिभाषाके अनुसार क्रमशः दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग। अपने धर्मके इन्हीं चार मूल तत्त्वोंको बुद्धने 'आर्यसत्य' नाम दिया है। उपनिषदके आत्मज्ञानके बदले चार आर्यसत्योंकी दृश्य नींवके ऊपर यद्यपि इस प्रकार बौद्ध धर्म खड़ा किया गया है, तथापि अचल शांति या सुख पानेके लिये तृष्णा अथवा वासनाका क्षय करके मनको निष्काम करनेके जिस मार्गका (चौथा सत्य) उपदेश बुद्धने किया है, वह मार्ग, और मोक्ष-प्राप्तिके लिये उपनिषदोंमें वर्णित मार्ग, दोनों वस्तुतः एकही हैं, इसलिये यह बात स्पष्ट है, कि दोनोंका अंतिम दृश्य-साध्य मनकी निर्विषय स्थिति ही है। परंतु इन दोनों धर्मोंमें भेद यह है, कि ब्रह्म तथा आत्माको एक माननेवाले उपनिषत्कारोंने मनकी इस निष्काम अवस्थाको 'आत्मनिष्ठा', 'ब्रह्म- संस्था', 'ब्रह्मभूतता', 'ब्रह्मनिर्वाण' (गीता ५. १७-२५; छां. २. २३. १), अर्थात् ब्रह्ममें आत्माका लय होना आदि अंतिम आधारदर्शक नाम दिये हैं, और बुद्धने उसे केवल 'निर्वाण' अर्थात् 'विराम पाना', या "दीपकके बुझ जानेके समान वासनाका नाश होना" यह केवल क्रियादर्शक नाम दिया है। क्योंकि, ब्रह्म या आत्माको भ्रम कह देनेपर यह प्रश्नही नहीं रह जाता, कि "विराम कौन पाता है और किसमें पाता है?" (सुत्तनिपातमेंसे रत्नसुत्त १४ और वंगीससुत्त १२, १३), एवं बुद्धने तो यह स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि चतुर मनुष्यको इस गूढ प्रश्नका विचारभी न करना चाहिये (मव्वासवमुत्त ८-९३; मिलिन्दप्रश्न ४. २. ४, ५)। यह स्थिति प्राप्त होनेपर, पुनर्जन्म नहीं होता, इसलिये एक शरीरके नष्ट होनेपर फिर दूसरे शरीरको पानेकी सामान्य क्रियाके लिये प्रयुक्त होनेवाले 'मरण' शब्दका उपयोग बौद्ध धर्मके अनुयायी 'निर्वाण' के लिये किया नहीं जा सकता। निर्वाण तो 'मृत्युकी मृत्यु', अथवा उपनिषदोंके वर्णनानुसार "मृत्युको पारकर जानेका मार्ग" है- निरी मौत नहीं है। बृहदारण्यक उपनिषदमें (४. ४. ७) यह जो दृष्टान्त दिया है, कि जिस प्रकार सर्पको अपनी केंचली छोड़ देनेपर उसकी कुछ परवाह नहीं रहती, उसी प्रकार जब कोई मनुष्य उक्त स्थितिमें पहुँच जाता है, तब उसेभी अपने शरीरकी कुछ चिंता नहीं रह जाती; और उसी दृष्टान्तका आधार असली भिक्षुका वर्णन करते समय सुत्तनिपातके उरगसुत्तके प्रत्येक श्लोकमें लिया गया है। वैदिक धर्मका

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